दाने-दाने को मोहताज वेनेजुएला, कभी दुनिया का चौथा अमीर देश था

वेनेजुएला कुछ दिनों से हिंसा का शिकार बन बैठा था. उसके खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई बड़ी कार्रवाई से दुनिया भर में सनसनी फैल गई. क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को अपनी हिरासत में लिया था. इस घटना पर नाराजगी जताते हुए रूस और चीन जैसे देशों ने अमेरिका की सख्त आलोचना की है. जहां रूसी विदेश मंत्रालय ने मादुरो और उनकी पत्नी को रिहा करने की अपील करते हुए ये कहा कि, अमेरिका को अपने फैसले पर फिर से सोचना चाहिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच सभी विवादों का हल जंग नहीं बल्कि, बातचीत से किया जा सकता है.

वहीं, चीन ने अमेरिका के इस कदम को तानाशाही करार दिया और कहा ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का उल्लंघन किया है, हालांकि, वेनेजुएला एक संप्रभु देश है, जिसके राष्ट्रपति को बंदी बनाना बड़े ही शर्म की बात है. लेकिन कुछ देशों ने ट्रंप के इस फैसले को सही ठहराया है.
ट्रंप फैसले पर जियोर्जिया मेलोनी की प्रतिक्रियां
इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने ट्रंप के कदम पर एक बड़ी प्रतिक्रिया दी. एक्स पर पोस्ट शेयर करते हुए लिखा, वेनेजुएला में जो कुछ भी हो रहा है, उसपर मैंने बारीकी से नजर रखी है, इटली ने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर कभी मादुरो की चुनावी जीत को मान्यता नहीं दी, हमने मादुरो के बुरे कामों की हमेशा निंदा की है. पर फिर भी हमारा मानना है कि इसे खत्म करने के लिए सैन्य कार्रवाई करना सही रास्ता नहीं है. वहीं, अगर बात अपने देश की सुरक्षा की हो, वेनेजुएला ड्रग्स तस्करी का बढ़ावा दे रहा था, ऐसे में देश की सुरक्षा किसी भी सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए.

मादुरो की गिरफ्तारी कानून का उल्लंघन
आपको बता दें, कि वेनेजुएला में कुछ दिनों से हो रही हिंसा के बीच गिरफ्तार हुए पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स, जिन पर अमेरिका ने नारको-टेररिज्म के आरोप लगाए हैं. अमेरिका की सैन्य कार्रवाई में गिरफ्तार हुए मादुरो पर नारको-टेररिज्म (नार्को-आतंकवाद) और ड्रग तस्करी जैसे गंभीर आरोप तय किए गए हैं. इस मामले में मादुरो की पत्नी सिलिया फ्लोर्स को भी सहआरोपी बनाया गया है.

दोनों को अमेरिकी जिला न्यायाधीश एल्विन के हेलरस्टीन की अदालत में पेश होने की बात सामने आई है. यह उन दुर्लभ मामलों में से एक है, जब किसी देश के शीर्ष नेता को दूसरे देश की अदालत में अपराधी की तरह पेश किया जाएगा. अमेरिका ने जो आरोप मादुरो पर लगाए हैं, उस मामले में उन्हें उम्रकैद तक की सजा हो सकती है. वहीं इस मामले में मादुरो की गिरफ्तारी को राजनीतिक विश्लेषक अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बता रहे हैं. विश्लेषकों का कहना है कि कानून की जगह ताकत ने ले ली है.

दिलचस्प बात यह है कि सरकारें गिराना अमेरिकी विदेश नीति का हिस्सा रही हैं. ऐसे में वेनेज़ुएला कोई पहला देश नहीं है, जहां अमेरिका ने परोक्ष या अपरोक्ष रूप से किसी नेता को सत्ता से बेदखल किया हो, उसने इसी नीति के तहत 1953 (तिरेपन) में ईरान में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग की सरकार तख्तापलट के जरिए गिरा दी थी. कुछ ऐसा ही हाल चिली में भी देखने को मिला जहां, 1973 (तिहत्तर) में राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे की लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई समाजवादी सरकार ऑगस्टो पिनोशे नाम के सैन्य जनरल के नेतृत्व में हुए सैन्य तख्तापलट में गिर गई. इसी के बाद से चिली में सैन्य तानाशाही की शुरुआत हो गई, जिसके पीछे अमेरिकी की खुफिया एजेंसी सीआईए का पूरा-पूरा हाथ था.
जाने वेनेजुएला कैसे हुआ गरीब
वेनेजुएला एक ऐसा देश है जिसके पास सऊदी अरब से भी ज्यादा तेल है, लेकिन पिछले एक दशक से ना जाने उसे क्या हो गया है जिसके चलते उसने अपनी 80% जीडीपी गंवा दी है. कभी दुनिया के सबसे अमीर देशों में शामिल इस देश ने अपनी दौलत का ऐसा मिसमैनेजमेंट तैयार किया, पर अफसोस कि आज वहां के लोग देश छोड़ रहे हैं. बात करें 1950 की तो जब आधी दुनिया दूसरे विश्व युद्ध के नुकसान से उबरने वाली ही थी कि तभी जमीन के नीचे से निकलने वाले काले सोने यानी तेल ने वेनेजुएला की किस्मत में चार चांद लगा दिया था, जिसके चलते 1952 (बावन) में वेनेजुएला दुनिया का चौथा सबसे अमीर देश बनकर उभरा था.

इसी अमीरी के चलते वेनेजुएला की राजधानी काराकस की सड़कों पर लग्जरी कारें दौड़ने के साथ-साथ गगनचुंबी इमारतें भी खड़ी हो गई थी. लेकिन 1970 के दशक में जब पूरी दुनिया में तेल संकट मंडराते ही इसकी कीमतें आसमान छूने लगीं, ऐसे में वेनेजुएला के घरों में डॉलर की बारिश होने लगी. उस दौर के किस्से आज भी मशहूर हैं… तब वेनेजुएला दुनिया के सबसे महंगे स्कॉच व्हिस्की और शैंपेन के सबसे बड़े खरीदारों में से एक था. 1976 में सरकार ने तेल इंडस्ट्री का राष्ट्रीयकरण कर दिया और सरकारी कंपनी PDVSA बनाई, जो दुनिया की सबसे मुनाफे वाली तेल कंपनियों में से एक बनकर उभरी.
वेनेजुएला में छाई कंगाली
वेनेजुएला ने अपनी पूरी ताकत सिर्फ और सिर्फ तेल निकालने में लगा दी, यहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने खेती, फैक्ट्री और दूसरे बिजनेस पर ध्यान तक नहीं दिया, इसका नतीजा कुछ समय बाद काफी भयानक दिखा, जहां सूई से लेकर खाने तक के लिए वे दूसरे देशों पर निर्भर रहने लगे औक तेल के बदले सामान खरीदने लगे. 1999 (निन्यानबे) के बाद सरकार ने निवेश करने के बजाय डूबते देश के भविष्य की चिंता करते हुए मुफ्त योजनाओं में पैसा उड़ाने लगे, तब तक तेल की महंगाई ठीक-ठाक थी, लेकिन जैसे ही तेल की कीमतें गिरने लगी सरकार इस कदर कंगाल हुई मानों उसकी जेब में सैलरी देने तक के पैसे नहीं बचे. इसी के चलते सरकारी तेल कंपनी यानि (PDVSA) में काबिल इंजीनियरों को हटाकर राजनीतिक वफादारों को रखना शुरू कर दिया गया. इससे तेल उत्पादन की तकनीक खराब हो गई और कहीं ना कहीं बेरोजगारी की स्थिती जन्म लेने लगी, जिससे देश के 60 लाख से ज्यादा पढ़े-लिखे लोग (डॉक्टर, इंजीनियर) देश छोड़ने पर मजबूर हो गये.

खास बात तो ह है कि भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है, वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से भारत वहां से तेल खरीदने में मजबूर था. भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास ऐसी रिफाइनरी है जो वेनेजुएला के 'भारी और गाढ़े' तेल को साफ करने के लिए दुनिया में बेस्ट मानी जाती है. वहीं, हीं ट्रम्प सरकार का दावा है कि इस सैन्य ऑपरेशन के बाद अब अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला में अरबों डॉलर का निवेश करेंगी और वहां के टूटे हुए इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करने में भी कामयाब होंगी. हालांकि, वहां बदलाव आएगा या नहीं, यह वहां बनने वाली नई सरकार पर निर्भर करता है, वो भी तब जब वहां अमेरिका समर्थित एक स्थिर व्यवस्था आती है, तो सालों से लगे हुए आर्थिक प्रतिबंध हज जाएंगे, जिसके बाद से वेनेजुएला एक बार फिर से तेल मामले में तरक्की कर सकेंगा.



