RJD का अंदरूनी कलेश हुआ उजागर, रोहिणी ने किया तंज

क़ानूनी शिकंजा जब सियासत पर कसता है, तो अक्सर उसका असर अदालत की चौखट तक सीमित नहीं रहता. कुछ ऐसा ही राष्ट्रीय जनता दल के साथ भी हो रहा है. दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित सीबीआई अदालत के एक फ़ैसले ने न सिर्फ़ लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार को मुश्किलों में डाला हैं, बल्कि उस विरासत की नींव को भी हिला कर रख दिया है. जिस पर तीन दशकों से बिहार की राजनीति टिकी रही है. बता दें, अदालत ने ज़मीन के बदले नौकरी घोटाला मामले में सुनवाई करते हुए राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, मीसा भारती समेत तमाम आरोपितों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धाराओं में मुक़दमा चलाने का आदेश दे दिया है. कोर्ट का यह फैसला अपने आप में काफी गंभीर मुद्दा है,

लेकिन इससे बड़ा सियासी संकेत उस प्रतिक्रिया में छिपा है, जो लालू की बेटी रोहिणी आचार्य द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर किया गया वो पोस्ट है, जिसने राजद की अंदरूनी सियासत को समाज के सामने लाकर खड़ा कर दिया. रोहिणी ने तंज करते हुए लिखा- 'बड़ी ही शिद्दत से बनायी और खड़ी की गयी ‘बड़ी विरासत’ को तहस-नहस करने के लिए परायों की ज़रूरत नहीं होती, अपने और चंद षड्यंत्रकारी ‘नए बने अपने’ ही काफ़ी होते हैं।' जिस पहचान और वजूद की वजह से सब कुछ है, उसी को मिटाने पर जब अपने ही आमादा हो जाएं, तो हैरानी लाजमी है, उनके शब्दों में अहंकार साफ़ दिखता है. हालांकि, इस टिप्पणी का राजनीतिक गलियारों में सीधा मतलब तेजस्वी यादव के रणनीतिकार संजय यादव और सोशल मीडिया संचालन से जुड़े रमीज नेमत से जोड़ा जा रहा है. जो चर्चा का विषय बन बैठा है.

जाने कौन है संजय यादव
आपको बता दें कि, संजय यादव को तेजस्वी की राजनीति का ‘माइंड’ मास्टर माना जाता है, जिन्होंने कॉरपोरेट नौकरी छोड़कर राजद की रणनीति संभालने का अपने कंधों पर जिम्मा उठा रखा है. वहीं रमीज नेमत की बात करें तो इनका नाम पहले भी कई विवादों से जुड़ा रहा है और पार्टी के डिजिटल नैरेटिव पर उनकी पकड़ बताई जाती है. रोहिणी के संकेतों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पार्टी की दिशा परिवार के बाहर से तय हो रही है. यह पहला मौका नहीं है जब लालू कुनबे में 'भीतरघात' की बात सार्वजनिक हुई हो, इससे पहले भी तेज प्रताप यादव ‘जयचंद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर अपनों पर ही तीर चला चुके हैं. इसके बाद अब रोहिणी आचार्य के बयान वो भी ऐसे समय में आया है जब लालू परिवार खुद एक भ्रष्टाचार केस से जूझ रहा है. फर्क सिर्फ़ इतना है कि इस बार बात केवल राजनीतिक रणनीति की नहीं, बल्कि विरासत और नेतृत्व की भी हो गई है.

परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है राजद की राजनीति
वहीं राजद की राजनीति हमेशा परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लालू यादव की करिश्माई छवि, सामाजिक न्याय का नैरेटिव और यादव-मुस्लिम समीकरण, यही पार्टी की शुरू से ताक़त रही है. लेकिन अदालत के फ़ैसले और परिवार के भीतर उभरते मतभेदों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाला समय सिर्फ़ कानूनी लड़ाई का नहीं, बल्कि नेतृत्व के पुनर्परिभाषण का भी हो सकता है.

राउज एवेन्यू की अदालत में चल रही मुक़दमेबाज़ी अब सिर्फ़ काग़ज़ों और तारीख़ों की कहानी नहीं रही, यह लड़ाई अब सियासी विरासत भरोसे और नियंत्रण की भी बन चुकी है. सवाल यही है कि क्या लालू परिवार इस आंतरिक टकराव को संभाल पाएगा या फिर अदालत के साथ-साथ पार्टी के भीतर भी एक नई सियासी क़यामत दस्तक देने वाली है.



