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मणिकर्णिका घाट से मिली मूर्तियां होंगी संरक्षित, डीएम बोले - मंदिर को नुकसान नहीं

मणिकर्णिका घाट से मिली मूर्तियां होंगी संरक्षित, डीएम बोले - मंदिर को नुकसान नहीं
Jan 14, 2026, 08:35 AM
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Posted By Monisha Rai

वाराणसी : मणिकर्णिका घाट से मिलीं मूर्तियां और कलाकृतियां संरक्षित की जाएंगी. इनमें रानी अहिल्याबाई की मूर्ति भी शामिल है. डीएम सत्येंद्र कुमार ने बताया कि मणिकर्णिका घाट पर विकास कार्य कराए जा रहे हैं. इससे किसी मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचा है. पहले चरण में सीढि़यां बनवाई जा रही हैं. खोदाई के दौरान कुछ मूर्तियां और कलाकृतियां मिली हैं. इन्हें संरक्षित कराया गया है. घाट पर निर्माण कार्य पूरा होने के बाद मूर्तियां लगवाई जाएंगी. बतादें कि काशी के ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनर्विकास कार्य के दौरान विवाद खड़ा हो गया है. निर्माण कार्य के बीच 300 साल पुरानी मणि और प्राचीन मूर्ति टूटने के आरोप सामने आने के बाद पाल समाज के लोगों ने विरोध किया और नाराजगी जताई थी. घाट पर कार्यदायी संस्था द्वारा हाइड्रा मशीन से पक्के घाट के पत्थर हटाए जा रहे थे, जिन्हें ट्रैक में लोड कर नाव के जरिए गंगा पार भेजा जा रहा है. इसी दौरान मणि के क्षतिग्रस्त होने का वीडियो सामने आया, जिसके बाद विरोध शुरू हो गया.


क्या है मणिकर्णिका पुनर्विकास प्रोजेक्ट


* सीएसआर फंड से 18 करोड़ रुपये की लागत

* कुल 29,350 वर्ग मीटर क्षेत्र में निर्माण

* दलदली मिट्टी के कारण 15–20 मीटर गहरी पाइलिंग

* जी+1 मॉडल पर घाट का विकास

* बाढ़ से सुरक्षा के लिए विशेष तकनीक

कैसा होगा नया मणिकर्णिका घाट

* 25 मीटर ऊंची चिमनी (राख के प्रसार को रोकने के लिए)

* 18 खुले दाह संस्कार प्लेटफॉर्म

* 5 कवर दाह संस्कार बर्थ

* पवित्र जलकुंड, प्रतीक्षा कक्ष, पंजीकरण कक्ष

* लकड़ी भंडारण क्षेत्र, अपशिष्ट ट्रॉलियां

* सामुदायिक शौचालय व मुंडन क्षेत्र

* चुनार और जयपुर के पत्थरों से निर्माण


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काम में आई तेजी


करीब 19 महीने पहले शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट बाढ़ के कारण लंबे समय तक रुका रहा. वर्ष 2023 में पीएम मोदी द्वारा शिलान्यास के बाद अब एक बार फिर कार्य में तेजी लाई गई है. फिलहाल कार्य प्रगति पर है और पुरोहित व पाल समाज के लोग विरोध कर रहे हैं.

77 गणतंत्र दिवस की थीम बनी "वंदे मातरम्", जाने इसका उद्देश्य
77 गणतंत्र दिवस की थीम बनी "वंदे मातरम्", जाने इसका उद्देश्य
देशभर आज अपना 77 गणतंत्र दिवस मना रहा हैं. गणतंत्र दिवस की परेड देखने के लिए सभी की निगाहें दिल्ली के कर्तव्य पथ पर टिकी हुई थी. राष्ट्रपति की एंट्री से लेकर सेना के शौर्य प्रदर्शन और आकर्षक झांकियों के साथ गणतंत्र दिवस की भव्य परेड देखने को मिली. समारोह शुरू होने से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की.इस साल के 77वें गणतंत्र दिवस परेड में यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपियन यूनियन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था. दोनों वैश्विक हस्तियां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के साथ कर्तव्य पथ पहुंची.जाने 77वें गणतंत्र दिवस की थीमइस साल के गणतंत्र दिवस पर परेड में सबसे खास बात तो यह है कि इसकी थीम "वंदे मातरम्" रखी गई थी. राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने की खुशी में ये थीम निर्धारित की गई थी. जिसके चलते कर्तव्य पथ को दुलहन की तरह सजाया गया था, इससे भी खास बात यह है. कई झांकियों में भी इसकी झलक देखने को मिली है. जहां, परेड में लगभग 6,000 सैनिक और 18 मार्चिंग कंटिनजेंट्स ने हिस्सा लिया.इनके साथ ही 13 बैंड भी मौजूद थे. भैरव लाइट कमांडो बटालियन पहली बार परेड में शामिल हुई. ड्रोन और आधुनिक प्रणालियों से लैस नई आर्टिलरी रेजिमेंट शक्तिबान रेजिमेंट ने भी परेड में हिस्सा लिया. सेना के साथ 61 कैवेलरी वाले घुड़सवारों का भव्य प्रदर्शन देखने को मिला, जिसमें राजपूत, असम, जैक ली और आर्टिलरी कंटिनजेंट ने भी परेड में अनपा शौर्य दिखाया.हथियारों और मिसाइलों ने बढ़ाई शोभा77नवें गणतंत्र दिवस की परेड में भारत के कई आधुनिक और स्वदेशी हथियारों, मिसाइलों का प्रदर्शन किया गया. इस लिस्ट में ब्रह्मोस, आकाश मिसाइल सिस्टम, 'सूर्यस्त्र' रॉकेट लॉन्चर सिस्टम, धनुष तोप, ATAGS, MRSAM, युद्ध टैंक अर्जुन और सेना की भारी बख्तरबंद गाड़ियां भी परेड में नजर आईं.
अग्रेजों ने ऐसे छिना भारतीयों का हक, जाने कैसे मिला संविधान
अग्रेजों ने ऐसे छिना भारतीयों का हक, जाने कैसे मिला संविधान
भारत का गणतंत्र दिवस केवल एक राष्ट्रीय उत्सव नहीं, बल्कि देश की विदेश नीति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आईना भी है. गणतंत्र दिवस के मनाने की असली वजह यह है कि 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था, जिससे देश एक संप्रभु, लोकतांत्रिक और गणराज्य बनकर उभरा. ये वहीं दिन है जिस दिन भारत देश ने ब्रिटिश कानूनों की जगह अपने संविधान को अपनाया था, ये वो दिन है जब ब्रिटिश शासन की उन बेड़ियों से भारत वासियों को मुक्ति मिली थी, जिसने उनके अधिकारों को तो छिना ही साथ ही इन अंग्रेजो उनका जीवन-यापन तक करना दुश्वार कर दिया.ऐसे क्रूर्रता भरे अग्रेजों के शासन से आजादी मिलना भारतीयों के लिए एक नए जीवन जीने की किरण जैसी थी. जिससे वो हमेशा के लिए आजाद हो गये. इन्हीं जंजीरों से छुटकारा मिलने की वजह से 1930 के ऐतिहासिक दिन को चिन्हित करने के लिए चुना गया था. जिससे जनता को अपनी सरकार चुनने का अधिकार मिल सका. जो एक संवैधानिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गौरव का उत्सव है. यह दिन नागरिकों के अधिकारों, कर्तव्यों और राष्ट्र की एकता के प्रति संविधान के सम्मान की याद दिलाता है.भारत आधिकारिक तौर पर बना गणतंत्र26 जनवरी का दिन देशभर के लिए बड़ा ही खास दिन होता है. क्योंकि, यह वो दिन है जब भारत आधिकारिक तौर पर गणतंत्र बना और उसने खुद अपना संविधान चुना. जो हर भारतवासियों के लिए बड़े ही गर्व की बात है. यहीं कारण है कि भारत के इतिहास में इस दिन का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि यह औपनिवेशिक अतीत से एक लोकतांत्रिक, संप्रभु राष्ट्र में परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है. ब्रिटिश सरकार की गुलामी से आजादी दिलाने वाली 26 जनवरी की ये तारीख हर भारतीयों के रघों में बसी है.इस आजादी ने भारत को अपना सम्मान, इज्जत, हक के साथ-साथ वो सभी अधिकार दिये जिसका भारत हकदार रहा है. सबसे खास भारत के लोकतंत्र की नींव संविधान है, जिससे भारत को एक बड़ी पहचान मिली है. यह दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जिसे तैयार करने में 2 साल, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा. इतने लंबे समये के बाद 26 नवंबर 1949 (उनचास) को यह बनकर तैयार हुआ. जो भारत की ताकत बनकर उभरा.जाने ब्रिटिश शासन से मुक्ति का प्रतीकभारत अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता की याद में 26 जनवरी के दिन को जश्न के रूप में मनाता है. स्वतंत्रता दिवस जो ब्रिटिश शासन से मुक्ति का प्रतीक माना गया है, इस आजादी के दिन भारत अपने संविधान के साथ एक संप्रभु राष्ट्र बना, जिसने 1935 के भारत सरकार अधिनियम का स्थान भी लिया. इसे सुनकर आपके मन में सवाल उठ रहे होंगे कि, जब हमारा संविधान 26 नवंबर को बनकर तैयार हो गया था, तो इसे लागू करने के लिए 26 जनवरी का इंतजार क्यों किया गया? तो बता दें, भारतीय संविधान बनने से 20 साल पहले यानी 1929 में इस कहानी की शुरूआत हुई.उस समय लाहौर में इंडियन नेशनल कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था, जिसकी अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था. ये वहीं अधिवेशन है जिसमें कांग्रेस ने पहली बार अंग्रेजों से डोमिनियन स्टेटस यानी अर्ध-स्वतंत्रता की मांग के बजाय 'पूर्ण स्वराज' का संकल्प लिया था. जिसके बाद से लाहौर अधिवेशन में यह फैसला लिया गया कि, 26 जनवरी 1930 को देशभर में 'स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाएगा. इसी की खुशी में उस दिन हर भारतीयों ने पहली बार भारत देश का तिरंगा फहराते हुए अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने की कसम खाई थी.इतिहास के पन्नों में छाया 26 जनवरी बता दें, जब 1947 (सैंतालीस) में भारत असल में आजाद हुआ, तो वह तारीख 15 अगस्त थी. इसलिए इस दिन को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन संविधान निर्माताओं, खासकर पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के मन में उस 26 जनवरी की तारीख के प्रति एक बड़ा सम्मान छिपा था, जिसके चलते वे नहीं चाहते थे कि 26 जनवरी जैसी ऐतिहासिक तारीख इतिहास के पन्नों से कहीं गायब हो जाए.इसलिए, इसे ध्यान में रखते हुए यह तय किया गया कि भले ही संविधान 26 नवंबर 1949(उनचास) को तैयार हो गया है, पर इसे आधिकारिक रूप से 26 जनवरी 1950 को ही लागू किया जाएगा, ताकि इस दिन को 'गणतंत्र दिवस' के रूप में इतिहास के पन्नों पर हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया जाए. तभी से हर 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है. "जय हिंद...जय भारत...जय जवान"
वाराणसी पुलिस लाइंस में महिला कमांडो दस्ता और वर्दी में डीआईजी का बेटा बने आकर्षण, मंत्री ने ली सलामी
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वाराणसी : 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर जिले में देशभक्ति का उत्साह और उल्लास का माहौल देखने को मिला. सरकारी भवनों, राज्य व केंद्रीय कार्यालयों से लेकर शैक्षणिक संस्थानों और निजी प्रतिष्ठानों तक राष्ट्रीय पर्व धूमधाम से मनाया गया. वाराणसी पुलिस लाइंस में पहली बार महिला पुलिसकर्मियों की ऑल वुमेन परेड का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें 400 महिला पुलिसकर्मियों ने हिस्सा लेकर महिला सशक्तिकरण का मजबूत संदेश दिया. गणतंत्र दिवस पर आयोजित परेड की सलामी राज्यमंत्री रविंद्र जायसवाल ने ली. इस अवसर पर परेड में पहली बार महिला कमांडो दस्ता शामिल हुआ, जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया. परेड के दौरान एक खास दृश्य तब देखने को मिला, जब डीआईजी शिवहरि मीणा के बेटे ने वर्दी पहनकर परेड में हिस्सा लिया और अधिकारियों से हाथ मिलाया. यह पल दर्शकों के लिए खास आकर्षण का केंद्र रहा.गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित इस परेड में महिला कमांडो दस्ता, महिला घुड़सवार पुलिस, महिला ट्रैफिक पुलिस और विभिन्न इकाइयों की महिला पुलिसकर्मी शामिल रहीं. परेड की सटीक ड्रिल, अनुशासन और आत्मविश्वास ने यह साबित कर दिया कि नारी शक्ति किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है. परेड स्थल पर मौजूद लोगों ने तालियों की गूंज के साथ महिला पुलिसकर्मियों का उत्साहवर्धन किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्टांप एवं पंजीयन राज्य मंत्री रविंद्र जायसवाल ने कहा कि आज देश में समानता की जो बात की जा रही है, उसका सजीव उदाहरण इस परेड में देखने को मिला. उन्होंने कहा कि नारी शक्ति किसी भी मायने में कम नहीं है और वाराणसी की इस परेड ने पूरे प्रदेश को गर्व का अवसर दिया है. उनके अनुसार, महिलाएं अब केवल सुरक्षा पाने वाली नहीं, बल्कि सुरक्षा देने वाली भूमिका में भी मजबूती से खड़ी हैं.मिशन शक्ति के जरिए महिलाओं को बनाया जा रहा आत्मनिर्भरपुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल ने कहा कि पुलिस विभाग के माध्यम से मिशन शक्ति को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है. इसका उद्देश्य महिलाओं के भीतर सुरक्षा, आत्मविश्वास और स्वावलंबन की भावना को विकसित करना है. उन्होंने बताया कि वाराणसी पुलिस महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए विभिन्न स्तरों पर लगातार प्रयास कर रही है, ताकि वे समाज में निर्भीक होकर आगे बढ़ सकें. इस ऐतिहासिक ऑल वुमेन परेड का नेतृत्व प्रशिक्षित आईपीएस अधिकारी मानसी सिंह ने किया. उनके नेतृत्व में परेड पूरी गरिमा, अनुशासन और आत्मबल के साथ संपन्न हुई, जिसने कार्यक्रम की भव्यता को और बढ़ा दिया.ALSO READ : गणतंत्र दिवस की परेड में दिखा भारत की झलक, परंपरा और विरासत ने मोह लिया मनसमारोह के दौरान अपने कर्तव्यों के निर्वहन में उत्कृष्ट एवं सराहनीय कार्य करने वाले 30 पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारीगण को पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया. यह सम्मान पुलिसकर्मियों के मनोबल को बढ़ाने तथा उत्कृष्ट कार्य संस्कृति को प्रोत्साहित करने के लिए प्रदान किए गए.