बोस्निया नरसंहार के पीछे म्लाडिच का हाथ, जाने कैसे बना खूंखार

Bosnia War: बोस्निया युद्ध एक ऐसा नरसंहार था जिसमें 8000 मुसलमानों और छोटे-छोटे बच्चों को तक मौत के घाट उतारा गया था. मृतकों में 12 से 77 साल के लोग शामिल थे. यह नरसंहार इतना भयानक और डरावना था कि हर किसी के रोंगटे खड़े हो गए, क्योंकि ज्यादातर लोगों को प्वॉइंट ब्लैंक रेंज यानि (माथे के बीच) पर गोली मारी गई थी. दरअसल, बोस्निया युद्ध (1992-1995) यूगोस्लाविया के विघटन के बाद से बोस्निया और हर्जेगोविना में लड़ा गया एक भीषण जातीय संघर्ष युद्ध था, इसके पीछे की सच्चाई जातीय सफाई, नरसंहार और क्षेत्रीय प्रभुत्व की महत्वाकांक्षा थी, जिसमें सर्बों, क्रोएशियाई और बोस्नियाई ये तीनों मुस्लिम समुदायों वाले आबादी के बीच भयानक हिंसा, बड़े पैमाने पर हत्याएं यानि (विशेषकर स्रेब्रेनिका में), सामूहिक बलात्कार और लाखों लोगों का विस्थापन हुआ, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से यूरोप का सबसे विनाशकारी संघर्ष माना जाता है, इस युद्ध का असर इतना भयानक हुआ कि देश को दो संस्थाओं में विभाजित तक होना पड़ा था.

जाने कहा लड़ा गया बोस्निया युद्ध
सन् (1992-1995) में लड़ा गया बोस्निया युद्ध दक्षिण-पूर्वी यूरोप के बोस्निया और हर्जेगोविना देश में लड़ा गया था, जो यूगोस्लाविया के विघटन के बाद से एक स्वतंत्र देश बनने के लिए बोस्नियाई सर्बों यानि (सर्बिया समर्थित) और बोस्नियाई सरकार (बोस्नियाक/मुस्लिम और क्रोएशियाई समर्थित) के बीच एक जातीय गृहयुद्ध था, जिसमें मुख्य रूप से तीन समुदाय पहली बोस्नियाई मुसलमानों, दूसरी क्रोएट्स और तीसरी सर्बों के बीच संघर्ष छिड़ा था. इस देश का नाम बोस्निया और हर्जेगोविना यानि (उदाहरण के तौर पर जाने तो बोस्निया) है, जो बाल्कन प्रायद्वीप पर स्थित एक क्षेत्र का नाम है, इसी क्षेत्र में बोस्निया युद्ध को अंजाम दिया गया था, इसलिए इसे ही बोस्निया युद्ध कहा जाता है.

आखिर इस युद्ध का नाम बोस्निया क्यों पड़ा
बता दें, हजारों की तादात में नरसंहार करने वाला युद्ध 'बोस्निया' एक क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम है. यह देश दो मुख्य क्षेत्रों - बोस्निया (उत्तरी और मध्य भाग) और हर्जेगोविना (दक्षिणी भाग) से मिलकर बना है, इसलिए इसका पूरा नाम बोस्निया और हर्जेगोविना है, जिसे बोस्निया के नाम से भी जाना जाता है. क्योंकि, 1992 में जब यूगोस्लाविया से अलग होकर बोस्निया और हर्जेगोविना एक स्वतंत्र देश बना था, तब इस क्षेत्र के कई जातीय समूह (बोस्नियाक, सर्ब और क्रोएट्स) के बीच तनाव बढ़ने लगा, जिसके चलते एक बड़ा महायुद्ध छिड़ गया. इसी युद्ध ने लाखों जातीयों का खून बहाने का काम कर बैठा.

क्यों छिड़ा बोस्निया नरसंहार
यूगोस्लाविया के विघटन के बाद बोस्निया और हर्ज़ेगोविना में बोस्निया युद्ध छिड़ा, इस नरसंहार के पनपने की वजह कोई मामूली सी नहीं, बल्कि जातीय तनाव और 'ग्रेटर सर्बिया' बनाने की सर्बों की महत्वाकांक्षा थी, जहाँ तीन समुदायों के बीच भूमि और नियंत्रण के लिए खूनी संघर्ष का महायुद्ध देखने को मिला. हर तरफ लोगों की चीख-पुकार की आवाज सुनाई देती, तो खून से लथपथ वो जमीनें जो हर एक मौत का हिसाब मांगती, इस युद्ध ने जातीय समाज का पुरी तरह से सफाया ही कर डाला था, लेकिन इस युद्ध में बोस्निया के स्वतंत्र होने के बाद से जैसे ही सर्बों समुदाय ने स्वतंत्रता का विरोध जताना शुरू और अपनी अलग इकाई बनाने की कोशिश की, तो व्यापक हिंसा ने भी उग्र होना लाजमी समझा.

जहां सर्ब लोगों को इस बात का डर सताने लगा कि बोस्निया के मुसलमान कम जनसंख्या होने के बावजूद उनपर अधिकार जमाना चाहते हैं, इस बीच सर्ब सेना की कमान जनरल रैट्को म्लाडिच के हाथों सौंप दी गई, लेकिन स्थिति को संभालने के बजाय इस खूंखार कमांडर ने इनका खूब फायदा उठाया और बोस्निया की लड़ाई के दौरान बर्बर अभियान चलाने में जरा भी कसर नहीं छोड़ी, जी हां, हर उस विद्रोही की हत्या करवाई जिसने भी सेना या सर्ब सत्ता का विरोध करने की आवाज उठाई थी.

‘नरसंहार’ को आर्मी ने दिया था अंजाम
इस नरसंहार की समाप्ति के बाद से बोस्निया के पूर्व कमांडर जनरल रैट्को म्लाडिच बूचर ऑफ बोस्निया के नाम से मशहूर हो गया. गौरतलब है कि आज से करीब 22 साल पहले यानि (साल 1995) में ‘रैट्को म्लाडिच’ ने युरोप के सार्बिया में स्थित मुस्लमानों की कमान संभालने का फायदा उठाते हुए बोस्निया नरसंहार में अहम भूमिका निभाई थी. ‘रैट्को म्लाडिच’ एक आर्मी जनरल थे, जिन्हें दुनिया ‘बोस्निया का कसाई’ और ‘बोस्निया का कसाब’ के नाम से आज भी जानती है. बोस्निया के इतिहास में दर्ज 1995 की लड़ाई के दौरान इन्होंने हैवानियत और बर्बरता का अभियान चलाया था.

वहीं सन् 1992 में बोस्नियाई मुस्लमानों और क्रोएशियाई लोगों ने आजादी के लिए कराये गए जनमत संग्रह के पक्ष में वोट दिया, जिसका सर्बिया के लोगों ने बहिष्कार कर दिया. इसके बाद सर्ब और मुस्लिम समुदाय में इस बात को लेकर विरोध छिड़ गया कि नया देश कैसे बनेगा. इसी के चलते यूरोप के तीनों समाजों में लड़ाई की आग ज्वाला मुखी की तरह फटने लगी. जिसकी स्थिती महासंग्राम के रूप में बदल गई थी. इस लड़ाई में दर्ज आकड़ों के मुताबिक, इसमें एक ओर करीब 1 लाख लोगों ने अपनी जान गवाई, तो दूसरी ओर 22 लाख लोग घर से बेघर हो गए थे.
इस घटना ने म्लाडिच को बनाया खूंखार
‘रैट्को म्लाडिच’ की हरकतों से आगबबूला हुए हेग स्थित ‘यूनाइटेड नेशन ट्राइब्यूनल’ ने उन पर लगे 11 आरोपों में से 10 कारनामों के लिए कसूरवार ठहराया, जिसके चलते उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, पर अफसोस की जिस वक्त उन्हें सजा सुनाई गई उस दौरान वह कोर्ट में मौजूद ही नहीं थे, क्योकि कोर्ट ने उन्हें कोर्ट परिसर में खड़े होकर चिल्लाने के आरोप में सजा सुनाते हुए कोर्ट से बाहर निकाल दिया था. सजा से बचने के लिए म्लाडिच इधर-उधर छिपने लगा. हैरानी इस बात की है कि छह साल, पांच महीने और छब्बीस दिन से पुलिस की गिरफ़्त से भागने वाला ‘बोस्निया का कसाई’ यानि रैट्को म्लाडिच को साल 2011 में आखिरकार पुलिस ने धर-दबोच लिया. फिर क्या, म्लाडिच के खिलाफ सुनवाई करते हुए ‘यूनाइटेड नेशन ट्राइब्यूनल’ ने आजीवन सजा सुनाई.

बड़ी बात तो यह है कि, बोस्निया का कसाई कहे जाने वाले रैट्को म्लाडिच को मुसल्मानों से नफरत थी. इसकी कई वजह थी, पहली उनके बचपन से जुड़ी थी, साल 1945 में जब रैट्को म्लाडिच 2 साल के थे तब उनके पिता नाज़ी समर्थक फौज से लड़ते हुए अपनी जान गंवा बैठे थे, इसके अलावा दूसरी वजह यह रही कि साल 1995 में उनकी 23 साल की बेटी अन्ना को सार्बिया की राजधानी के नाम से मशहूर बेलग्रेड में गोली मार दी गई थी. इन घटनाओं से वो इस कदर आहत हो बैठे थे कि उनके दिलो-दिमाग में मुस्लमानों के लिए कूट-कूटकर नफरत भर गई. धीरे -धीरे ये नफरत महायुद्ध में बदल गई. जिसने लोखों लोगों की जान लेने के बाद से ही चैन की सांस ली.



