बीएचयू की 60 साल पुरानी मौसम वेधशाला को बंद करने की तैयारी

वाराणसी: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की करीब 60 साल पुरानी मौसम वेधशाला के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में लंबे समय से मौसम संबंधी आंकड़े जुटाने और विद्यार्थियों को प्रायोगिक प्रशिक्षण देने वाली इस वेधशाला को बंद करने की तैयारी की जा रही है। वेधशाला में तैनात कर्मचारियों को भी हटाया जा चुका है। ऐसे में मौसम विज्ञान से जुड़े विद्यार्थियों की पढ़ाई और शोध पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
बताया जाता है कि बीएचयू में मौसम वेधशाला की स्थापना वर्ष 1960 के दशक में हुई थी। यहां मौसम से जुड़े विभिन्न आंकड़े एकत्र किए जाते थे। तापमान, वर्षा, हवा की गति समेत मौसम संबंधी अन्य जानकारियों के रिकॉर्ड तैयार किए जाते रहे हैं। इसके साथ ही मौसम विज्ञान से जुड़े विद्यार्थियों को प्रायोगिक शिक्षा भी दी जाती थी।
वेधशाला की स्थापना ओजोन केंद्र के नाम से की गई थी। समय के साथ यहां काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या कम होती गई। अब कर्मचारियों को भी वेधशाला से हटा दिया गया है। इसके बाद इसके नियमित संचालन पर सवाल खड़े हो गए हैं।
विद्यार्थियों की प्रायोगिक शिक्षा पर असर
बीएचयू में मौसम विज्ञान से जुड़े विद्यार्थियों के लिए वेधशाला का उपयोग लंबे समय से प्रायोगिक प्रशिक्षण के लिए होता रहा है। विद्यार्थियों को मौसम के विभिन्न उपकरणों के संचालन और उनसे प्राप्त आंकड़ों के आधार पर मौसम संबंधी अध्ययन का अवसर मिलता था। वेधशाला बंद होने की स्थिति में विद्यार्थियों को प्रायोगिक शिक्षा के लिए दूसरे संस्थानों पर निर्भर होना पड़ सकता है।
विश्वविद्यालय के संबंधित विभाग के शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच भी वेधशाला को लेकर चिंता है। उनका कहना है कि इतनी पुरानी वेधशाला केवल एक संस्थान की संपत्ति नहीं, बल्कि लंबे समय से जुटाए जा रहे मौसम संबंधी आंकड़ों का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। इसके बंद होने से पुराने आंकड़ों और शोध कार्यों के उपयोग पर भी असर पड़ सकता है।
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मौसम विभाग के लिए भी उपयोगी रहे आंकड़े
वेधशाला में वर्षों से मौसम संबंधी आंकड़े दर्ज किए जाते रहे हैं। लंबे समय के इन आंकड़ों का इस्तेमाल मौसम के बदलाव, तापमान और वर्षा के पैटर्न जैसे विषयों पर अध्ययन और शोध में किया जा सकता है। ऐसे में वेधशाला को बंद करने के बजाय इसे आधुनिक उपकरणों और पर्याप्त कर्मचारियों से लैस करने की मांग उठ रही है।
सवाल यह है कि छह दशक से अधिक समय से मौसम का लेखा-जोखा रखने वाली बीएचयू की इस ऐतिहासिक वेधशाला को बंद करने के बजाय क्या इसे आधुनिक स्वरूप देकर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए फिर से उपयोगी बनाया जा सकता है।



