राय कृष्णदास और श्यामजी कृष्ण वर्मा के योगदान पर BHU में मंथन, भारतीय कला से स्वतंत्रता आंदोलन तक की विरासत पर हुई चर्चा

वाराणसी: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के भारत अध्ययन केन्द्र एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ” के तहत गुरुवार को दो महत्वपूर्ण व्याख्यान आयोजित किए गए. कार्यशाला में “राय कृष्णदास का काशीस्थ जीवन और सांस्कृतिक चेतना” तथा “श्यामजी कृष्ण वर्मा : नवजागरण और राष्ट्रीय चेतना” विषयों पर वक्ताओं ने भारतीय कला, सांस्कृतिक स्मृति, भारत विद्या और स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न आयामों पर विचार रखे.
10 से 31 अगस्त तक हाइब्रिड माध्यम से आयोजित हो रही कार्यशाला के सत्र में नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने राय कृष्णदास के जीवन और उनके सांस्कृतिक योगदान पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि राय कृष्णदास भारतीय कला-संस्कृति की राष्ट्रीय स्मृति को संरक्षित करने वाले अत्यंत मर्मज्ञ अध्येता थे। उन्होंने कहा कि “भारत कला भवन अगर हमारी राष्ट्रीय स्मृति है, तो राय कृष्णदास उस स्मृति की स्मृति हैं.
व्योमेश शुक्ल ने कहा कि राय कृष्णदास में कला को केवल देखने की नहीं, बल्कि उसकी संवेदना और अंतर्वस्तु में उतरकर उसे समझने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने कला-संग्रह और कला-अध्ययन को व्यक्तिगत रुचि तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे भारतीय सांस्कृतिक चेतना के व्यापक संदर्भ से जोड़ा.
उन्होंने बताया कि राय कृष्णदास की इच्छा थी कि कालिदास के ‘मेघदूत’ के काव्यांशों पर आधारित चित्रावली तैयार की जाए. इसी उद्देश्य से शैलेन्द्रनाथ डे काशी आए थे, राय कृष्णदास ने उन्हें पर्वतीय परिवेश का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए मसूरी ले जाकर कला-निर्माण के लिए आवश्यक अनुभूति प्राप्त करने में मदद की.

व्योमेश शुक्ल ने कहा कि राय कृष्णदास के व्यक्तित्व में विनम्रता और रईसी का अद्भुत समन्वय था, उनका घर फारसी, हिंदी और अंग्रेजी सहित विभिन्न भाषाओं और ज्ञान परंपराओं का संगम था। उन्होंने काशी के चौखंभा क्षेत्र को नवजागरण के उभार का महत्वपूर्ण केंद्र बताते हुए राय कृष्णदास की सांस्कृतिक भूमिका को रेखांकित किया.
उन्होंने कहा कि 1 जनवरी 1920 को राय कृष्णदास ने भारत कला भवन की स्थापना की थी, जिसकी शुरुआत गोदौलिया में “भारत कला परिषद” के रूप में हुई थी, आगे चलकर यह भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संग्रह और अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र बना। राय कृष्णदास का योगदान केवल कलाकृतियों को संग्रहित करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति, सौंदर्यबोध और परंपरा को सुरक्षित रखने का काम किया,
भारत विद्या से अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन तक श्यामजी कृष्ण वर्मा की यात्रा
दूसरे सत्र में डीएवी पीजी कॉलेज के हिंदी विभाग के प्रोफेसर प्रो. समीर कुमार पाठक ने “श्यामजी कृष्ण वर्मा : नवजागरण और राष्ट्रीय चेतना” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि श्यामजी कृष्ण वर्मा की यात्रा भारतीय विद्या से शुरू होकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाने वाली यात्रा थी।
प्रो. पाठक ने बताया कि श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सीमित संसाधनों के बावजूद संस्कृत और भारत विद्या के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई, मोनियर मोनियर-विलियम्स से संपर्क के बाद उन्हें ऑक्सफोर्ड में भारत विद्या के अध्ययन का अवसर मिला, उन्होंने ऑक्सफोर्ड में शिक्षा प्राप्त की और बाद में कानून की पढ़ाई भी की,उन्होंने कहा कि इंग्लैंड में रहते हुए, श्यामजी कृष्ण वर्मा ने भारतीय पक्ष को मजबूती से उठाया और ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की, वे केवल अकादमिक विद्वान नहीं रहे, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चेतना के सक्रिय वैचारिक पक्षधर बने.
प्रो. पाठक ने कहा कि श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित इंडिया हाउस विदेश में भारतीय राष्ट्रवादी गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बना. उन्होंने भारतीय विद्यार्थियों के लिए फेलोशिप शुरू कीं, जिनका उद्देश्य प्रतिभाशाली युवाओं को भारत के उत्थान और स्वतंत्रता के कार्य से जोड़ना था, इसी राष्ट्रवादी वातावरण से विनायक दामोदर सावरकर जैसे युवा भी जुड़े,उन्होंने बताया कि मार्च 1905 में ‘द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ, इसके माध्यम से विदेश में भारतीय राष्ट्रवादी विचारों को अभिव्यक्ति मिली और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों की आलोचना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आई.
प्रो. पाठक ने कहा कि श्यामजी कृष्ण वर्मा का संघर्ष केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, उन्होंने भारतीय संस्कृति, भारत विद्या और सांस्कृतिक चेतना को भी स्वतंत्रता आंदोलन के वैचारिक आधार से जोड़ा, उनके लिए भारत का अध्ययन महज अकादमिक विषय नहीं, बल्कि भारत की आत्मचेतना और स्वतंत्रता के संघर्ष का हिस्सा था.उन्होंने बताया कि ब्रिटिश शासन के विरोध के कारण श्यामजी कृष्ण वर्मा को लंदन छोड़ना पड़ा और उन्होंने पेरिस में निर्वासित जीवन बिताया, इसके बावजूद उनका वैचारिक संघर्ष जारी रहा। लगभग 33 वर्षों तक निर्वासन में रहते हुए उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चेतना के लिए काम किया.
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प्रो. पाठक ने कहा कि श्यामजी कृष्ण वर्मा के जीवन की विशेषता उनका स्वतंत्र चिंतन था, वे जिन नेताओं के समर्थक थे, उनकी नीतियों से असहमति होने पर भी अपनी बात कहने से पीछे नहीं हटते थे, उनके जीवन से यह सीख मिलती है, कि वैचारिक मतभेद के बावजूद व्यक्ति अपने मूल्यों और सिद्धांतों के साथ खड़ा रह सकता है.उन्होंने श्यामजी कृष्ण वर्मा और जवाहरलाल नेहरू की जेनेवा में हुई मुलाकात का भी उल्लेख किया। साथ ही बताया कि बाद के वर्षों में उनकी स्मृति और योगदान को पुनः राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने के प्रयास हुए.
कार्यशाला में दोनों सत्रों के दौरान भारतीय कला, सांस्कृतिक स्मृति, देशज ज्ञान परंपरा, भारत विद्या तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय आयामों पर विस्तार से चर्चा हुई, कार्यक्रम में BHU सहित विभिन्न संस्थानों के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और भारत अध्ययन में रुचि रखने वाले प्रतिभागी हाइब्रिड माध्यम से जुड़े कार्यशाला के माध्यम से भारतीय इतिहास, कला, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना से जुड़े ऐसे व्यक्तित्वों के योगदान को नई पीढ़ी के सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है, जिन्होंने अपने समय में भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.



