अटल से नवीन युग तक का सफर, किस-किस ने संभाली BJP अध्यक्ष की कमान

भारतीय जनता पार्टी में एक बड़ा बदलाव हुआ है. जी हां, भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन के कंधों पर अब राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है. बीते 14 दिसंबर 2025 को नितिन नवीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था, जिसके बाद से चुनावी प्रक्रिया की औपचारिकता पूरी होने के बाद से बीजेपी के 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन के नाम पर मुहर लग गई. जिसने ये तय कर दिया कि आज के बाद से नितिन नवीन राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर तैनात रहेंगे. इस पद के लिए उन्होंने सबसे पहले नामांकन दाखिल किया था, जिसमें वो निर्विरोध चुने गए. इन सभी रश्मों-रिवाजो के बाद से पार्टी ने इस नाम को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए घोषित कर दिया. बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालने से पहले उन्होंने राजधानी दिल्ली के धार्मिक स्थलों पर जाकर मत्था टेका और अपने इस नए सफर के लिए माता का आशीर्वाद लिया. इस नाम के तहत अब बीजेपी का पूरा फोकस भविष्य की लीडरशिप पर जा टिका है. यहीं कारण है कि पार्टी ने 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन का नाम चुना है. उनका कार्यकाल तीन साल के लिए होगा.

गौरतलब है कि, बिहार के बांकीपुर सीट से पांच बार के विधायक रहे नितिन नवीन को पिछले साल पार्टी ने कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था, साल 2019 में पार्टी में कार्यकारी अध्यक्ष पद का सृजन हुआ. राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर चुने गए नितिन नवीन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका माल्यापर्ण कर उन्हें तहे दिल से बधाई दी. इस मौके पर पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा, ‘मैं BJP का कार्यकर्ता हूं। मैं मानता हूं कि नितिन जी मेरे बॉस हैं। अब वे मेरे काम का आकलन करेंग. बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की ताजपोशी होने से पटना समेत बिहार के सभी भाजपा कार्यालयों में जश्न का माहौल देखने को मिला.

नवीन को नई पीढ़ी की शक्ति और युवा ऊर्जा की जीत के रूप में देखा जा रहा, क्योंकि, बिहार से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठन को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले नवीन को एक कुशल संगठनकर्ता और मजबूत नेतृत्वकर्ता बताया जा रहा है. पार्टी का कहना है कि नवीन के आने से बीजेपी को कई गुना मजबूती मिलेगी. इतना ही नहीं साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने और पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में पार्टी को मजबूत करने की उम्मीद भी जताई जा रही है.
जानकारी के मुताबिक, 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी की बुनियाद रखी गई. ऐसे में बीजेपी के गठन का 45 पैतालिस साल पुरा हो चुका हैं. इस सियासी इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्मण, के. जना कृष्णमूर्ति, वेंकैया नायडू, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, अमित शाह, जगत प्रकाश नड्डा ने पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहते हुए अपनी सेवाएं दी है. जनता पार्टी को छोड़कर अटल बिहार वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विजयाराजे सिधिंया, सिकंदर बख्त जैसे तमाम नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी थी. अटल बिहारी वाजपेयी को को बीजेपी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में चुना गया. इस दौरान वाजपेयी का अधिवेशन में एक भाषण ये था कि "अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा." ये वहीं भाषण है जो आज भी भाजपा के रघों में दौड़ता है. इसके बाद पार्टी की कमान लाल कृष्ण आडवाणी के हाथों सौंप दी गई, आडवाणी 1986 (छियासी) में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे और 1991 (इक्यानबे) तक उन्होंने इस पद की जिम्मेदारी निभाई.
आडवाणी ने उठाया राम मंदिर का मुद्दा
आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति शुरू करने वाले आडवाणी ने राम मंदिर जैसे बड़े मुद्दे को उठाया. जिसे पार्टी ने अपने एजेंडे में शामिल किया. नतीजा 1991 (इक्यानबे) का चुनाव बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे पर लड़ा, जिसके चलते उसने 120 सीटों पर अपना दबदबा कायम रखा. राम मंदिर के इस मुद्दे ने बीजेपी की रफ्तार को इस कदर तेज कर दिया कि हर चुनाव में ये पार्टी जीत की लिस्ट में शामिल होने से कभी पीछे नहीं हटी. साथ ही राम मंदिर का निर्माण कर इतिहास रचने का काम किया. साल 2002 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष वेंकैया नायडु बने, जो साल 2004 तक अपने पद पर बने रहे. नायडू के अध्यक्ष रहते हुए 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में इंडिया शाइनिंग के बुरी तरह हारने के बाद से बीजेपी की कमान फिर से आडवाणी के हाथों में आ जाती है. आडवाणी 2004 में तीसरी बार बीजेपी के अध्यक्ष चुने जाते हैं और 2005 तक पार्टी की कमान संभालने में अपनी भूमिका निभाई. इस पद पर रहते हुए आडवाणी ने पाकिस्तान में जाकर जिन्ना की मजार पर खूब तारीफ की, ये वहीं तारीफ थी जिसने उनके लिए इतनी मुश्किले खड़ी कर दी कि उन्हें बीजेपी अध्यक्ष के पद से हाथ तक धोना पड़ गया था.

आडवाणी द्वारा अध्यक्ष पद से छोड़ने के बाद से भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में मशहूर राजनाथ सिंह ने साल 2005 में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को संभाला. जिन्होंने 2009 तक बीजेपी के अध्यक्ष रहते हुए अपनी सेवाएं दी, खास बात तो यह है कि राजनाथ सिंह के अध्यक्ष पद पर रहते हुए लोकसभा का चुनाव हुआ, पर इत्तेफाक ऐसा कि, बीजेपी को करारी मात खानी पड़ी. इसका जिम्मेदार पार्टी ने राजनाथ सिंह के मथ्थे जड़ दिया, फिर क्या राजनाथ सिंह का अध्यक्ष पद की कमान नितिन गडकरी के हाथों सौंप दी गई. 2010 में बीजेपी के राष्ट्रीय चुने गए नितिन गडकरी ने तीन साल तक पार्टी संगठन को सियासी धार दिया, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव होने से पहले ही बीजेपी अध्यक्ष के बदलने का सिलसिला भी शुरू हो जाता हैं. फिर क्या गडकरी की जगह दुबारा से राजनाथ सिंह को संगठन की कमान सौंपी दी जाती है. इसी के चलते 2013 में दोबारा से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में राजनाथ का नाम चुना जाता हैं, उनके अगुवाई में 2014 में चुनाव होता है, लेकिन पीएम पद का चेहरा नरेंद्र मोदी ही हो बैठे.
गौर करने वाली बात तो ये है कि राजनाथ को सबसे ज्यादा इस बात का बुरा लगा जब साल 2002 में उनके ही नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी पहले से तीसरे नंबर पर आ खड़ी हुई. राजनाथ के लिए ये वो दौर था, जब बीजेपी ने उन पर हद से ज्यादा भरोसा किया, पर अफसोस की उनकी किसमत ने साथ नहीं दिया, जिसके चलते वो खुद को जिम्मेदार मानने लगे और पार्टी विधानसभा चुनाव में डगमगा गई. पर पार्टी ने एक बार फिर से उन पर विश्वास जताया और 3 वर्षों के लिए उन्हें राज्य इकाई का मुखिया बनाने का विचार किया. मार्च 1997 (सत्तानबे)से जनवरी 2000 तक यूपी में बीजेपी के चीफ रहे राजनाथ सिंह ने साल 2002 तक यूपी के मुख्यमंत्री का भी पद संभाला. उनका सफर यहीं नहीं रूका क्षत्रिय वर्ग से आने वाले राजनाथ बाराबंकी में स्थित हैदरगढ़ से दो बार विधायक भी चुने गए थे.

इन जिम्मेदारियों के बाद से केंद्रीय मंत्री से राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय नेता तक का सफर तय किया. इनमें वो सारी खूबियां थी जिसने उन्हें भाजपा से आज भी जोड़े रखा है, पद और ज़िम्मेदारी देने वालों के तय किए ढर्रे पर चलने को तैयार रहने वाले राजनाथ सिंह के सफर में एक ऐसा मोड आया जब हर किसी को ये लगा कि उनमें और आडवाणी में खुला युद्ध हो सकता है. वो खूबी कोई और नहीं बल्कि ये थी कि, राजनाथ सिंह युद्ध के मुहाने तक जाने के बाद भी अपने कदम धीरे से पीछे खींच लेते. क्योंकि जीत से ज़्यादा उनका फोकस इस बात पर होता है कि पार्टी की हार न हो. जिससे साफ होता है कि जब युद्ध ही नहीं होगा, तो जय और पराजय का सवाल ही नहीं उठता.

2014 में अमित शाह ने संभाली
वहीं राजनाथ सिंह के बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद से पार्टी की कमान 2014 में अमित शाह ने संभाली. अमित शाह का अध्यक्ष पद का सफर 2014 से 2020 तक लगातार बना रहा. अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने 2019 में बीजेपी की सत्ता में फिर से एंट्री की. उनका कार्य करने का जो नजरिया था वो मोदी सरकार को इस कदर पसंद आया कि उन्हें केंद्र की मोदी सरकार में गृहमंत्री बनने का एक सुनहरा मौका मिल गया. जिसके बाद किन्हीं कारणों की वजह से अमित शाह को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ गया...अमित शाह के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर पार्टी ने जेपी नड्डा की ताजपोशी की. जेपी नड्डा पहले 2019 में बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष बने और फिर 2020 में राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर निर्वाचित हुए.

इस तरह 2020 से लेकर अभी तक नड्डा बीजेपी की कमान संभाल रहे थे, उनके अगुवाई में 2024 का लोकसभा चुनाव हुआ. बीजेपी ने सत्ता की हैट्रिक की बदौलत इतिहास रचा और अब जेपी नड्डा की जगह पर नितिन नवीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है. पार्टी ने यह जिम्मेदारी नवीन को देकर ये साबित कर दिया है कि बीजेपी भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए नई लीडरशिप की तैयार में लगी हुई है. क्योंकि, नितिन नवीन कायस्थ समुदाय से आते हैं, जिनकी संख्या चुनावी राजनीति में निर्णायक नहीं मानी जाती. इसके बावजूद भी उन्हें पार्टी का शीर्ष पद सौंपना मामूली नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि बीजेपी नेतृत्व चयन में जातिगत गणित से ऊपर उठकर संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक समझ को प्राथमिकता देने का काम कर रही है.

नितिन नवीन ऐसे समय में अध्यक्ष बने हैं जब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल और असम में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. इनमें से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल ऐसे राज्य हैं, जहां बीजेपी आज तक अपनी सरकार नहीं बना पाई है. इन चुनौतियों के बीच अब देखना ये होगा कि नितिन नवीन भाजपा का बेडापार लगाने में किस हद तक कामयाब हो पाएंगे या नहीं. ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

