Daily Bulletin Tag
AI गार्गी दैनिक बुलेटिन

बोस्निया नरसंहार के पीछे म्लाडिच का हाथ, जाने कैसे बना खूंखार

बोस्निया नरसंहार के पीछे म्लाडिच का हाथ, जाने कैसे बना खूंखार
Jan 12, 2026, 09:13 AM
|
Posted By Preeti Kumari

Bosnia War: बोस्निया युद्ध एक ऐसा नरसंहार था जिसमें 8000 मुसलमानों और छोटे-छोटे बच्चों को तक मौत के घाट उतारा गया था. मृतकों में 12 से 77 साल के लोग शामिल थे. यह नरसंहार इतना भयानक और डरावना था कि हर किसी के रोंगटे खड़े हो गए, क्योंकि ज्यादातर लोगों को प्वॉइंट ब्लैंक रेंज यानि (माथे के बीच) पर गोली मारी गई थी. दरअसल, बोस्निया युद्ध (1992-1995) यूगोस्लाविया के विघटन के बाद से बोस्निया और हर्जेगोविना में लड़ा गया एक भीषण जातीय संघर्ष युद्ध था, इसके पीछे की सच्चाई जातीय सफाई, नरसंहार और क्षेत्रीय प्रभुत्व की महत्वाकांक्षा थी, जिसमें सर्बों, क्रोएशियाई और बोस्नियाई ये तीनों मुस्लिम समुदायों वाले आबादी के बीच भयानक हिंसा, बड़े पैमाने पर हत्याएं यानि (विशेषकर स्रेब्रेनिका में), सामूहिक बलात्कार और लाखों लोगों का विस्थापन हुआ, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से यूरोप का सबसे विनाशकारी संघर्ष माना जाता है, इस युद्ध का असर इतना भयानक हुआ कि देश को दो संस्थाओं में विभाजित तक होना पड़ा था.


hjkl


जाने कहा लड़ा गया बोस्निया युद्ध


सन् (1992-1995) में लड़ा गया बोस्निया युद्ध दक्षिण-पूर्वी यूरोप के बोस्निया और हर्जेगोविना देश में लड़ा गया था, जो यूगोस्लाविया के विघटन के बाद से एक स्वतंत्र देश बनने के लिए बोस्नियाई सर्बों यानि (सर्बिया समर्थित) और बोस्नियाई सरकार (बोस्नियाक/मुस्लिम और क्रोएशियाई समर्थित) के बीच एक जातीय गृहयुद्ध था, जिसमें मुख्य रूप से तीन समुदाय पहली बोस्नियाई मुसलमानों, दूसरी क्रोएट्स और तीसरी सर्बों के बीच संघर्ष छिड़ा था. इस देश का नाम बोस्निया और हर्जेगोविना यानि (उदाहरण के तौर पर जाने तो बोस्निया) है, जो बाल्कन प्रायद्वीप पर स्थित एक क्षेत्र का नाम है, इसी क्षेत्र में बोस्निया युद्ध को अंजाम दिया गया था, इसलिए इसे ही बोस्निया युद्ध कहा जाता है.


t


आखिर इस युद्ध का नाम बोस्निया क्यों पड़ा


बता दें, हजारों की तादात में नरसंहार करने वाला युद्ध 'बोस्निया' एक क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम है. यह देश दो मुख्य क्षेत्रों - बोस्निया (उत्तरी और मध्य भाग) और हर्जेगोविना (दक्षिणी भाग) से मिलकर बना है, इसलिए इसका पूरा नाम बोस्निया और हर्जेगोविना है, जिसे बोस्निया के नाम से भी जाना जाता है. क्योंकि, 1992 में जब यूगोस्लाविया से अलग होकर बोस्निया और हर्जेगोविना एक स्वतंत्र देश बना था, तब इस क्षेत्र के कई जातीय समूह (बोस्नियाक, सर्ब और क्रोएट्स) के बीच तनाव बढ़ने लगा, जिसके चलते एक बड़ा महायुद्ध छिड़ गया. इसी युद्ध ने लाखों जातीयों का खून बहाने का काम कर बैठा.


ू


क्यों छिड़ा बोस्निया नरसंहार


यूगोस्लाविया के विघटन के बाद बोस्निया और हर्ज़ेगोविना में बोस्निया युद्ध छिड़ा, इस नरसंहार के पनपने की वजह कोई मामूली सी नहीं, बल्कि जातीय तनाव और 'ग्रेटर सर्बिया' बनाने की सर्बों की महत्वाकांक्षा थी, जहाँ तीन समुदायों के बीच भूमि और नियंत्रण के लिए खूनी संघर्ष का महायुद्ध देखने को मिला. हर तरफ लोगों की चीख-पुकार की आवाज सुनाई देती, तो खून से लथपथ वो जमीनें जो हर एक मौत का हिसाब मांगती, इस युद्ध ने जातीय समाज का पुरी तरह से सफाया ही कर डाला था, लेकिन इस युद्ध में बोस्निया के स्वतंत्र होने के बाद से जैसे ही सर्बों समुदाय ने स्वतंत्रता का विरोध जताना शुरू और अपनी अलग इकाई बनाने की कोशिश की, तो व्यापक हिंसा ने भी उग्र होना लाजमी समझा.


ब


जहां सर्ब लोगों को इस बात का डर सताने लगा कि बोस्निया के मुसलमान कम जनसंख्या होने के बावजूद उनपर अधिकार जमाना चाहते हैं, इस बीच सर्ब सेना की कमान जनरल रैट्को म्लाडिच के हाथों सौंप दी गई, लेकिन स्थिति को संभालने के बजाय इस खूंखार कमांडर ने इनका खूब फायदा उठाया और बोस्निया की लड़ाई के दौरान बर्बर अभियान चलाने में जरा भी कसर नहीं छोड़ी, जी हां, हर उस विद्रोही की हत्या करवाई जिसने भी सेना या सर्ब सत्ता का विरोध करने की आवाज उठाई थी.


ौ


‘नरसंहार’ को आर्मी ने दिया था अंजाम


इस नरसंहार की समाप्ति के बाद से बोस्निया के पूर्व कमांडर जनरल रैट्को म्लाडिच बूचर ऑफ बोस्निया के नाम से मशहूर हो गया. गौरतलब है कि आज से करीब 22 साल पहले यानि (साल 1995) में ‘रैट्को म्लाडिच’ ने युरोप के सार्बिया में स्थित मुस्लमानों की कमान संभालने का फायदा उठाते हुए बोस्निया नरसंहार में अहम भूमिका निभाई थी. ‘रैट्को म्लाडिच’ एक आर्मी जनरल थे, जिन्हें दुनिया ‘बोस्निया का कसाई’ और ‘बोस्निया का कसाब’ के नाम से आज भी जानती है. बोस्निया के इतिहास में दर्ज 1995 की लड़ाई के दौरान इन्होंने हैवानियत और बर्बरता का अभियान चलाया था.


ु


वहीं सन् 1992 में बोस्नियाई मुस्लमानों और क्रोएशियाई लोगों ने आजादी के लिए कराये गए जनमत संग्रह के पक्ष में वोट दिया, जिसका सर्बिया के लोगों ने बहिष्कार कर दिया. इसके बाद सर्ब और मुस्लिम समुदाय में इस बात को लेकर विरोध छिड़ गया कि नया देश कैसे बनेगा. इसी के चलते यूरोप के तीनों समाजों में लड़ाई की आग ज्वाला मुखी की तरह फटने लगी. जिसकी स्थिती महासंग्राम के रूप में बदल गई थी. इस लड़ाई में दर्ज आकड़ों के मुताबिक, इसमें एक ओर करीब 1 लाख लोगों ने अपनी जान गवाई, तो दूसरी ओर 22 लाख लोग घर से बेघर हो गए थे.


इस घटना ने म्लाडिच को बनाया खूंखार


‘रैट्को म्लाडिच’ की हरकतों से आगबबूला हुए हेग स्थित ‘यूनाइटेड नेशन ट्राइब्यूनल’ ने उन पर लगे 11 आरोपों में से 10 कारनामों के लिए कसूरवार ठहराया, जिसके चलते उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, पर अफसोस की जिस वक्त उन्हें सजा सुनाई गई उस दौरान वह कोर्ट में मौजूद ही नहीं थे, क्योकि कोर्ट ने उन्हें कोर्ट परिसर में खड़े होकर चिल्लाने के आरोप में सजा सुनाते हुए कोर्ट से बाहर निकाल दिया था. सजा से बचने के लिए म्लाडिच इधर-उधर छिपने लगा. हैरानी इस बात की है कि छह साल, पांच महीने और छब्बीस दिन से पुलिस की गिरफ़्त से भागने वाला ‘बोस्निया का कसाई’ यानि रैट्को म्लाडिच को साल 2011 में आखिरकार पुलिस ने धर-दबोच लिया. फिर क्या, म्लाडिच के खिलाफ सुनवाई करते हुए ‘यूनाइटेड नेशन ट्राइब्यूनल’ ने आजीवन सजा सुनाई.


ै


बड़ी बात तो यह है कि, बोस्निया का कसाई कहे जाने वाले रैट्को म्लाडिच को मुसल्मानों से नफरत थी. इसकी कई वजह थी, पहली उनके बचपन से जुड़ी थी, साल 1945 में जब रैट्को म्लाडिच 2 साल के थे तब उनके पिता नाज़ी समर्थक फौज से लड़ते हुए अपनी जान गंवा बैठे थे, इसके अलावा दूसरी वजह यह रही कि साल 1995 में उनकी 23 साल की बेटी अन्ना को सार्बिया की राजधानी के नाम से मशहूर बेलग्रेड में गोली मार दी गई थी. इन घटनाओं से वो इस कदर आहत हो बैठे थे कि उनके दिलो-दिमाग में मुस्लमानों के लिए कूट-कूटकर नफरत भर गई. धीरे -धीरे ये नफरत महायुद्ध में बदल गई. जिसने लोखों लोगों की जान लेने के बाद से ही चैन की सांस ली.

काशी में अमित शाह का दौरा, 7 अक्टूबर को सेवा संकल्प यात्रा का स्वागत
काशी में अमित शाह का दौरा, 7 अक्टूबर को सेवा संकल्प यात्रा का स्वागत
वाराणसी :केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 7 अक्टूबर को काशी आ सकते हैं। इस दौरान वह गुजरात के वडनगर से काशी पहुंचने वाली सेवा संकल्प यात्रा का स्वागत करेंगे। यात्रा में शामिल लोग गुजरात की नदियों का जल लेकर आएंगे, जिससे बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक किया जाएगा।यह यात्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन, 17 सितंबर से शुरू हुए सेवा संकल्प अभियान का हिस्सा है। यह अभियान 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक चलेगा। इसके तहत देशभर में सेवा, स्वच्छता, पौधरोपण और जनकल्याण से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।सेवा संकल्प यात्रा वडनगर से काशी तक पहुंच रही है। वडनगर प्रधानमंत्री मोदी का जन्मस्थान है, जबकि काशी उनका संसदीय क्षेत्र है। यात्रा के दौरान कई राज्यों और जिलों से गुजरते हुए लोगों को सेवा और जनभागीदारी का संदेश दिया जा रहा है।काशी पहुंचने पर यात्रा का स्वागत किया जाएगा और बाबा विश्वनाथ के दरबार में विशेष पूजा-अर्चना व जलाभिषेक का कार्यक्रम होगा। इस मौके पर कई जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के शामिल होने की संभावना है।ALSO READ :पूर्व मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र ने संस्कृत विश्वविद्यालय के विकास कार्यों का किया निरीक्षण
पूर्व मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र ने संस्कृत विश्वविद्यालय के विकास कार्यों का किया निरीक्षण
पूर्व मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र ने संस्कृत विश्वविद्यालय के विकास कार्यों का किया निरीक्षण
वाराणसी: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एवं सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी दुर्गा शंकर मिश्र ने रविवार को सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी पहुंचकर परिसर में चल रहे विकास एवं निर्माण कार्यों का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने संग्रहालय, लालभवन, पाणिनी भवन, शताब्दी भवन अतिथि गृह, श्रमण विद्या संकाय, श्री श्री आनंदमयी महिला छात्रावास और ऑनलाइन संस्कृत प्रशिक्षण केंद्र का जायजा लिया।निरीक्षण के दौरान दुर्गा शंकर मिश्र ने संबंधित अधिकारियों और कार्यदायी संस्थाओं से निर्माण कार्यों की प्रगति की जानकारी ली। उन्होंने कार्यों को गुणवत्तापूर्ण तरीके से निर्धारित समय सीमा में पूरा करने और जरूरत के अनुसार कार्यों में तेजी लाने के निर्देश दिए।ऑनलाइन संस्कृत शिक्षा व्यवस्था का लिया जायजाऑनलाइन संस्कृत प्रशिक्षण केंद्र में उन्होंने संचालित ऑनलाइन डिप्लोमा कक्षाओं का भौतिक अवलोकन किया। उन्होंने तकनीकी और शिक्षण व्यवस्था की जानकारी लेते हुए इसे और प्रभावी एवं गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन दिया। साथ ही आधुनिक तकनीक के माध्यम से संस्कृत शिक्षा को देश-विदेश तक पहुंचाने की संभावनाओं पर जोर दिया।पांडुलिपियों को बताया भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य निधिदुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटलीकरण कार्यों का भी उन्होंने निरीक्षण किया। ‘उत्कृष्ट ज्ञान भारतम्’ द्वारा किए जा रहे वैज्ञानिक ट्रीटमेंट और डिजिटलीकरण की जानकारी लेते हुए उन्होंने कहा कि ये पांडुलिपियां भारतीय मनीषा की अमूल्य ज्ञान-संपदा हैं। इनका वैज्ञानिक संरक्षण और डिजिटलीकरण आने वाली पीढ़ियों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है।संग्रहालय के निरीक्षण के दौरान उन्होंने ऐतिहासिक एवं ज्ञानपरक सामग्री को देखा और इसके संरक्षण, संवर्धन तथा प्रभावी प्रस्तुतीकरण पर जोर दिया।सीएसआर से हो रहे विकास कार्यों की सराहनादुर्गा शंकर मिश्र ने विश्वविद्यालय में चल रहे विकास कार्यों पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सीएसआर फंड के माध्यम से परिसर में विकास कार्य कराए जा रहे हैं और विद्यार्थियों को शुद्ध पेयजल सहित बेहतर संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में काम हुआ है। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा के प्रयासों की सराहना की।इस अवसर पर कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने दुर्गा शंकर मिश्र का पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक और ज्ञानपरक विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसे आधुनिक तकनीक से जोड़ना समय की आवश्यकता है। पांडुलिपियों का संरक्षण, संग्रहालय का संवर्धन और ऑनलाइन संस्कृत शिक्षा का विस्तार इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।ALSO READ: जम्मू-कटरा के लिए 29 सितंबर को रवाना होंगी यूपी और पूर्वांचल की टीमें...निरीक्षण के दौरान कुलानुशासक, वैज्ञानिक प्रो. जितेन्द्र कुमार अधिकारी, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, डॉ. विशाखा शुक्ला, डॉ. विजेन्द्र आर्य, डॉ. विमल कुमार त्रिपाठी सहित संबंधित कार्यदायी संस्थाओं के प्रतिनिधि मौजूद रहे।
जम्मू-कटरा के लिए 29 सितंबर को रवाना होंगी यूपी और पूर्वांचल की टीमें...
जम्मू-कटरा के लिए 29 सितंबर को रवाना होंगी यूपी और पूर्वांचल की टीमें...
वाराणसी:T10 टेनिस बॉल क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के तत्वावधान में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में प्रतिभाग करने के लिए उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल की टीमें 29 सितंबर को जम्मू-कटरा के लिए रवाना होंगी। प्रतियोगिता को लेकर खिलाड़ियों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। राष्ट्रीय स्तर के इस आयोजन में प्रदेश और पूर्वांचल का प्रतिनिधित्व करने जा रहे खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाने के लिए *रमना ग्राम प्रधान अमित कुमार पटेल* और *BHU चौकी इंचार्ज सौरभ तिवारी* बिरला ग्राउंड पहुंचे।इस दौरान दोनों ने खिलाड़ियों से मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया और आगामी प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने खिलाड़ियों से कहा कि राष्ट्रीय स्तर के मंच पर खेलते समय जीत हासिल करना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ अनुशासन, टीम भावना और खेल भावना का पालन करना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने खिलाड़ियों से मैदान पर एकजुट होकर पूरी मेहनत, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच के साथ खेलने का आह्वान किया।उन्होंने कहा कि खिलाड़ी जब राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल का प्रतिनिधित्व करते हैं तो उनके प्रदर्शन के साथ-साथ उनका व्यवहार और अनुशासन भी क्षेत्र की पहचान बनता है। ऐसे में सभी खिलाड़ी आपसी तालमेल बनाए रखते हुए बेहतर प्रदर्शन करें और खेल के नियमों का सम्मान करें।उत्तर प्रदेश की टीम में कप्तान कार्तिक गुप्ता के साथ विनायक जायसवाल, हर्षित विश्वकर्मा, सूरज यादव, उज्जवल, अंकित, रोहित, सिद्धार्थ, मिलित, ऋषभ, हिमांशु, रौनक और हर्ष शामिल हैं।वहीं पूर्वांचल की टीम की कमान कृष्णा जायसवाल संभालेंगे। टीम में प्रथम जायसवाल, आर्यन चौबे, बादल, आयुष चौबे, प्रीतम, सौरभ, वैभव, अनवर, सार्थक, यश सिंह, मयंक और पृथ्वी शामिल हैं।खिलाड़ियों ने भी आगामी राष्ट्रीय प्रतियोगिता को लेकर उत्साह व्यक्त किया। खिलाड़ियों ने कहा कि वे पूरी तैयारी और आत्मविश्वास के साथ जम्मू-कटरा पहुंचेंगे तथा मैदान पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का प्रयास करेंगे। खिलाड़ियों ने उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल की टीम की गरिमा बनाए रखने तथा खेल भावना के साथ प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का संकल्प लिया।ALSO READ: देह व्यापार की सूचना पर पुलिस ने गेस्ट हाउस में मारा छापादेह व्यापार की सूचना पर पुलिस ने गेस्ट हाउस में मारा छापा29 सितंबर को दोनों टीमें जम्मू-कटरा के लिए रवाना होंगी, जहां राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचने वाली टीमों के साथ मुकाबला होगा।