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अटल से नवीन युग तक का सफर, किस-किस ने संभाली BJP अध्यक्ष की कमान

अटल से नवीन युग तक का सफर, किस-किस ने संभाली BJP अध्यक्ष की कमान
Jan 21, 2026, 12:23 PM
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Posted By Preeti Kumari

भारतीय जनता पार्टी में एक बड़ा बदलाव हुआ है. जी हां, भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन के कंधों पर अब राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है. बीते 14 दिसंबर 2025 को नितिन नवीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था, जिसके बाद से चुनावी प्रक्रिया की औपचारिकता पूरी होने के बाद से बीजेपी के 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन के नाम पर मुहर लग गई. जिसने ये तय कर दिया कि आज के बाद से नितिन नवीन राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर तैनात रहेंगे. इस पद के लिए उन्होंने सबसे पहले नामांकन दाखिल किया था, जिसमें वो निर्विरोध चुने गए. इन सभी रश्मों-रिवाजो के बाद से पार्टी ने इस नाम को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए घोषित कर दिया. बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालने से पहले उन्होंने राजधानी दिल्ली के धार्मिक स्थलों पर जाकर मत्था टेका और अपने इस नए सफर के लिए माता का आशीर्वाद लिया. इस नाम के तहत अब बीजेपी का पूरा फोकस भविष्य की लीडरशिप पर जा टिका है. यहीं कारण है कि पार्टी ने 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन का नाम चुना है. उनका कार्यकाल तीन साल के लिए होगा.


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गौरतलब है कि, बिहार के बांकीपुर सीट से पांच बार के विधायक रहे नितिन नवीन को पिछले साल पार्टी ने कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था, साल 2019 में पार्टी में कार्यकारी अध्यक्ष पद का सृजन हुआ. राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर चुने गए नितिन नवीन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका माल्यापर्ण कर उन्हें तहे दिल से बधाई दी. इस मौके पर पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा, ‘मैं BJP का कार्यकर्ता हूं। मैं मानता हूं कि नितिन जी मेरे बॉस हैं। अब वे मेरे काम का आकलन करेंग. बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की ताजपोशी होने से पटना समेत बिहार के सभी भाजपा कार्यालयों में जश्न का माहौल देखने को मिला.


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नवीन को नई पीढ़ी की शक्ति और युवा ऊर्जा की जीत के रूप में देखा जा रहा, क्योंकि, बिहार से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठन को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले नवीन को एक कुशल संगठनकर्ता और मजबूत नेतृत्वकर्ता बताया जा रहा है. पार्टी का कहना है कि नवीन के आने से बीजेपी को कई गुना मजबूती मिलेगी. इतना ही नहीं साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने और पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में पार्टी को मजबूत करने की उम्मीद भी जताई जा रही है.


जानकारी के मुताबिक, 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी की बुनियाद रखी गई. ऐसे में बीजेपी के गठन का 45 पैतालिस साल पुरा हो चुका हैं. इस सियासी इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्‍मण, के. जना कृष्णमूर्ति, वेंकैया नायडू, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, अमित शाह, जगत प्रकाश नड्डा ने पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहते हुए अपनी सेवाएं दी है. जनता पार्टी को छोड़कर अटल बिहार वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विजयाराजे सिधिंया, सिकंदर बख्त जैसे तमाम नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी थी. अटल बिहारी वाजपेयी को को बीजेपी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में चुना गया. इस दौरान वाजपेयी का अधिवेशन में एक भाषण ये था कि "अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा." ये वहीं भाषण है जो आज भी भाजपा के रघों में दौड़ता है. इसके बाद पार्टी की कमान लाल कृष्ण आडवाणी के हाथों सौंप दी गई, आडवाणी 1986 (छियासी) में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे और 1991 (इक्यानबे) तक उन्होंने इस पद की जिम्मेदारी निभाई.


आडवाणी ने उठाया राम मंदिर का मुद्दा


आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति शुरू करने वाले आडवाणी ने राम मंदिर जैसे बड़े मुद्दे को उठाया. जिसे पार्टी ने अपने एजेंडे में शामिल किया. नतीजा 1991 (इक्यानबे) का चुनाव बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे पर लड़ा, जिसके चलते उसने 120 सीटों पर अपना दबदबा कायम रखा. राम मंदिर के इस मुद्दे ने बीजेपी की रफ्तार को इस कदर तेज कर दिया कि हर चुनाव में ये पार्टी जीत की लिस्ट में शामिल होने से कभी पीछे नहीं हटी. साथ ही राम मंदिर का निर्माण कर इतिहास रचने का काम किया. साल 2002 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष वेंकैया नायडु बने, जो साल 2004 तक अपने पद पर बने रहे. नायडू के अध्यक्ष रहते हुए 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में इंडिया शाइनिंग के बुरी तरह हारने के बाद से बीजेपी की कमान फिर से आडवाणी के हाथों में आ जाती है. आडवाणी 2004 में तीसरी बार बीजेपी के अध्यक्ष चुने जाते हैं और 2005 तक पार्टी की कमान संभालने में अपनी भूमिका निभाई. इस पद पर रहते हुए आडवाणी ने पाकिस्तान में जाकर जिन्ना की मजार पर खूब तारीफ की, ये वहीं तारीफ थी जिसने उनके लिए इतनी मुश्किले खड़ी कर दी कि उन्हें बीजेपी अध्यक्ष के पद से हाथ तक धोना पड़ गया था.


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आडवाणी द्वारा अध्यक्ष पद से छोड़ने के बाद से भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में मशहूर राजनाथ सिंह ने साल 2005 में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को संभाला. जिन्होंने 2009 तक बीजेपी के अध्यक्ष रहते हुए अपनी सेवाएं दी, खास बात तो यह है कि राजनाथ सिंह के अध्यक्ष पद पर रहते हुए लोकसभा का चुनाव हुआ, पर इत्तेफाक ऐसा कि, बीजेपी को करारी मात खानी पड़ी. इसका जिम्मेदार पार्टी ने राजनाथ सिंह के मथ्थे जड़ दिया, फिर क्या राजनाथ सिंह का अध्यक्ष पद की कमान नितिन गडकरी के हाथों सौंप दी गई. 2010 में बीजेपी के राष्ट्रीय चुने गए नितिन गडकरी ने तीन साल तक पार्टी संगठन को सियासी धार दिया, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव होने से पहले ही बीजेपी अध्यक्ष के बदलने का सिलसिला भी शुरू हो जाता हैं. फिर क्या गडकरी की जगह दुबारा से राजनाथ सिंह को संगठन की कमान सौंपी दी जाती है. इसी के चलते 2013 में दोबारा से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में राजनाथ का नाम चुना जाता हैं, उनके अगुवाई में 2014 में चुनाव होता है, लेकिन पीएम पद का चेहरा नरेंद्र मोदी ही हो बैठे.


गौर करने वाली बात तो ये है कि राजनाथ को सबसे ज्यादा इस बात का बुरा लगा जब साल 2002 में उनके ही नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी पहले से तीसरे नंबर पर आ खड़ी हुई. राजनाथ के लिए ये वो दौर था, जब बीजेपी ने उन पर हद से ज्यादा भरोसा किया, पर अफसोस की उनकी किसमत ने साथ नहीं दिया, जिसके चलते वो खुद को जिम्मेदार मानने लगे और पार्टी विधानसभा चुनाव में डगमगा गई. पर पार्टी ने एक बार फिर से उन पर विश्वास जताया और 3 वर्षों के लिए उन्हें राज्य इकाई का मुखिया बनाने का विचार किया. मार्च 1997 (सत्तानबे)से जनवरी 2000 तक यूपी में बीजेपी के चीफ रहे राजनाथ सिंह ने साल 2002 तक यूपी के मुख्यमंत्री का भी पद संभाला. उनका सफर यहीं नहीं रूका क्षत्रिय वर्ग से आने वाले राजनाथ बाराबंकी में स्थित हैदरगढ़ से दो बार विधायक भी चुने गए थे.


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इन जिम्मेदारियों के बाद से केंद्रीय मंत्री से राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय नेता तक का सफर तय किया. इनमें वो सारी खूबियां थी जिसने उन्हें भाजपा से आज भी जोड़े रखा है, पद और ज़िम्मेदारी देने वालों के तय किए ढर्रे पर चलने को तैयार रहने वाले राजनाथ सिंह के सफर में एक ऐसा मोड आया जब हर किसी को ये लगा कि उनमें और आडवाणी में खुला युद्ध हो सकता है. वो खूबी कोई और नहीं बल्कि ये थी कि, राजनाथ सिंह युद्ध के मुहाने तक जाने के बाद भी अपने कदम धीरे से पीछे खींच लेते. क्योंकि जीत से ज़्यादा उनका फोकस इस बात पर होता है कि पार्टी की हार न हो. जिससे साफ होता है कि जब युद्ध ही नहीं होगा, तो जय और पराजय का सवाल ही नहीं उठता.


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2014 में अमित शाह ने संभाली


वहीं राजनाथ सिंह के बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद से पार्टी की कमान 2014 में अमित शाह ने संभाली. अमित शाह का अध्यक्ष पद का सफर 2014 से 2020 तक लगातार बना रहा. अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने 2019 में बीजेपी की सत्ता में फिर से एंट्री की. उनका कार्य करने का जो नजरिया था वो मोदी सरकार को इस कदर पसंद आया कि उन्हें केंद्र की मोदी सरकार में गृहमंत्री बनने का एक सुनहरा मौका मिल गया. जिसके बाद किन्हीं कारणों की वजह से अमित शाह को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ गया...अमित शाह के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर पार्टी ने जेपी नड्डा की ताजपोशी की. जेपी नड्डा पहले 2019 में बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष बने और फिर 2020 में राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर निर्वाचित हुए.


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इस तरह 2020 से लेकर अभी तक नड्डा बीजेपी की कमान संभाल रहे थे, उनके अगुवाई में 2024 का लोकसभा चुनाव हुआ. बीजेपी ने सत्ता की हैट्रिक की बदौलत इतिहास रचा और अब जेपी नड्डा की जगह पर नितिन नवीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है. पार्टी ने यह जिम्मेदारी नवीन को देकर ये साबित कर दिया है कि बीजेपी भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए नई लीडरशिप की तैयार में लगी हुई है. क्योंकि, नितिन नवीन कायस्थ समुदाय से आते हैं, जिनकी संख्या चुनावी राजनीति में निर्णायक नहीं मानी जाती. इसके बावजूद भी उन्हें पार्टी का शीर्ष पद सौंपना मामूली नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि बीजेपी नेतृत्व चयन में जातिगत गणित से ऊपर उठकर संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक समझ को प्राथमिकता देने का काम कर रही है.


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नितिन नवीन ऐसे समय में अध्यक्ष बने हैं जब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल और असम में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. इनमें से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल ऐसे राज्य हैं, जहां बीजेपी आज तक अपनी सरकार नहीं बना पाई है. इन चुनौतियों के बीच अब देखना ये होगा कि नितिन नवीन भाजपा का बेडापार लगाने में किस हद तक कामयाब हो पाएंगे या नहीं. ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

शुगर पेशेंट्स फलों से बनाए रखे दूरी, जाने क्यों?
शुगर पेशेंट्स फलों से बनाए रखे दूरी, जाने क्यों?
डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जिसके होने का ज्यादातर लोगों को बहुत देर से पता चलता है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक करीब 90 फीसदी लोगों को देर से पता चलता है कि वे शुगर का शिकार हो गए हैं. बीमारी की चपेट में आने के बाद मरीज को जिंदगी भर दवा के भरोसे शुगर को कंट्रोल रखना पड़ता है. इतना ही नहीं शुगर लेवल न बढ़ जाए, इसके लिए खानपान पर भी खास फोकस रखना काफी जरूरी होता है.जड़ वाली सब्जियों से दूर रहे डायबिटीट मरीज डायबिटीट को लेकर बहुत लोगों का मानना है कि, इस कंडीशन में जड़ वाली सब्जी नहीं खानी चाहिए. आलू से तो दूरी ही बनाकर रखनी चाहिए. वैसे डायबिटीज मरीजों को फल खाने चाहिए या नहीं ये कंफ्यूजन हर किसी के मन में अक्सर बनी रहती है. ये एक मिथक भी है कि शुगर पेशेंट्स को फ्रूट्स भूल से भी नहीं खाने चाहिए. फलों में नेचुरल शुगर (फ्रक्टोज) होता है जो इंसुलिन सेंसिटिविटी को बढ़ा सकती है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन्हें फलों को ही नहीं खाना चाहिए. ऐसे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि, फलों में शुगर के अलावा फाइबर, विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स भी होते हैं. इसलिए बैलेंस तरीके से खाना चाहिए. ज्यादा मात्रा में नहीं, ताकि किसी तरह की कोई भी दिक्कते होने से आप बचें रहे.शुगर का लेवल कितना होना चाहिए ये पहले जानना काफी जरूरी है. बता दें, नॉर्मल शुगर लेवल 120 एमजी/डीएल है. अगर किसी का शुगर लेवल 140 से ज्यादा है तो ये चिंता का कारण है. लेकिन अगर ये 200 के पार है तो तुरंत डॉक्टरी इलाज जरूरी है. कभी-कभी ये लेवल 500 या इससे ज्यादा भी चला जाता है. शुगर को कंट्रोल न किया जाए तो ये धीरे-धीरे शरीर को अंदर से खत्म करती जाती है. वैसे किसी का शुगर लेवल शूट कर जाए और इसे कंट्रोल न करें तो ऑर्गन तक डैमेज हो जाते हैं. एक्सपर्ट से जानें किन फलों को शुगर में खा सकते हैं और किन्हें नहीं?क्यों फलों से बढ़ता है डायबिटीजशुगर में फ्रूट्स को लेकर सबसे बड़ा मिथ ये है कि फलों से डायबिटीज बढ़ जाती है. एक्सपर्ट के मुताबिक सच ये है कि फ्रूट्स नेचुरल शुगर के साथ फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन भी देते हैं. ये तत्व ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में मदद करते हैं. हालांकि आप फलों का सेवन किस तरह कर रहे हैं, इसका ध्यान रखना भी जरूरी है. शुगर के मरीज सेब, अमरूद, नाशपाती, पपीता, ऑरेंज/मौसंबी (साबुत), बैरीज, कीवी और अनार को खा सकते हैं. लेकिन खाने के तरीके पर फोकस रखना है जिसमें मात्रा कम हो और साबुत ही खाना चाहिए. ये फ्रूट्स लो टू मॉर्डरेट ग्लाइसेमिक इंडेक्स के होते हैं और शुगर स्पाइक धीरे करते हैं.शुगर पेशेंट न खाएं ये फलएक रिपोर्ट के अनुसार, डायबिटीज के मरीज आम, केला, चीकू, अंगूर, कस्टर्ड एप्पल और सभी तरह के फ्रूट जूस से दूरी बनाकर रखें तो ही अच्छा है. भले ही जूस फ्रेश ही क्यों न हो फिर भी इसे पीने से बचना चाहिए. दरअसल, जूस में फाइबर निकल जाता है और इसे पीने से शुगर सीधे ब्लड में चली जाती है.
NEET छात्रा मौत मामले में अब होगा पर्दाफाश, CBI ने दर्ज की FIR
NEET छात्रा मौत मामले में अब होगा पर्दाफाश, CBI ने दर्ज की FIR
बिहार की राजधानी पटना में इन दिनों हलचल मचा हुआ है. नीट की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले में एक नया मोड आ गया है. अब इस केस में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी (सीबीआई) ने आधिकारिक तौर पर एफआईआर दर्ज कर ली है. जांच एजेंसी ने इस मामले को स्पेशल केस के रूप में दर्ज करते हुए केस नंबर 7S/26 आवंटित किया है. जिसके बाद से मामले की जांच में जुटी एजेंसी ये पता लगाने में लगी हुई है कि छात्रा की मौत के पीछे साजिश है या फिर कुछ और ही सच्चाई है. जिसे लेकर सीबीआई टीम ने अपनी जांच को और भी तेज कर दिया है.वहीं, इस मामले को लेकर सूत्रों का कहना है कि, एफआईआर दर्ज करने के बाद सीबीआई की टीम अब राज्य पुलिस और गठित की गई विशेष जांच दल यानि (एसआईटी) से अब तक की जांच से जुड़े सभी दस्तावेज, साक्ष्य और केस डायरी को जब्द कर लिया है. इसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी. माना जा रहा है कि सीबीआई की टीम जल्द ही पटना संबंधित अधिकारियों और गवाहों से पूछताछ शुरू कर सकती है.जानिए क्या है नीट छात्रा का मामला दरअसल, यह मामला सामने आते ही राजनीतिक रूप ले बैठा. विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर हमला करते हुए उस पर सवाल उठाने लगे फिर क्या इस मुद्दे के बहाने सदन से लेकर विधानसभा परिसर तक लगातार हंगामा और प्रदर्शन होने लगे. जहां इस मामले में जल्द से जल्द निष्पक्ष जांच की मांग करने लगे. इस बढ़ते राजनीतिक दबाव और जनभावनाओं को देखते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीते 31 जनवरी को केंद्र सरकार से इस प्रकरण की सीबीआई जांच कराने का आग्रह किया, इस अपील के पीछे की वजह ये है कि नीतीश कुमार अपने पार्टी को फजीयत होने से बचाना चाहते है, जिसके चलते प्रदर्शन को देख उनकी बीपी हाई होने लगी.इस बात की जानकारी नीतीश कुमार के पार्टी के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया के जरिए दी थी, राज्य सरकार के काफी अनुरोध करने पर केंद्र की मोदी सरकार ने इस मामले में जांच के लिए अपनी मंजूरी दी, जिसके बाद से सीबीआई ने नीट केस की कमान अपने हाथ में लेते हुए मामले का पर्दाफाश करने में लगी हुई है. यहीं कारण है कि अब हर किसी की निगाहें इस जांच एजेंसी पर जा टिकी हैं.पीड़ित परिजनों का आरोप आपको बता दें, कि छात्रा के पीड़ित परिजनों ने आरोप लगाया था कि एसआईटी उन पर दबाव बना रही है. बार-बार एक ही तरह की बातें पूछी जा रही हैं. वे लोग जांच से संतुष्ट नहीं हैं. परिजनों ने बिहार के डीजीपी से भी जाकर मुलाकात की थी. अब देखना यह होगा कि सीबीआई जांच शुरू करती है तो क्या कुछ निकलकर आता है.
कोडीनयुक्त कफ सिरप तस्करी मामले में 7 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल, केबीएन प्‍लाजा जब्त
कोडीनयुक्त कफ सिरप तस्करी मामले में 7 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल, केबीएन प्‍लाजा जब्त
वाराणसी : कोडीनयुक्त कफ सिरप तस्करी मामले में रोहनिया पुलिस ने व्यापक विवेचना पूर्ण करते हुए मुख्य आरोपी भोला प्रसाद जायसवाल समेत कुल 07 आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया है. यह कार्रवाई पुलिस आयुक्त वाराणसी के निर्देशन में अपराधों की रोकथाम और अवैध मादक पदार्थों की तस्करी के विरुद्ध चलाए जा रहे विशेष अभियान के अंतर्गत की गई. पुलिस उपायुक्त वरुणा जोन के निर्देशन, अपर पुलिस उपायुक्त वरुणा जोन के नेतृत्व तथा सहायक पुलिस आयुक्त रोहनिया एवं प्रभारी निरीक्षक रोहनिया के पर्यवेक्षण में गठित टीम ने सुनियोजित तरीके से साक्ष्य संकलित कर आरोपियों के विरुद्ध मजबूत केस तैयार किया. उधर, कोतवाली में दर्ज मुकदमे में न्‍यायालय के आदेश पर कोतवाली पुलिस ने महमूरगंज स्थित आरोपी भोला जायसवाल की संपत्ति केबीएन प्‍लाजा पर जब्‍ती की कार्रवाई की. इसी संपत्ति को पूर्व में रोहनिया पुलिस ने भी फ्रीज किया था.मुकदमे का पंजीकरण और विवेचना की दिशाथाना रोहनिया कमिश्नरेट वाराणसी पर मु0अ0सं0 0343/2025 धारा 8, 21, 25, 29 एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत केस दर्ज किया गया था. प्रारंभिक जांच में सामने आया कि आरोपी संगठित तरीके से कोडीनयुक्त कफ सिरप की अवैध खरीद-फरोख्त कर रहे थे. मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच दल गठित किया गया, जिसने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, बैंकिंग लेनदेन, परिवहन रिकॉर्ड और प्रयोगशाला रिपोर्ट के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ीं.विवेचना के दौरान ई-वे बिल, बैंक स्टेटमेंट, नगद जमा पर्चियां, विभिन्न बैंकों की सीसीटीवी फुटेज, आयकर विवरणी, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, वाहनों के टोल डेटा, विधि विज्ञान प्रयोगशाला रामनगर की रिपोर्ट, औषधि निरीक्षक की परीक्षण रिपोर्ट तथा संबंधित दवा कंपनियों से प्राप्त दस्तावेजों का सूक्ष्म परीक्षण किया गया. बैंक प्रबंधकों, कैशियरों तथा स्वतंत्र गवाहों के बयान भी दर्ज किए गए. इन सभी साक्ष्यों से यह प्रमाणित हुआ कि आरोपी बड़े पैमाने पर अवैध तस्करी में संलिप्त थे.बरामद कोडीनयुक्त कफ सिरप का विवरणकार्रवाई के दौरान पुलिस ने भारी मात्रा में कोडीनयुक्त कफ सिरप को बरामद किया था. बरामदगी में PHENSEDYL COUGH SYRUP 100 ML की कुल 18,600 शीशियां तथा ESKUF 100 ML COUGH SYRUP की कुल 75,150 शीशियां शामिल हैं. जांच में पुष्टि हुई कि इन दवाओं की वैध आपूर्ति कागजों में दर्शाई जाती थी, जबकि वास्तविक माल को अवैध रूप से अन्य राज्यों और सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता था.अपराध करने का तरीकाविवेचना से यह तथ्य प्रकाश में आया कि अभियुक्तों ने कागजी और फर्जी फर्म बनाकर हवाला के माध्यम से प्राप्त नगद धनराशि को वैध लेनदेन का रूप दिया. पहले नकदी विभिन्न फर्मों के बैंक खातों में जमा कराई जाती थी, फिर उसे अलग-अलग खातों के माध्यम से शैलि ट्रेडर्स के खाते में स्थानांतरित किया जाता था. इस प्रकार अवैध आय को वैध व्यापारिक लेनदेन के रूप में प्रस्तुत किया जाता था.कोडीनयुक्त कफ सिरप को गुप्त स्थानों पर छिपाकर रखा जाता था और आवश्यकता पड़ने पर ट्रांसपोर्ट के जरिए सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता था. जांच में संकेत मिले कि इस नेटवर्क के तार बांग्लादेश सीमा तक जुड़े थे, जहां माल ऊंचे दामों पर बेचा जाता था. इस अवैध कारोबार से अर्जित धन से चल-अचल संपत्तियों का अधिग्रहण किया गया. इस संबंध में धारा 68-एफ एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत भी कार्रवाई की गई है.इस आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्रप्रकरण में में आरोपी आजाद जायसवाल, महेश कुमार सिंह, शिवाकांत उर्फ शिव, स्वपलिन केसरी, दिनेश कुमार यादव, आशीष यादव तथा भोला प्रसाद जायसवाल शामिल हैं. इनमें से भोला प्रसाद को शैली ट्रेडर्स का प्रोपराइटर बताया गया है. सभी आरोपियों के विरुद्ध संकलित साक्ष्यों के आधार पर आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है.ALSO READ : महाशिवरात्रि - एक हजार भक्‍त मंगला आरती में होंगे शामिल, 10 लाख भक्‍तों के पहुंचने का अनुमानमुख्य आरोपी का आपराधिक इतिहासमुख्य आरोपी भोला प्रसाद के विरुद्ध एनडीपीएस एक्ट और अन्य धाराओं में वाराणसी, सोनभद्र, जौनपुर, चंदौली, झारखंड सहित कई जनपदों में अनेक मुकदमे दर्ज हैं. इसके अतिरिक्त सह अभियुक्तों के विरुद्ध भी विभिन्न थानों में मादक पदार्थ तस्करी से जुड़े प्रकरण पंजीकृत पाए गए. पुलिस अन्य राज्यों में दर्ज मामलों की जानकारी भी एकत्र कर रही है. वहीं कोतवाली पुलिस ने भोला जायसवाल के व्‍यवसायिक कांप्‍लेक्‍स केबीएन प्‍लाजा को जब्‍त करने की कार्रवाई की.