बीएचयू की इन विभूतियों को मिला पद्म सम्मान, संगीत, शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में योगदान सराहनीय

वाराणसी : बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से जुडे तीन विभूतियों को पद्म सम्मान से सुशोभित किया गया है. इनमें बीएचयू की पूर्व परफार्मिंग आर्ट्स संकाय प्रमुख प्रो. एन राजम को रविवार को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. एन. राजम का जन्म 8 अप्रैल 1938 को चेन्नई में एक संगीत घराने में हुआ. वह एक प्रसिद्ध भारतीय वायलिन वादक हैं, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में अपनी विशेष पहचान रखती हैं. उन्होंने बीएचयू में संगीत की प्रोफेसर के रूप में कार्य किया और बाद में विभाग की प्रमुख तथा प्रदर्शन कला संकाय की डीन बनीं.
प्रो. राजम को 2012 में संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप से भी सम्मानित किया गया, जो भारत की राष्ट्रीय संगीत, नृत्य और नाटक अकादमी द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च सम्मान है. उनके पिता, विद्वान ए. नारायण अय्यर, कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध प्रतिपादक थे, उनके भाई टी.एन. कृष्णन भी कर्नाटक शैली के एक प्रख्यात वायलिन वादक रहे हैं. राजम ने अपने पिता के मार्गदर्शन में कर्नाटक संगीत का प्रारंभिक प्रशिक्षण लिया और मुसिरी सुब्रमणिया अय्यर से भी शिक्षा प्राप्त की. प्रो. राजम का विवाह चार्टर्ड अकाउंटेंट टी.एस. सुब्रमणियन से हुआ, जिनका कार्य भारतीय जीवन बीमा निगम में था. उनकी सास, पद्मा स्वामिनाथन, एक सामाजिक कार्यकर्ता और कर्नाटक संगीत गायिका थीं. दक्षिण भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका वाणी जयराम उनकी भाभी हैं.
एसिड अटैक की पहली सर्वाइवर हैं प्रो मंगला कपूर

संगीत साधना में काशी का अप्रतिम योगदान रहा है. इसी कड़ी में बीएचयू की सेवानिवृत्त प्रोफेसर मंगला कपूर को रविवार को पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा की गई. वह एक प्रेरणादायक संगीतकार और एसिड अटैक सर्वाइवर के तौर पर देश में जानी जाती हैं. उनको पूर्व में भी कई सम्मान मिल चुके हैं. प्रोफेसर मंगला कपूर भारत की पहली एसिड अटैक सर्वाइवर हैं, जिन्होंने अपने जीवन में अनेक चुनौतियों का सामना किया है. 1965 में उन पर एसिड हमला हुआ, जिसके बाद उन्हें छह साल तक अस्पताल में रहना पड़ा. इस कठिन समय के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी शिक्षा को जारी रखा. मंगला ने बीएचयू से अपनी पढ़ाई पूरी की और वहीं प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुईं. उनका संगीत में योगदान भी उल्लेखनीय है. मंगला कपूर ग्वालियर घराने से जुड़ी हुई हैं और शास्त्रीय संगीत की शिक्षिका हैं. उन्होंने अपने ज्ञान और अनुभव को साझा करते हुए अनेक छात्रों को संगीत की शिक्षा दी है. उनकी मेहनत और समर्पण के कारण उन्हें "काशी की लता मंगेशकर" के नाम से भी जाना जाता है.
मंगला कपूर न केवल एक संगीतकार हैं, बल्कि वे समाज सेवा में भी सक्रिय हैं. वे निशुल्क संगीत सिखाती हैं, जिससे वे समाज के कमजोर वर्ग के बच्चों को संगीत की शिक्षा देकर उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास कर रही हैं. उनके जीवन पर आधारित एक मराठी फिल्म "मंगला" 17 जनवरी 2025 को रिलीज हो चुकी है. यह फिल्म उनकी संघर्षों और उपलब्धियों पर आधारित है.
प्रो श्याम सुंदर अग्रवाल का कालाजार के निदान और उपचार में है योगदान

प्रो. श्याम सुंदर को कालाजार के निदान और उपचार में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए इस बार पद्मश्री सम्मान दिया गया है. इसके पूर्व राष्ट्रपति द्वारा 'विजिटर पुरस्कार' और 'डा. पीएन राजू ओरेशन' सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. वे बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (IMS) के मेडिसिन विभाग में प्रसिद्ध प्रोफेसर हैं. प्रो. श्याम ने लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी की एक खुराक से कालाजार के उपचार की विधि विकसित की है, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा मान्यता प्राप्त है.
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उनके द्वारा विकसित की गई एकल खुराक लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी को कालाजार नियंत्रक कार्यक्रम में भारत में उपयोग किया जा रहा है. इसके अलावा, उन्होंने कालाजार के उपचार में मल्टी ड्रग थेरेपी का सफल परीक्षण भी किया, जिसे डब्ल्यूएचओ ने अनुमोदित किया. पेरेमोमाइसीन और मिल्टेफोसीन दवा का संयोजन अब राष्ट्रीय नियंत्रण कार्यक्रम के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर इस्तेमाल किया जा रहा है. प्रो. श्याम ने कालाजार के उपचार के लिए पहली बार प्रभावी दवा मिल्टेफोसीन भी विकसित की है. यह दवा भारत, नेपाल और बांग्लादेश में कालाजार उन्मूलन कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई है और अब यह दवा विश्व स्तर पर उपयोग की जा रही है. इसके अतिरिक्त, उन्होंने आरके-39 स्ट्रीप जाच का परीक्षण भी किया, जो कालाजार के निदान में एक महत्वपूर्ण कदम है.MusicLegend



