दुनिया भर में फैले सिंधी, लेकिन डीएनए एक: BHU के शोध में 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी से जुड़ी विरासत का खुलासा...

वाराणसी : काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के वैज्ञानिकों के एक महत्वपूर्ण शोध में सामने आया है कि दुनिया भर में फैले सिंधी समुदाय की आनुवंशिक पहचान आज भी 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी हुई है. अध्ययन में यह भी पाया गया कि भारत और पाकिस्तान में रहने वाले सिंधी न केवल सांस्कृतिक और भाषाई रूप से, बल्कि अपने डीएनए के स्तर पर भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं.
यह शोध BHU की ज्ञान लैब की वैज्ञानिक चंचल देवनानी, जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे तथा गुजरात विश्वविद्यालय के डॉ. खुशबू गौतम और प्रो. राकेश रावल ने संयुक्त रूप से किया है. शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित हुआ है.

शोधकर्ताओं ने 113 सिंधी व्यक्तियों के करीब 7.3 लाख डीएनए मार्कर्स का विश्लेषण किया और उनकी तुलना 2000 अन्य लोगों के आनुवंशिक आंकड़ों से की. अध्ययन में पता चला कि आधुनिक सिंधियों के डीएनए का 60 से 66 प्रतिशत हिस्सा प्राचीन सिंधु घाटी क्षेत्र की आबादी से जुड़ा है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह आनुवंशिक मिश्रण लगभग 2500 से 2900 वर्ष पहले हुआ था.
अध्ययन में यह भी सामने आया कि विभाजन के बाद सिंधी समुदाय भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना सहित कई राज्यों में बस गया, लेकिन उनकी मूल आनुवंशिक संरचना लगभग समान बनी रही.
शोध के दौरान भारत और पाकिस्तान के सिंधियों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर भी सामने आया. पाकिस्तानी सिंधियों में रिश्तेदारों के बीच विवाह की परंपरा अधिक होने के कारण इनब्रीडिंग का स्तर ज्यादा पाया गया, जबकि भारतीय सिंधियों में विभिन्न क्षेत्रों में बसने और अलग-अलग सिंधी समुदायों में विवाह होने से आनुवंशिक विविधता अपेक्षाकृत अधिक देखी गई.
शोध की प्रथम लेखिका चंचल देवनानी ने कहा कि यह अध्ययन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारत और पाकिस्तान के सिंधी समुदाय आज भी अपने साझा जीनोम से जुड़े हुए हैं.
प्रमुख जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि सिंधी समुदाय भी यहूदियों की तरह एक वैश्विक डायस्पोरा है. विभाजन ने उन्हें अलग-अलग देशों में बांट दिया, लेकिन उनका डीएनए आज भी 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी की साझा विरासत से जुड़ा हुआ है.
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शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन न केवल सिंधी समुदाय के इतिहास और प्रवासन को समझने में मदद करेगा, बल्कि यह भी साबित करता है कि विज्ञान अतीत की विरासत और वर्तमान की साझा मानवता के बीच मजबूत कड़ी का काम करता है.



