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क्या आपको भी सर्दियों में हो रहा यूरिन इन्फेक्शन, जाने बचाव

क्या आपको भी सर्दियों में हो रहा यूरिन इन्फेक्शन, जाने बचाव
Jan 03, 2026, 01:25 PM
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Posted By Preeti Kumari

सर्दियों की पहली लहर आते ही हमारे शरीर में कई तरह से बदलाव होने शुरू हो जाते है. हवा में ठंडक बढ़ते ही त्वचा रूखी होती है, होंठ फटते हैं, प्यास कम लगती है और हम धीरे-धीरे गर्म चीज़ों की ओर खिंचने लगते हैं. लेकिन एक बदलाव ऐसा भी है जो ज़्यादातर लोग महसूस करते हैं, फिर भी इसे गंभीरता से लेने के बजाय इसमें लापरवाही बरतनी शुरू कर देते है. अक्सर कुछ लोगों को ठंड भरे मौसम में यूरिन इंफेक्शन की संभावना बढ़ने लगती है, कई लोग इसे ठंड का साधारण असर समझते हैं, पर बात इतनी सी नहीं हैं, क्योंकि कभी-कभी अंदरूनी असर भी काफी गहरा होता हैं.


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कभी-कबार तो लोगों को यूरिन समस्या काफी होने लगती है, जैसे सर्दियों में बार-बार यूरिन पास करने की इच्छा, जलन, पेशाब में गंध, या निचले पेट में हल्का दर्द महसूस करते हैं, तो यह सिर्फ ठंड की शरारत नहीं है, यह संकेत हो सकता है कि आपका मूत्राशय, गुर्दे या मूत्रमार्ग ठंड की वजह से संवेदनशील हो रहे हैं. आयुर्वेद में इसे एक बेहद दिलचस्प दृष्टिकोण से समझाया गया है — मौसम, दोष और शरीर का संतुलन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं, जैसे-जैसे तापमान गिरता है, वैसे-वैसे वात और कफ दोष अपना प्रभाव बढ़ाते हैं, और यही बदलाव कई बार मूत्र संबंधी समस्यां बनने में जरा भी देर नहीं लगने देता. इसलिए आज हम आपको ये बताएंगे कि ठंड में यूरिन इंफेक्शन से जुड़ी समस्यां क्यों बढ़ने लगती है.


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ठंड में यूरिन इंफेक्शन क्यों बढ़ता है


सर्दियों में आपका शरीर अपनी गर्मी को बचाने की कोशिश करता है. शरीर की रक्त वाहिकाएँ सिकुड़ने लगती हैं ताकि गर्मी बाहर न निकले. यही सिकुड़न मूत्रमार्ग और उसके आसपास के हिस्सों को थोड़ा संवेदनशील बनाती है, इससे पेशाब साफ़-साफ़ निकल नहीं पाता और रुकावट जैसी स्थिति बनती है, ऐसी स्थिति में बैक्टीरिया को पनपने का मौका मिल जाता है, जिससे यूरिन समस्या बढ़ती है. सर्दियों में प्यास कम लगना भी एक बड़ी वजह है, पर कुछ भी करके हमें पानी पीते रहना चाहिए, नहीं तो पानी कम पीने से मूत्र अधिक गाढ़ा हो जाता है, जो पेशाब के जरिए बाहर निकलने में दिक्कते पैदा करता है. साथ ही गाढ़ा मूत्र बैक्टीरिया के बढ़ने के लिये उपयुक्त वातावरण बनाता है. इसके अलावा ठंड में लोग अक्सर बाथरूम जाने से भी कतराते हैं, पर ये परिणाम कई बार गंभीर हो जाते हैं.


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यूरिन इंफेक्शन के लक्षण पहचानें


सर्दियों के मौसम में शरीर कई बार हल्के संकेत भी ज़्यादा स्पष्ट महसूस नहीं होने देता है, ऊपरी तौर पर सब सामान्य लगता है पर मूत्र तंत्र के भीतर छोटे बदलाव शुरू हो चुके होते हैं. इसलिए UTI को जल्दी पहचानना बेहद जरूरी है ताकि संक्रमण गहराने न पाए. अगर आपको पेशाब करने में हल्की जलन महसूस हो या बार-बार पेशाब की इच्छा के बावजूद बहुत कम मूत्र आ रहा हो, तो इसे साधारण ठंड समझकर टालना समझदारी नहीं है, कुछ लोग इसे पानी कम पीने से जोड़ देते हैं, जबकि यह UTI का शुरुआती चरण हो सकता है.


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सर्दियों में UTI से बचने की ये सावधानियाँ


सावधानियाँ किसी भी संक्रमण से बचने का सबसे सरल तरीका हैं. सर्दियों में वात और कफ दोनों बढ़ते हैं इसलिए आपको ऐसी आदतें अपनानी चाहिए जो शरीर को गर्म रखें, मूत्रमार्ग को साफ रखें और प्यास की कमी को संतुलित करें. पानी पीने की नियमित आदत बनाएं, पेशाब कभी न रोकें, जननांगों की स्वच्छता पर ध्यान दें, गरम और सुपाच्य भोजन ही खाए, बहुत भारी ऊनी कपड़े कभी-कभी पसीने को रोक देते हैं जिससे क्षेत्र नम होकर बैक्टीरिया के लिये अनुकूल वातावरण बना देता है, इसलिए लेयरिंग करें पर ऐसे कपड़े चुनें जिनसे त्वचा सांस ले सके. इन्हें अपनाकर आप सर्दियों में काफी हद तक UTI से बचाव कर सकते हैं.

169 साल पहले 282 सैनिकों के साथ हुई बर्बरता को 12 साल पहले जान सकी दुनिया...
169 साल पहले 282 सैनिकों के साथ हुई बर्बरता को 12 साल पहले जान सकी दुनिया...
वाराणसी: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों की बर्बरता का शिकार बने 282 भारतीय सैनिकों का अंतिम संस्कार अब काशी में किया जाएगा. उनकी अस्थियों को मोक्ष दिलाने के उद्देश्य से उनके संभावित वंशज भी इस ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे. 169 वर्ष पहले हुई इस घटना की जानकारी दुनिया को करीब 12 वर्ष पहले मिली, जबकि वैज्ञानिक शोध और डीएनए परीक्षण के जरिए इन शहीदों की पहचान संभव हो सकी.पंजाब के अमृतसर जिले के अजनाला में वर्ष 2014 में एक कुएं से 282 मानव कंकाल मिले थे. शुरुआत में माना गया कि ये 1947 के विभाजन के दौरान मारे गए लोगों के अवशेष हैं. लेकिन काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट, सीसीएमबी हैदराबाद समेत देश-विदेश के वैज्ञानिकों की टीम ने डीएनए और आइसोटोप अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला कि ये 1857 में शहीद हुए बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सैनिक थे, जिनकी जड़ें गंगा घाटी यानी उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से जुड़ी थीं.एक किताब से खुला इतिहास का राज.पंजाब के इतिहासकार एवं शोधकर्ता सुरिंदर कोचर को अंग्रेज अधिकारी फ्रेडरिक हेनरी कूपर की पुस्तक "क्राइसिस इन पंजाब: फ्रॉम 10 मई अनटिल फॉल ऑफ दिल्ली" मिली. इसमें लिखा था कि मियां मीर में तैनात बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की 26वीं रेजीमेंट के सैनिकों ने 1857 में विद्रोह कर दिया था. अंग्रेजों ने 218 सैनिकों को रावी नदी के किनारे गोली मार दी, जबकि 282 सैनिकों को अजनाला लाकर 237 को गोली मारने के बाद 45 सैनिकों को जिंदा कुएं में फेंक दिया और मिट्टी-चूने से कुएं को बंद कर दिया. बाद में उस स्थान पर गुरुद्वारा बना दिया गया. वर्ष 2014 में उसी कुएं की खुदाई के दौरान ये कंकाल मिले.डीएनए जांच से मिली पहचानपंजाब विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के डॉ. जे.एस. सहरावत के नेतृत्व में बीएचयू, बीरबल साहनी संस्थान और सीसीएमबी के वैज्ञानिकों ने डीएनए और आइसोटोप अध्ययन किया. दोनों अध्ययनों ने पुष्टि की कि ये सैनिक पंजाब के नहीं बल्कि गंगा घाटी क्षेत्र के निवासी थे. इस घटना को दुनिया की सबसे जघन्य ऐतिहासिक घटनाओं में भी गिना जाता है.दक्षिण भारत से आए संभावित वंशजडीएनए सैंपल देने वाराणसी पहुंचे कृतेश तिवारी, जो वर्तमान में दक्षिण भारत के संथूर कस्बे में रहते हैं, बताते हैं कि उनके पूर्वजों का मानना रहा है कि उनका परिवार अजनाला में शहीद हुए सैनिकों का वंशज है. इसी दावे की पुष्टि के लिए उन्होंने qअपना डीएनए सैंपल दिया है. उनका कहना है कि यदि वैज्ञानिक जांच में यह साबित होता है कि उनका परिवार उन्हीं सैनिकों का वंशज है, तो यह उनके लिए गर्व और भावनात्मक संतोष का विषय होगा.2022 से जारी है शोधडॉ. ज्ञानेश्वर चौबे बताते हैं कि वर्ष 2022 से उनकी टीम अजनाला के 282 शहीद सैनिकों पर शोध कर रही है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 में कुएं से मिले कंकालों के अध्ययन से पता चला कि इनमें बड़ी संख्या में गंगा घाटी के लोग थे, जिनमें कई कान्यकुब्ज ब्राह्मण भी शामिल थे। समय के साथ इनके कई परिवार दक्षिण भारत के संथूर क्षेत्र में जाकर बस गए.ALSO READ: रथयात्रा मेला प्लास्टिक मुक्त घोषित, पॉलीथिन इस्तेमाल करने वालों पर नगर निगम की कार्रवाईडॉ. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि जब इस शोध को प्रकाशित किया गया तो कनाडा से समीर पांडेय नामक व्यक्ति का फोन आया। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में लगभग सात पीढ़ी पहले एक सदस्य लापता हो गए थे, जो 1857 में उसी बटालियन में कार्यरत थे और संभवतः अजनाला नरसंहार के शिकार हुए. इसके बाद संभावित वंशजों की तलाश शुरू की गई.उन्होंने कहा कि डीएनए परीक्षण के जरिए वंशजों की पहचान सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है. शोध पूरा होने के बाद अजनाला से मिले सभी शहीद सैनिकों की अस्थियों का काशी में पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा, ताकि 169 साल बाद उन्हें सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई मिल सके.
रथयात्रा मेला प्लास्टिक मुक्त घोषित, पॉलीथिन इस्तेमाल करने वालों पर नगर निगम की कार्रवाई
रथयात्रा मेला प्लास्टिक मुक्त घोषित, पॉलीथिन इस्तेमाल करने वालों पर नगर निगम की कार्रवाई
वाराणसी: ऐतिहासिक तीन दिवसीय रथयात्रा मेले को नगर निगम ने प्लास्टिक (पॉलीथिन) मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया है। मेले में स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए नगर निगम ने व्यापक तैयारियां की हैं। साथ ही प्रतिबंधित पॉलीथिन का उपयोग करने वाले दुकानदारों के खिलाफ अभियान चलाकर चालान और जुर्माने की कार्रवाई भी की जा रही है।नगर निगम के अनुसार पूरे मेला क्षेत्र में 24 घंटे तीन शिफ्टों में विशेष सफाई व्यवस्था लागू की गई है, ताकि श्रद्धालुओं को स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण मिल सके। निगम की टीमें स्थायी और अस्थायी दुकानदारों से संपर्क कर उन्हें दुकान के सामने डस्टबिन रखना, प्रतिबंधित प्लास्टिक का उपयोग न करना और ग्राहकों को केवल कपड़े के थैले उपलब्ध कराने के निर्देश दे रही हैं।नगर निगम ने स्पष्ट किया है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले दुकानदारों के खिलाफ मौके पर चालान कर जुर्माना वसूला जा रहा है। वहीं, जोनल स्वास्थ्य अधिकारी के नेतृत्व में आईसी एक्टिविटी टीम लाउडस्पीकर के जरिए दुकानदारों और श्रद्धालुओं को सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने के लिए जागरूक कर रही है।ALSO READ: वाराणसी की 30 महिलाएं बनी 'सोलर दीदी', नियुक्ति पत्र पाकर खिले चेहरेइसके अलावा मेला क्षेत्र में "स्वच्छ काशी, सुंदर काशी" और "थैला अपना साथ लाएं, प्लास्टिक को दूर भगाएं" जैसे संदेशों वाले पोस्टर भी लगाए गए हैं। नगर निगम ने सभी श्रद्धालुओं और व्यापारियों से प्लास्टिक मुक्त रथयात्रा मेला बनाने में सहयोग की अपील की है।
वाराणसी की 30 महिलाएं बनी 'सोलर दीदी', नियुक्ति पत्र पाकर खिले चेहरे
वाराणसी की 30 महिलाएं बनी 'सोलर दीदी', नियुक्ति पत्र पाकर खिले चेहरे
वाराणसी : भारत सरकार की प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना के अंतर्गत संचालित 'सोलर दीदी' अभियान के तहत वाराणसी में 30 महिलाओं को रोजगार प्रदान किया गया. आर्क सूर्य शक्ति प्राइवेट लिमिटेड की ओर से आयोजित चयन एवं नियुक्ति कार्यक्रम में चयनित महिलाओं को नियुक्ति पत्र सौंपे गए. साथ ही उन्हें सौर ऊर्जा से संबंधित तकनीकी प्रशिक्षण, कार्य प्रणाली और जनजागरूकता अभियान से जुड़ी जिम्मेदारियों की जानकारी दी गई.कार्यक्रम में आर्क सूर्य शक्ति प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक (सीएमडी) अभिषेक सिंह 'चंचल' ने कहा कि प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. उन्होंने उत्तर प्रदेश नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विकास अभिकरण (यूपीनेडा) की भूमिका की भी सराहना करते हुए कहा कि इस योजना के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के साथ रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि महिला सशक्तीकरण किसी भी विकसित राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत है. 'सोलर दीदी' अभियान महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उन्हें स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका भी प्रदान कर रहा है. चयनित महिलाएं अब लोगों को योजना की जानकारी देंगी और सोलर संयंत्र लगाने के लिए प्रेरित करेंगी.अभिषेक सिंह ने बताया कि आर्क परिवार फाउंडेशन समाज सेवा के अपने संकल्प के तहत सौर ऊर्जा के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने का कार्य लगातार कर रहा है. संस्था ऐसे परिवारों तक पहुंच रही है, जो जानकारी के अभाव या आर्थिक कारणों से सोलर संयंत्र नहीं लगवा पा रहे हैं. फाउंडेशन उन्हें प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना, सरकारी सब्सिडी, बैंक ऋण और आवेदन प्रक्रिया की पूरी जानकारी देने के साथ आवश्यक मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराता है. जरूरतमंद परिवारों को संस्था अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग भी प्रदान करती है.ALSO READ: कैंट स्टेशन के बाहर महिलाओं से अश्लील हरकत, एंटी रोमियो टीम ने दो युवकों को किया गिरफ्तारउन्होंने कहा कि फाउंडेशन कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के माध्यम से उद्योग जगत को भी स्वच्छ ऊर्जा अभियान से जोड़ने का प्रयास कर रहा है. उनका मानना है कि सरकार, उद्योग, सामाजिक संस्थाओं और आम नागरिकों के संयुक्त प्रयास से ही भारत ऊर्जा आत्मनिर्भर और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार राष्ट्र बन सकता है. उन्होंने कहा कि सौर ऊर्जा अपनाना केवल बिजली बिल कम करने का माध्यम नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी भी है.