आखिर इत्ते सालों से खामेनेई कैसे कर रहे ईरान पर कब्जा, जाने राज

ईरान इस वक्त बड़े उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. जहां अयातुल्लाह खामेनेई सरकार के खिलाफ कई दिनों से विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, हजारों की संख्या में महिलाओं से लेकर युवा तक खुलकर सड़कों पर उतरकर हिंसा प्रदर्शन करने को मजबूर हो चुके हैं, इन विरोध प्रदर्शन में अब तक हजारों लोगों की मौत हो चुकी है. ईरान में खामेनेई शासन के खिलाफ भड़के हिंसा प्रदर्शनों के बीच भारतीय नागरिकों को लेकर आई पहली दो वाणिज्यिक उड़ानें बीती रात राजधानी दिल्ली जा पहुंचीं, ईरान से लौटी एक यात्री ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि, प्रदर्शन काफी उग्र थे, आगजनी भी देखी गई, लेकिन शासन समर्थकों की मौजूदगी के बाद भी हालात काबू में नहीं आते नजर आ रहे थे, जो किसी डरावनी स्थिति से कम नहीं.

हालांकि, ईरान के दुखद हालात को देखते हुए भारतीय सरकार किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार होने के साथ ही अपने नागरिकों को गैर-जरूरी यात्रा करने से बचने की सलाह भी दे चुकी है. वहीं बिगड़ते हालात को खामेनेई के सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने ईरान की स्थिति को और भी तनावपूर्ण बना दिया है. जहां अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रंप की तीखी बयानबाजी भी शुरू हो गई, जिससे यह माना जा रहा है कि अब ईरान की राजनीति में एक बड़ा तूफान आने वाला है. दूसरी ओर ये भी संकेत मिल रहे कि स्थिति कुछ हद तक शांत हो रही है. क्योंकि ट्रंप ने अपना आक्रामक रुख नरम किया है.

36 साल से सत्ता को संभालने का क्या है राज
आपको बता दें कि, चार दशक बाद भी अमेरिका और इजराइल को ईरान की मौजूदा व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती लगती है. लेकिन इस व्यवस्था को हिलाना इतना मुश्किल नहीं, क्योंकि इसके मजबूत बुनियाद ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई है, जो 36 साल से भी ज्यादा वक्त से सत्ता को संभाले बैठे हैं. विरोध चाहे जितना भी हो, अंतरराष्ट्रीय दबाव कितना भी बढ़ जाए, पर किसी भी हाल में खामेनेई का सिस्टम इसलिए नहीं डगमगा सकता क्योंकि इसके पास वह ढांचा है जिसे ईरान की असली ताकत माना जाता है.

ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई एक मजबूत राजनीतिक विशेषज्ञ है, इस सरकार की मजबूती का राज ईरान के उस राजनीतिक ढांचे में छिपा है, जिसे समझना थोड़ा मुश्किल तो है पर ईरान की मजबूती पकड़ से कम नहीं हैं. इस ढांचे की शुरुआत 1979 की क्रांति से होती है, जब ईरान में एक अनोखा पद बनाया गया. रहबर-ए-आला, यानी सुप्रीम लीडर. यह सिर्फ राजनीतिक पद नहीं था, बल्कि राष्ट्र का धार्मिक मार्गदर्शक भी माना गया. इसलिए यह पद राष्ट्रपति से कई गुना शक्तिशाली हो गया. सेना, विदेश नीति, खुफिया एजेंसियां, न्यायपालिका, मीडिया. सबके फैसलों की अंतिम मंजूरी सुप्रीम लीडर के हाथ में समा बैठी है.अब सवाल उठता है कि इतनी ताकत किसे मिलती है और किसके पास यह अधिकार है कि वह ईरान का सबसे बड़ा नेता चुन सके.

जाने कैसे टिकी है खामेनेई की कुर्सी
बड़ी बात तो यह है कि, इस काउंसिल के ज्यादातर सदस्य सीधे या परोक्ष रूप से सुप्रीम लीडर द्वारा ही नियुक्त होते हैं. यानी जो संस्था सुप्रीम लीडर को चुनने वालों को मंजूरी देती है, वह खुद सुप्रीम लीडर के प्रभाव में होती है. इसी वजह से ईरान में सत्ता एक बंद घेरे की तरह काम करती है, जहां बाहर की ताकतों या विरोधी विचारों के लिए बहुत कम जगह बचती है. यही कारण है कि ईरान में सत्ता किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस पूरे ढांचे से चलती है जिसे खामेनेई सरकार ने दशकों में मजबूत बना रखा है, इसलिए उनकी कुर्सी आज भी ईरान की सत्ता में टिकी हुई हैं.



