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आईआईटी (बीएचयू) की क्रांतिकारी उपलब्धिः 13 दिनों में डायबिटिक घावों को भरने वाली बनाई दवा

आईआईटी (बीएचयू) की क्रांतिकारी उपलब्धिः 13 दिनों में डायबिटिक घावों को भरने वाली बनाई दवा
Oct 27, 2025, 08:12 AM
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Posted By Gaandiv

वाराणसी: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (बीएचयू) के स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी "इंजीनियर्ड सेल थेरेपी" विकसित की है, जो डायबिटिक (मधुमेह जनित) घावों को अत्यंत तेजी से भरने में सक्षम है. इसके प्रयोग से 13 दिनों के भीतर घाव भर जाएंगे जबकि अमूमम इस घाव को भरने में महिनों का समय लगता है. जैव-चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में यह ऐतिहासिक उपलब्धि वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती के समाधान की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा जिससे विश्वभर में लाखों लोग प्रभावित हैं.



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हर 20 सेकंड में डायबिटिक घाव से एक व्यकित खोता है अपना अंग


जानकारी दी गई कि इस मामले में चिंताजनक तथ्य यह है कि हर 20 सेकंड में दुनिया में एक व्यक्ति डायबिटिक घावों के कारण अपना अंग खो देता है. मधुमेह से पीड़ित लोगों के घाव से गंभीर संक्रमण और कई मामलों में अंग विच्छेदन (amputation) तक की नौबत आ जाती है.


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एक साथ तीन चिकित्सीय कर सकेंगे प्रोटीन उत्पन्न


बताया गया कि इस शोध का नेतृत्व डॉ. सुदीप मुखर्जी, सहायक प्रोफेसर, स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और पीएच.डी. शोधार्थी मलय नायक द्वारा किया गया. इन लोगों ने मानव कोशिकाओं को इस प्रकार इंजीनियर किया है कि वे एक साथ तीन चिकित्सीय प्रोटीन उत्पन्न कर सकते हैं. डॉ. मुखर्जी के अनुसार “ये कोशिका-युक्त हाइड्रोजेल कैप्सूल छोटे जीवित औषधि कारखानों (living drug factories) की तरह कार्य करते हैं, जो घाव की स्थिति को पहचानकर आवश्यक चिकित्सीय अणुओं की सतत आपूर्ति करते हैं. इससे घाव का तेजी और पूर्ण रूप से उपचार संभव होता है.”


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आपातकालीन और शल्य चिकित्सा में भी उपयोगी


डॉ. मुखर्जी ने आगे जानकारी दी कि डायबिटिक चूहों पर किए गए परीक्षणों में यह थेरेपी असाधारण रूप से प्रभावी सिद्ध हुई. जहां सामान्यतः घावों को भरने में कई सप्ताह लगते हैं, वहीं इस उपचार से सिर्फ 13 दिनों में घाव पूरी तरह भर गए. यही कोशिका-युक्त कैप्सूल्स यकृत (लिवर) में रक्तस्राव को भी शीघ्र रोकने में सक्षम पाए गए, जिससे यह तकनीक आपातकालीन और सर्जरी की परिस्थिति में भी उपयोगी हो सकती है.


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डायबिटिक घावों का प्रभावी उपचार रिसर्च के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धिः प्रो. अमित पात्रा


प्रो. अमित पात्रा, निदेशक, आईआईटी (बीएचयू) ने शोध दल को बधाई देते हुए कहा इंजीनियर्ड सेल-आधारित थेरेपी द्वारा डायबिटिक घावों का प्रभावी उपचार ट्रांसलेशनल बायोमेडिकल रिसर्च के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है. इस प्रकार का कार्य न केवल भारत की स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी में स्थिति को सुदृढ़ करता है, बल्कि लाखों मरीजों के जीवन में आशा की नई किरण जगाता है.

बरेका में अखिल रेल हिंदी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता आयोजित, 51 अधिकारियों-कर्मचारियों ने लिया हिस्सा.
बरेका में अखिल रेल हिंदी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता आयोजित, 51 अधिकारियों-कर्मचारियों ने लिया हिस्सा.
वाराणसी : बनारस रेल इंजन कारखाना (बरेका) में मंगलवार को राजभाषा विभाग के तत्वावधान में प्राविधिक प्रशिक्षण केंद्र में अखिल रेल हिंदी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का सफल आयोजन किया गया। प्रतियोगिता रेलवे बोर्ड के निर्देशों के अनुपालन में तथा बरेका के महाप्रबंधक आशुतोष पंत के मार्गदर्शन में आयोजित हुई।मुख्य राजभाषा अधिकारी रामजन्म चौबे के नेतृत्व में आयोजित प्रतियोगिता का उद्देश्य रेलवे बोर्ड की ओर से आयोजित होने वाली अखिल रेल हिंदी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के लिए बरेका के प्रतिभागियों का चयन करना तथा अधिकारियों और कर्मचारियों में हिंदी के प्रयोग, राजभाषा नीति एवं सामान्य ज्ञान के प्रति जागरूकता और रुचि बढ़ाना था।प्रतियोगिता में बरेका के विभिन्न विभागों के 51 अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। हिंदी माध्यम में आयोजित इस प्रतियोगिता में रेलवे, हिंदी भाषा एवं साहित्य, राजभाषा नीति तथा सामान्य ज्ञान से जुड़े प्रश्न पूछे गए। प्रतिभागियों ने पूरे उत्साह के साथ प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।ALSO READ : बीएचयू में 'नयी चाल की हिन्दी' विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ.प्रतियोगिता का आयोजन सुव्यवस्थित और उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। प्रतिभागियों ने इसे ज्ञानवर्धक, उपयोगी और प्रेरणादायक बताते हुए इसकी सराहना की। प्रतियोगिता में चयनित प्रतिभागी अब रेलवे बोर्ड की ओर से आयोजित होने वाली अखिल रेल हिंदी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में बरेका का प्रतिनिधित्व करेंगे।राजभाषा विभाग के अधिकारियों ने कहा कि इस प्रकार की प्रतियोगिताएं हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ कर्मचारियों के ज्ञानवर्धन और राजभाषा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
बीएचयू में 'नयी चाल की हिन्दी' विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ.
बीएचयू में 'नयी चाल की हिन्दी' विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ.
वाराणसी : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग एवं अंतर सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में मंगलवार से महामना सभागार, मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र में 'नयी चाल की हिन्दी' विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। 28 से 30 जुलाई तक चलने वाली इस संगोष्ठी में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वान हिन्दी भाषा, साहित्य, संस्कृति, आलोचना, अनुवाद, लोक परंपरा और डिजिटल युग में हिन्दी के बदलते स्वरूप पर विचार-विमर्श करेंगे।उद्घाटन सत्र में हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. राजकुमार ने स्वागत वक्तव्य एवं विषय-प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए कहा कि नामवर सिंह के बिना हिन्दी का कोई भी गंभीर अकादमिक विमर्श पूर्ण नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि उनसे सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन उन्हें दरकिनार कर हिन्दी के बौद्धिक विमर्श को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह भारतीय और पाश्चात्य दोनों ज्ञान परंपराओं के अद्वितीय अध्येता थे और एक आदर्श शिक्षक के रूप में उनकी पहचान सदैव बनी रहेगी।मुख्य वक्ता एवं आईएसीएलएलएस के पूर्व सचिव प्रो. हरीश त्रिवेदी ने कहा कि महादेवी वर्मा, अज्ञेय और नामवर सिंह जैसे विद्वानों को सुनकर हिन्दी भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता का वास्तविक आभास होता था। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की बहुभाषिक दृष्टि, ज्ञान के प्रति समर्पण और वैचारिक स्वतंत्रता उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताएं थीं।संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भाषा का स्वभाव निरंतर परिवर्तनशील होता है। आज व्हाट्सऐप, एसएमएस और ई-मेल जैसे त्वरित संचार माध्यम भाषा के सामने नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के सकारात्मक और रचनात्मक उपयोग पर बल देते हुए कहा कि तकनीक का उपयोग भाषा और ज्ञान के विकास के लिए किया जाना चाहिए। कला संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने डिजिटल युग में साहित्य की प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे।द्वितीय सत्र 'नामवर स्मरण' के रूप में आयोजित किया गया, जिसमें संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र की उक्ति 'हिन्दी नई चाल में ढली' केवल भाषाई बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय समाज और आधुनिक चेतना के व्यापक परिवर्तन का संकेत थी। उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम, आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना-दृष्टि और भक्ति परंपरा की मानवीय संवेदनाओं पर विस्तार से चर्चा की।प्रो. मनोज कुमार सिंह ने नामवर सिंह के व्यक्तित्व और उनकी आलोचना दृष्टि को याद करते हुए बनारस से उनके गहरे आत्मीय संबंधों का उल्लेख किया। आईआरएस अधिकारी शैलेश कुमार ने नामवर सिंह से जुड़े संस्मरण साझा किए, जबकि वरिष्ठ कथाकार एवं 'तद्भव' के संपादक अखिलेश ने प्रेमचंद की कहानी ईदगाह पर नामवर सिंह की आलोचनात्मक दृष्टि का उल्लेख करते हुए उनके प्रसिद्ध कथन "सौन्दर्य वही है, जो हमारे अस्तित्व की रक्षा कर सके" को रेखांकित किया।तृतीय अकादमिक सत्र में आरंभिक आधुनिक हिन्दी साहित्य, हिंदवी प्रेमाख्यान, भारतीय भक्ति आंदोलन और सांस्कृतिक इतिहास पर गंभीर विमर्श हुआ। टेक्सॉस विश्वविद्यालय की गुंजन मल्होत्रा, कुमार नीरज, प्रो. माधव हाड़ा और प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने शोधपरक व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा और भक्ति आंदोलन के विविध आयामों पर प्रकाश डाला।चतुर्थ सत्र में 'विश्वविद्यालय की अवधारणा' विषय पर चर्चा हुई। इसमें डी. वेंकट राव, संजय कुमार तथा स्वाति गांगुली ने भारतीय शिक्षा दर्शन, नालंदा से लेकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तक की ज्ञान परंपरा और वैकल्पिक विश्वविद्यालय अवधारणा पर अपने विचार प्रस्तुत किए।ALSO READ : काशी विद्यापीठ के कुलानुशासक प्रो. के.के. सिंह को मिला 'विशिष्ट शिक्षक सम्मान...संगोष्ठी के दौरान नामवर सिंह के शिष्य शैलेश कुमार की पुस्तक 'चंद तस्वीर-ए-बुताँ' (नामवर जी का जीवन—तस्वीरों के आईने में) का विमोचन भी किया गया। साथ ही पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। तीन दिनों तक चलने वाली इस संगोष्ठी में हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े समकालीन मुद्दों पर देश-विदेश के विद्वानों के बीच शोधपरक चर्चा जारी रहेगी.
काशी विद्यापीठ के कुलानुशासक प्रो. के.के. सिंह को मिला 'विशिष्ट शिक्षक सम्मान...
काशी विद्यापीठ के कुलानुशासक प्रो. के.के. सिंह को मिला 'विशिष्ट शिक्षक सम्मान...
वाराणसी : महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के 48वें दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय के कुलानुशासक एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ के निदेशक प्रो. के.के. सिंह को उनके उत्कृष्ट शैक्षणिक, शोध एवं प्रशासनिक योगदान के लिए 'विशिष्ट शिक्षक सम्मान' से सम्मानित किया गया। मंगलवार को रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर, सिगरा में आयोजित भव्य दीक्षांत समारोह में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय की कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया।प्रो. के.के. सिंह लंबे समय से महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में शिक्षा, शोध और प्रशासन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय में कुलानुशासक के साथ-साथ पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ के निदेशक के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। इसके अतिरिक्त वे गृहपति, छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष तथा आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी) के सदस्य सहित कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्वों का भी प्रभावी ढंग से निर्वहन कर चुके हैं।ALSO READ : श्रीकाशी विश्‍वनाथ धाम में लगे एयर प्‍यूरीफायर श्‍मशान का धुआं बन रही शुद्ध हवा...शैक्षणिक क्षेत्र में भी प्रो. सिंह का योगदान उल्लेखनीय रहा है। उनकी अब तक आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि 30 से अधिक शोध पत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उनके शोध कार्यों और अकादमिक योगदान को व्यापक स्तर पर सराहना मिली है।दीक्षांत समारोह में मिले इस सम्मान पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों, अधिकारियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने प्रो. के.के. सिंह को बधाई देते हुए इसे पूरे विश्वविद्यालय परिवार के लिए गौरव का विषय बताया। समारोह में प्रदेश सरकार के मंत्रीगण, विश्वविद्यालय के अधिकारी, शिक्षक, छात्र-छात्राएं तथा बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे.