रंगभरी एकदशी पर भक्तों में उल्लास, होली के रंग में रंगी काशी नगरी

वाराणसी: महादेव की नगरी काशी अब होली के रंग में रंग गई है. शुक्रवार को बाबा के गौने की बारात सजने के साथ ही काशी में होली का चटख रंग निखर गया है. बाबा की मनौती, मनुहार और दर्शन कर पाने के अनुनय के साथ बाबा को मन भर निहार लेने का दौर शुरू हुआ. इस अवसर पर बाबा ने भक्तों को होली के रंगों के उल्लास में शामिल होने की अनुमति दी. मौसम के बदलते रंगों के बीच होली का उल्लास और भी चटख हो गया. भक्तों और भगवान के बीच लोकाचार की परंपरा काशी में फिर से जीवित हो उठी.

भक्तों ने बाबा और मां गौरा को पहला गुलाल न लगा पाने का मलाल भुलाते हुए महंत आवास स्थित टेढ़ी नीम पर जाकर दर्शन किए. बाबा और मां गौरा के दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतारें दूर तक लगी रहीं. वहीं, बाबा दरबार में सुबह की मंगला आरती के बाद से दोपहर तक एक लाख से अधिक श्रद्धालु हाजिरी लगा चुके थे. वहीं टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास से बाबा की पालकी निकलने से पहले डमरू बजना शुरू हुआ तो दूसरी ओर हर हर महादेव की बाबा दरबार परिक्षेत्र गूंज उठा.

इस बार होली का पर्व विशेष रूप से भक्तों के लिए आनंद का स्रोत बन गया है. भक्तों ने बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम को रंगों के माध्यम से व्यक्त किया. भक्तों की संख्या में वृद्धि से यह स्पष्ट होता है कि काशी में होली का पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर है, जो हर वर्ष भक्तों को एकत्रित करता है. इस बार की होली में भक्तों ने रंगों के साथ-साथ अपने दिलों में भी प्रेम और भाईचारे का रंग भरा है.

काशी की गलियों में होली का उल्लास देखते ही बनता है. भक्तों का उत्साह और बाबा के प्रति उनकी भक्ति इस पर्व को और भी खास बना देती है. काशी में होली का पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह एकता, प्रेम और भाईचारे का संदेश भी देता है. भक्तों की आस्था और उत्साह से यह पर्व हर वर्ष और भी भव्यता के साथ मनाया जाता है. काशी की होली इस बार भी रंगों और उल्लास से भरी हुई है.
लोकाचार और परंपरा का अद्भुत संगम
महाशिवरात्रि पर बाबा अपने विवाह के बाद ,रंगभरी एकादशी पर गौरा का गौना लेकर आते हैं. काशीवासी बाबा के भाल पर गुलाल लगाकर और माता पार्वती के चरणों में अबीर अर्पित करके होली खेलने की अनुमति मांगते है. काशी में रंगभरी एकादशी से होली की शुरुआत हो जाती है. श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एवं संयुक्त निदेशक ,धर्मार्थ कार्य विभाग विश्व भूषण मिश्र ने बताया कि रंगभरी एकादशी के अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ धाम और श्री कृष्ण जन्मस्थान के मध्य सांस्कृतिक एवं उपहारों का आदान-प्रदान किया गया जो काशी और ब्रज के मध्य प्राचीन धार्मिक संबंधों को सुदृढ़ करती है, तथा समस्त देशवासियों को एकता, श्रद्धा और उत्सवधर्मिता का संदेश प्रदान करती है. काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास और पुलिस विभाग ने श्रद्धालुओं की सुगमता और सुरक्षा के लिए पूरी तैयारी कर ली है.

महाशिवरात्रि पर भूतभावन बाबा विश्वनाथ की शादी के बाद, रंगभरी एकादशी पर देवाधिपति भगवान शंकर मां पार्वती का गौना कराकर घर लाते है. इस दिन पूरी काशी में उत्सव व उल्लास का माहौल होता है. पूरी काशी रंग और गुलाल से सराबोर हो जाती है. परम्परा के अनुसार पूर्व महंत जी के आवास से हर-हर महादेव के उद्घोष और डमरू दल के नाद के साथ,बाबा, गौरा का गौना कराके पूरे परिवार के साथ निकलते है,और भक्तों के साथ जम कर होली खेलते हैं. मंदिर प्रांगण के भीतर काशीवासियों को अपने महादेव की चल प्रतिमा के साथ अबीर, गुलाल और रंगों की होली खेलने हेतु आमंत्रित किया गया है. वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार बाबा की प्रतिमा बाहर से लाई जाती है.
लोकाचार तथा सांस्कृतिक शास्त्रीय परंपरा के अनुसार यह चल प्रतिमा गर्भगृह में विराजमान होगी, जहाँ सप्तऋषि आरती एवं अन्य अनुष्ठान विधि पूर्वक संपन्न किए जाएंगे. करीब छह घंटे बाबा नगर भ्रमण करेंगे. ‘शिवार्चनम मंच’ से पहली बार ब्रज के रसियारों द्वारा ‘रास’ एवं ‘फूलों की होली’ का भव्य आयोजन होगा,जो ब्रज एवं काशी की सांस्कृतिक एकता का अनुपम उदाहरण होगा, सांस्कृतिक कार्यक्रम कार्यक्रम रात्रि 10:00 बजे तक चलेगा.



