खालिदा जिया के निधन से बदल गई बांग्लादेश की राजनीति

बांग्लादेश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री खालिदा जिया का बीते 30 दिसंबर 2025 को निधन हो गया. बेगम खालिदा जिया के जनाजे में शामिल होने के लिए भारत की तरफ से विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी वहां पहुंचे हुए थे, एस. जयशंकर ने जिया के बेटे और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान से मुलाकात कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शोक संदेश सौंपा था. इस खत में पीएम मोदी ने शोक व्यक्त कर ये लिखा था कि, उनके जाने से बांग्लादेश की राजनीति में जो खालीपन है, उसे कभी कोई भर नहीं सकता है.

लेकिन उनका विजन और विरासत हमेशा ही जिंदा रहेगा. 'मुझे यकीन है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के आपके काबिल नेतृत्व में उनके आदर्शों को आगे बढ़ाया जाएगा और एक नई शुरुआत और भारत और बांग्लादेश के बीच गहरी और ऐतिहासिक साझेदारी को और बेहतर बनाने के लिए एक गाइडिंग लाइट की तरह काम करेंगे.
खालिदा के निधन से बदला बांग्लादेश की राजनीति
वहीं खालिदा के निधन के बाद से बांग्लादेश की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय पूरी तरह से अब खत्म हो चुका है. वह इस देश की सियासत की धुरी रहीं और अपनी कट्टर विरोधी शेख हसीना के साथ अपनी दुश्मनी को लेकर हमेशा से ही चर्चा में रही. मगर उनके राजनीतिक सफर में एक वक्त ऐसा भी आया था जब उन्होंने अपने मतभेदों को भुला दिया था, वो दौर ये था कि, उन्होंने जनरल एचएम इरशाद के तानाशाही शासन को खत्म करने में मदद करने के लिए शेख हसीना के साथ राजनीति मदभेदों को भुला दिया था और इसमें भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने अहम भूमिका निभाई थी.

जाने हसीना और खालिदा के बीच कब पड़ी फूट
यह बात 1988 की है जब विवादित चुनावों के बाद जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद ने बांग्लादेश की सत्ता हथिया ली थी, ऐसे समय में शेख हसीना की आवामी लीग और खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बीच राजनीतिक फूट पड़ी थी. इसे देखते हुए भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ थोड़ी चिंतित रहने लगी, यह फूट तब भी बनी रही जब अवामी लीग, बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी सहित सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने चुनावों का बहिष्कार किया था.



