गांव की पाठशाला से IIT कानपुर और BHU तक पहुंची वैज्ञानिक की यात्रा, प्रो. दया शंकर पांडेय के 65वें जन्मदिवस पर व्याख्यान श्रृंखला

वाराणसी: गांव के एक प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा की शुरुआत कर देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT कानपुर तक पहुंचने और इसके बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में रसायन विज्ञान के वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में पहचान बनाने वाले प्रो. दया शंकर पांडेय के 65वें जन्मदिवस पर शनिवार को विशेष व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन किया गया। विज्ञान संस्थान के रसायन विज्ञान विभाग की ओर से महामना हॉल, संगोष्ठी संकुल में आयोजित कार्यक्रम में देशभर के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम का विषय ‘अकार्बनिक एवं ऑर्गेनोमेटैलिक रसायन विज्ञान के उभरते आयाम’ रहा। आयोजन प्रो. डी.एस. पांडेय के शोध समूह से जुड़े डॉ. आशीष कुमार, डॉ. रूप शिखा सिंह और अन्य पूर्व शोधार्थियों ने किया।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (NISER), भुवनेश्वर के संस्थापक निदेशक एवं SERB के संस्थापक सचिव प्रो. टी.के. चंद्रशेखर ने उद्घाटन व्याख्यान दिया। सत्र की अध्यक्षता प्रो. गणेश पांडेय और रसायन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के.एन. सिंह ने की।
वैज्ञानिक सत्र में जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रो. समरेश भट्टाचार्य, IIT मुंबई के प्रो. आर. मुरुगावेल और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. राजीव गुप्ता ने अकार्बनिक एवं ऑर्गेनोमेटैलिक रसायन विज्ञान में हो रहे समकालीन शोध और उभरती संभावनाओं पर व्याख्यान दिए। विशेषज्ञों ने आधुनिक रसायन विज्ञान में नई प्रगति, उन्नत धातु संकुल और उनके संभावित अनुप्रयोगों पर विचार साझा किए।
दूसरे सत्र में युवा शोधार्थियों ने अपने शोध कार्यों की मौखिक प्रस्तुतियां दीं। इस दौरान उन्हें वरिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ अपने शोध पर संवाद करने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण साझा करने का अवसर मिला। सत्र की अध्यक्षता IIT इंदौर के प्रो. संजय के. सिंह और प्रो. मृगेन्द्र दुबे ने की।
गांव से IIT कानपुर तक का सफर बना प्रेरणा
कार्यक्रम में प्रो. दया शंकर पांडेय की शैक्षणिक और वैज्ञानिक यात्रा को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। उन्होंने ग्रामीण परिवेश के प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा शुरू करने के बाद के.एस. साकेत पीजी कॉलेज, अयोध्या से बीएससी और एमएससी की पढ़ाई पूरी की। यूजीसी-नेट और जेआरएफ उत्तीर्ण करने के बाद वर्ष 1983 में IIT कानपुर में पीएचडी के लिए प्रवेश लिया। यहां उन्होंने एरीन-रूथेनियम कॉम्प्लेक्स और उनके संभावित कैंसररोधी अनुप्रयोगों पर शोध किया।
पीएचडी के बाद उन्होंने अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा में लेक्चरर के रूप में कार्य किया और बाद में BHU से जुड़े। अकार्बनिक एवं ऑर्गेनोमेटैलिक रसायन विज्ञान के क्षेत्र में उनके शोध में कैटेलिटिक कन्वर्जन, मेटल कॉम्प्लेक्स, मेटल-नाइट्रोसिल कॉम्प्लेक्स, डाइपाइरिन कॉम्प्लेक्स और BODIPY कॉम्प्लेक्स जैसे विषय शामिल रहे हैं।
उनके वैज्ञानिक योगदान को FNASc, FNA, जे.सी. बोस फेलोशिप और जापान की JSPS फेलोशिप सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से मान्यता मिली है। वह वर्ष 2018 से 2021 तक BHU के रसायन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा वे राष्ट्रीय स्तर की करीब 30 अकादमिक एवं शोध समितियों से जुड़े रहे हैं।
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शोधार्थियों ने जताया सम्मान
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण प्रो. दया शंकर पांडेय का अभिनंदन समारोह रहा। उनके सहयोगियों, वर्तमान शोधार्थियों और पूर्व शोधार्थियों ने उनके वैज्ञानिक योगदान, मार्गदर्शन और अकादमिक नेतृत्व के प्रति सम्मान व आभार व्यक्त किया। इसके बाद शिक्षकों और प्रतिभागियों के साथ खुला संवाद भी हुआ।
विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. संजय कुमार की उपस्थिति में आयोजित कार्यक्रम में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से आए वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने हिस्सा लिया। आयोजन में वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ-साथ गुरु-शिष्य परंपरा, अकादमिक सहयोग और वैज्ञानिक विरासत के महत्व को भी रेखांकित किया गया।
प्रो. पांडेय की यात्रा को ग्रामीण और छोटे शहरों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक बताते हुए वक्ताओं ने कहा कि सीमित संसाधनों से शुरुआत करने वाला विद्यार्थी भी शिक्षा, मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर देश के शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों तक पहुंच सकता है।



