35 साल बाद बांग्लादेश को मिलेगा पुरुष प्रधानमंत्री, जाने कौन है तारिक रहमान

बांग्लादेश में बीते गुरुवार को हुए आम चुनाव में बांग्लादेश की नेशनलिस्ट पार्टी यानि (BNP) ने बड़ी जीत हासिल की है. BNP ने 299 (निन्यानबे) सीटों में से 209 हासिल कर बहुमत के लिए जरूरी 150 के आंकड़े को पार कर लिया है. बीएनपी अब बांग्लादेश में सरकार बनाने को तैयार हो चुकी है, जहां तारिक रहमान बांग्लादेश के अगले प्रधानमंत्री बनने वाले है, लेकिन शफीकुर रहमान की अगुवाई वाला जमात ए इस्लामी यानी (BJI) गठबंधन बहुत पीछे रह गई है. खुशी की बात तो यह है कि, देश में करीब 20 साल बाद BNP की सरकार बनकर उभरी है. माना जा रहा है कि वह 14 फरवरी (शनिवार) को तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें इस जीत की बधाई दी है.

कौन है तारक रहमान
तारिक रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति जिया उर रहमान और पहली महिला प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बड़े बेटे हैं. 1967 सड़सठ में जन्मे बेटे रहमान की राजनीतिक पहचान उनके परिवारिक राजनीतिक रसूख से जानी जाती है. मां खालिदा जिया जब 2001 से 2006 तक बांग्लादेश में दूसरी बार प्रधानमंत्री रहीं तब एक प्रमुख संगठनात्मक रणनीतिकार के तौर पर तारिक रहमान ने पर्दे के पीछे से बखूबी मोर्चा संभाला. पार्टी पर पकड़ मजबूत बनाए रखने के नाते वह बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष बन बैठे. 2008 में हुए आम चुनाव में अवामी लीग की जीत हुई और शेख हसीना प्रधानमंत्री बनीं, तब रहमान ने बीएनपी द्वारा राजनीतिक उत्पीड़न के आरोपों का हवाला देते हुए बांग्लादेश छोड़कर लंदन में बस गए.

विदेश में रहने के बाद भी पार्टी को संभाले रखा. तारिक के प्रधानमंत्री का चेहरा होना काफी लोगों के लिए खुशी की बात है, तारिक ने दो सीटों से चुनाव लड़ते हुए दोनों पर ही अपना परचम लहराया है, वे पिछले साल दिसंबर में 17 साल बाद देश लौटे थे, जब उनकी मां खालिदा का निधन हुआ था. खास बात तो यह है कि, बांग्लादेश में 35 साल बाद कोई पुरुष प्रधानमंत्री बनने जा रहा है, 1988 (अट्ठासी) में काजी जफर अहमद प्रधानमंत्री थे. इसके बाद 1991 इक्यानबे से 2024 तक देश की राजनीति में पूर्व पीएम शेख हसीना और खालिदा जिया का दबदबा कायम रहा. ये दोनों महिलाओं ने प्रधानमंत्री के रूप में बांग्लादेश का कार्यभार संभाला.

बीएनपी पार्टी की जीत की वजह बड़ी ही दिलचस्प है. बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के वोट खासकर हिंदू वोटर BNP में शिफ्ट हो गए है. जिसका नतीजा जीत के रूप में देखने को मिला है. BNP को अवामी लीग के गढ़ रहे गोपालगंज के अलावा खुलना, सिलहट, चटगांव, ठाकुरगंज में जीत मिली है. वहीं, इस चुनाव में उन तमाम छात्र नेताओं की राजनीतिक पार्टी भी शामिल थी, जिन्होंने बांग्लादेश में मौजूद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना सरकार को उखाड़ फेंका था.

इस प्रोटेस्ट को Gen Z जेन ज़ेड प्रोटेस्ट का नाम दिया गया था. अब चुनाव नतीजों के बाद ये सवाल उठने लगा है कि आखिरकार उन छात्र नेताओं का क्या हुआ, जिन्होंने बांग्लादेश में सत्ता को बेदखल करने का काम किया था. प्रदर्शन से उभरे छात्र नेताओं ने चुनाव से पहले नई पार्टी बनाई थी, जिसका नाम जातीय नागरिक पार्टी यानि (JNP) रखा गया था. इसे नेशनल सिटिजन पार्टी यानि (NCP) के नाम से बांग्लादेश में जाना जाता है. प्रदर्शन में शामिल इन छात्रों को चुनाव में फायदा देने के बजाय बांग्लादेशियों ने इसे नकार दिया है.
जमात में बांग्लादेशियों ने नहीं दिखाई दिलचस्पी
बात करें जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन की तो इसे 70 की आस-पास की कुछ सीटें मिली हैं. जमात प्रमुख शफीकुर रहमान ने ढाका-15 सीट से जीत दर्ज की है. इसके प्रमुख शफीकुर रहमान का अतीत चुनाव के नतीजों में साफ देखने को मिला. जी हां, लोगों को उसकी वो करतूते चुनाव के दौरान भी याद रही जो उसने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम का विरोध किया था, जमात इस दाग को धोने में फेल हो गया. जिसका नतीजा बांग्लादेश चुनाव में हार मिली. पाकिस्तान की करीबी मानी जाने वाली जमात ए इस्लामी की करारी हार के पीछे कहीं ना कहीं उसकी कट्टर सोच ही ज़िम्मेदार है. बांग्लादेश का ये वहीं राजनीतिक दल है, जिसने 1971 (इकहत्तर) में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी का विरोध किया था. इतना ही नहीं, इसी जमात पार्टी पर शेख हसीना कई बार कट्टरता फैलाने के आरोप में प्रतिबंध लगा चुकी हैं.

क्यों हार गया जमात
ऐसे में ये सवाल उठने लगता है कि 90% मुस्लिम आबादी वाले बांग्लादेश में आख़िरकार जमात हार कैसे गई? वो भी तब जब इस्लामी शासन ही जमात का प्रमुख चुनावी एजेंडा रहा है. बांग्लादेश के चुनाव नतीजों में जमात की हार से यह जाहिर होता है कि बांग्लादेश की जनता अब दुबारा से पाकिस्तान के बुरे प्रभाव को देश में लागू नहीं होने देना चाहती है,इसीलिए जमात को चुनाव में हराना ही सही समझा. इस आवाम का अब सोचना है कि बांग्लादेश कंट्टरपंथी से हटकर एक नए विकास वाला राज्य बनकर उभरे, हर किसी के साथ एक जैसा व्यवहार हो, ताकि सभी भाईचारे के साथ रह सके.बांग्लादेशी जनता हमेशा से भारत को अपने करीब देखना चाहती है, न कि पाकिस्तान को. इसीलिए पाकिस्तान परस्त जमात को जनता ने सत्ता तक नहीं पहुंचने दिया. बांग्लादेश की जनता यह भी जानती है कि जमात पाकिस्तान के एजेंडा को बहुत ही आगे रखती है.



