बिहार में एनडीए का दबदबा, कांग्रेस का पुनर्जन्म?

बिहार में एनडीए का दबदबा, कांग्रेस का पुनर्जन्म?
202 सीटें जीतकर एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) ने बिहार में सरकार बनाने का स्पष्ट जनादेश हासिल कर लिया. भाजपा और जनता दल (यूनाइटेड) की जोड़ी ने अपेक्षित से अधिक प्रदर्शन करते हुए सत्ता पर पुनः कब्ज़ा किया है. एनडीए की इस ‘सुनामी’ में विपक्षी महागठबंधन बुरी तरह पिछड़ गया. भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, जबकि नीतीश कुमार की जेडीयू को 85 सीटें मिलीं.

वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन को भारी पराजय झेलनी पड़ी. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी अपने व्यापक अभियान के बावजूद कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाई और खाता तक नहीं खोल सकी.
बिहार चुनाव 2025 सीटों का पूरा लेखा-जोखा
| पार्टी | जीती सीटें |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 89 |
| जनता दल (यूनाइटेड) – JD(U) | 85 |
| राष्ट्रीय जनता दल (RJD) | 25 |
| लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) – LJPRV | 19 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 6 |
कांग्रेस का प्रदर्शन: संघर्ष जारी पर उम्मीद बरकरार
कांग्रेस इस बार 60 सीटों पर चुनाव लड़कर केवल 6 पर जीत दर्ज कर सकी. उसका कुल वोट शेयर 8.71 प्रतिशत रहा, जो 2020 के 9.6 प्रतिशत से थोड़ा कम है. पिछली बार पार्टी ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 19 सीटें जीती थीं.
बिहार में लंबे समय से कांग्रेस सत्ता से दूर रही है. 2015 में 27 सीटें जीतने वाली पार्टी 2010 में केवल 4 सीटों पर सिमट गई थी. इस बार का प्रदर्शन निश्चित रूप से अपेक्षा से कमजोर रहा, लेकिन विशेषज्ञ इसे बिहार की जटिल सामाजिक संरचना और संगठनात्मक कमज़ोरी से जोड़कर देख रहे हैं.

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विश्लेषकों की राय और नेताओं की प्रतिक्रियाएं
परिणामों के बाद कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए. प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, “यह चुनाव बिहार की जनता बनाम चुनाव आयोग था.” वहीं, दिग्विजय सिंह ने फ़र्ज़ी मतदाता सूचियों और ईवीएम को लेकर शंका जताई. भूपिंदर हुड्डा ने भी माना कि रैलियों की भीड़ कुछ और संकेत दे रही थी, लेकिन नतीजे अप्रत्याशित निकले.
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन संगठनात्मक ढांचे की कमी, सीमित सामाजिक आधार और गठबंधन में तालमेल की कमजोरी की वजह से हुआ.
काँग्रेस से चूक कहाँ हुई?
राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा के बाद उम्मीद थी कि कांग्रेस इस बार बेहतर प्रदर्शन करेगी. राहुल गांधी की जनसंवाद यात्राओं ने जनता में उनकी छवि को मज़बूत किया, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का ज़मीनी संपर्क कमजोर रहा. अधिकांश वरिष्ठ नेता चार्टर्ड विमानों से सभाएं करने आए और वापस लौट गए, जिससे स्थानीय नेतृत्व और जनता के बीच ठोस जुड़ाव नहीं बन पाया.

कांग्रेस एक वैचारिक पार्टी है, पर बिहार की राजनीति सामाजिक और जातिगत समीकरणों पर अधिक निर्भर है. राहुल और प्रियंका गांधी के अलावा पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं दिखता जो बिहार में व्यापक जनाधार पैदा कर सके.
वहीं दूसरी तरफ़ एनडीए गठबंधन ने चुनाव की शुरुआत के दिनों से ही बिहार में लालू यादव के शासनकाल के दौरान रहे कथित ‘जंगलराज’ को अपने नैरेटिव का आधार बनाए रखा.
काँग्रेस के पास से बिहार के मुद्दे गायब थे, उनके ज्यादातर मुद्दे ‘वोट चोरी, धर्म और अंबानी/अदानी से जुड़े हुए थे’. ऐसे में जनता का उनसे कनेक्ट कर पाना बेहद मुश्किल था, जिसे हम एक कारण मान सकते है.

चुनावी रणनीति में एनडीए की बढ़त
एनडीए ने चुनाव प्रचार में लालू यादव के शासनकाल के दौरान रहे कथित ‘जंगलराज’ को अपने नैरेटिव का केंद्र बनाया. उसने अपने शासन की खामियों को चर्चा से दूर रखकर विरोधियों को रक्षात्मक स्थिति में रखा. वहीं, महागठबंधन के भीतर तालमेल की कमी और आपसी अविश्वास स्थिति को और बिगाड़ता गया.
एनडीए गठबंधन की सबसे कामयाब रणनीति यह रही कि उन्होंने अपने शासनकाल की कमियों की तरफ़ ध्यान ही नहीं जाने दिया ना ही उसे चर्चा में आने दिया बल्कि कभी लालू के ज़माने को सुर्ख़ियों में रखा और चर्चा भी इसके ही इर्द-गिर्द रही.
बिहार चुनाव में एक तरफ़ एनडीए नए दलों को जोड़कर मज़बूत हो रहा था तो दूसरी तरफ़ महागठबंधन की प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल में तालमेल और विश्वास की कमी दिखने लगी थी.
कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत वाली प्रमुख सीटें
कांग्रेस के छह विजयी उम्मीदवारों ने स्थानीय स्तर पर मुकाबला जीतने में सफलता पाई.
- अभिषेक रंजन (चनपटिया) – भाजपा के उमाकांत सिंह को 602 वोटों से हराया.
- मनोज बिश्वास (फ़ोर्ब्सगंज) – विद्यासागर केशरी को 221 वोटों से हराया.
- मोहम्मद कमरुल (किशनगंज) – स्वीटी सिंह को 12,794 वोटों से पराजित किया.
- सुरेंद्र प्रसाद (वाल्मीकि नगर) – अपनी सीट सुरक्षित रखी.
- आबिदुर रहमान (अररिया) – फिर से जीत दर्ज की.
- मनोहर प्रसाद सिंह – शंभू कुमार सुमन को 15,000 से अधिक मतों से पराजित किया.

संघर्ष से पुनर्जागरण की ओर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भले ही कांग्रेस को सीमित सफलता मिली हो, लेकिन इस चुनाव ने उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता और संगठनात्मक पुनर्गठन की दिशा को स्पष्ट किया है. सीमित संसाधनों और कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी कांग्रेस ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. राहुल गांधी और पार्टी कार्यकर्ताओं का संघर्ष यह संकेत देता है कि यह केवल हार नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए पुनर्जागरण की शुरुआत है.
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