अजय राय: 27 साल के युवा से 57 साल के परिपक्व राजनीतिज्ञ तक...

वाराणसीः 27 साल के एक युवक अजय राय ने वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में वाराणसी की कोलसला (अब पिंडरा) सीट पर नौ बार के विधायक रहे दिग्गज कम्युनिस्ट नेता ऊदल को हराया तो सब चौंक पड़े. इस जीत का अंतर महज 488 वोटों का जरूर था लेकिन इस जीत के साथ उस युवा ने देश की राजनीति को एहसास करा दिया था कि आने वाले वक्त अब उसका है. अगले 30 सालों में अजय राय ने कभी पीछे मुड़ के नहीं देखा अपना कद इतना बड़ा कर लिया कि राजनीति के हर गलियारे में इनकी चर्चा होती है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष पद पर तीन साल रहने बाद उन्हें हटाए जाने पर फिर उनकी राजनैतिक हैसियत की बात हो रही है.
शुरुआत में की भाजपा की राजनीति
चेतगंज के भूमिहार परिवार के अजय राय का विद्यार्थी जीवन में ही राजनीत के प्रति आकर्षण रहा. वह 1990 के दशक की शुरुआत में भाजपा की छात्र इकाई ABVP से जुड़े रहे. भाजपा के टिकट पर उन्होंने वर्ष 1996 में वाराणसी की कोलसला विधानसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ा. उनके सामने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के उम्मीदवार ऊदल थे. इस चुनाव में अजय राय ने जबरदस्त उलटफेर किया और ऊदल को 488 वोटों के बेहद करीबी अंतर से हरा दिया. इस चुनाव में अजय राय को 38,352 और ऊदल को 37,864 वोट मिले थे. कामरेड ऊदल बनारस और पूर्वांचल की राजनीति के बहुत बड़े नाम थे. वे इस क्षेत्र से 9 बार विधायक रह चुके थे. एक युवा नेता के रूप में अजय राय द्वारा इतने बड़े कम्युनिस्ट नेता को उनके ही गढ़ में मात देना उस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति की सबसे बड़ी चौंकाने वाली खबरों में से एक थी. इसके बाद उन्होंने 2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों में भी इसी सीट से भाजपा के उम्मीदवार के रूप में लगातार जीत दर्ज की.
भाजपा छोड़ थामा सपा का हाथ
वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में अजय राय वाराणसी सीट से भाजपा का टिकट चाहते थे. लेकिन भाजपा ने वहां से वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी को मैदान में उतार दिया. इससे नाराज होकर अजय राय ने भाजपा छोड़ दी.
भाजपा छोड़ने के बाद अजय राय समाजवादी पार्टी (SP) में शामिल हो गए.
सपा के टिकट पर उन्होंने 2009 का लोकसभा चुनाव मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ लड़ा, लेकिन वे तीसरे स्थान पर रहे. लोकसभा चुनाव हारने के तुरंत बाद उन्होंने सपा भी छोड़ दी और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपनी पुरानी कोलसला विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उतरे और चौथी बार विधायक चुने गए.
कांग्रेस के साथ आए
साल 2012 में अजय राय ने कांग्रेस का दामन थाम लिया, जिसके बाद वे राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आए. नए परिसीमन के बाद बनी पिंडरा विधानसभा सीट से उन्होंने 2012 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता और पांचवीं बार विधानसभा पहुंचे. हालांकि, इसके बाद 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस ने अजय राय को वाराणसी लोकसभा सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार तीन बार मैदान में उतारा. 2014 और चुनावों में मोदी लहर के चलते वे तीसरे स्थान पर रहे. 2024 के लोकसभा चुनाव में अजय राय ने 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में पीएम मोदी को बेहद मजबूत टक्कर दी. इस चुनाव में पीएम मोदी की जीत का अंतर 2019 के मुकाबले घटकर केवल 1.5 लाख वोटों के आसपास रह गया, और अजय राय को 4,60,000 से अधिक वोट मिले.
बने प्रदेश अध्यक्ष
2024 के आम चुनाव से ठीक पहले, 17 अगस्त 2023 को कांग्रेस आलाकमान ने उनके जुझारूपन को देखते हुए उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (UPCC) का अध्यक्ष नियुक्त किया. उनके कार्यकाल में यूपी में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (6 सीटें) किया. उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों और सांगठिनक बदलावों को ध्यान में रखते हुए, अक्टूबर 2026 में कांग्रेस ने उनकी जगह रामपुर खास से विधायक आराधना मिश्रा 'मोना' को नया यूपी कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया है. अजय राय को जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच रहने और बनारस के स्थानीय समीकरणों में मजबूत पकड़ रखने वाले नेता के रूप में देखा जाता है.
बेहतर तरीके से साधा जातिय समीकरण
अजय राय भूमिहार ब्राह्मण परिवार से आते हैं. हालांकि, पूरे उत्तर प्रदेश में इस समाज की आबादी महज 2 से 3% के आसपास है, लेकिन वाराणसी, गाजीपुर, मऊ और बलिया जैसे पूर्वांचल के जिलों में भूमिहार वोट बैंक बेहद समृद्ध, जमींदार और राजनीतिक रूप से अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है. वाराणसी में भूमिहार समाज का ऐतिहासिक महत्व रहा है. क्योंकि बनारस का पारंपरिक राजपरिवार भी इसी भूमिहार समुदाय से आता है. भूमिहार समाज के साथ-साथ वाराणसी और पिंडरा क्षेत्र के ब्राह्मण और राजपूत मतदाताओं में भी अजय राय की मजबूत व्यक्तिगत पकड़ रही है.
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दबंग छवि भी है
अजय राय के परिवार की कहानी पूर्वांचल के कुख्यात गैंगवार और राजनीतिक वर्चस्व की जंग से गहराई से जुड़ी हुई है. अजय राय के बड़े भाई अवधेश राय वाराणसी के एक रसूखदार कांग्रेस नेता थे. 3 अगस्त 1991 को वाराणसी के लहुराबीर इलाके में उनके भाई अवधेश राय की अंधाधुंध गोलियां बरसाकर हत्या कर दी गई थी. इस हत्याकांड का मुख्य आरोपी मऊ के बाहुबली माफिया मुख्तार अंसारी को बनाया गया था.32 साल का कानूनी संघर्ष: बड़े भाई की हत्या के समय अजय राय की उम्र महज 22 साल थी. उन्होंने मुख्य गवाह के तौर पर माफिया मुख्तार अंसारी के खिलाफ दशकों तक अदालती लड़ाई लड़ी। आखिरकार, जून 2023 में वाराणसी की एमपी-एमएलए कोर्ट ने मुख्तार अंसारी को इस हत्याकांड में उम्रकैद की सजा सुनाई. पारिवारिक संघर्षों और बनारस की धरती पर दबदबा बनाए रखने की वजह से अजय राय की छवि एक स्ट्रॉन्गमैन की बन गई। उनके खिलाफ कई राजनीतिक और स्थानीय मुकदमे भी दर्ज हुए, लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं के संकट में खड़े रहने की उनकी आदत ने उन्हें बेहद लोकप्रिय बनाए रखा. कांग्रेस ने जब अगस्त 2023 में उन्हें उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनाया, तो उसके पीछे उनकी यही दबंग भूमिहार पृष्ठभूमि थी.



