बनारस की बुनकरी को दिलाई नई पहचान तभी मिल रहा श्रीभास चंद्र को सम्मान

वाराणसीः सदियों पुरानी बनारस की बुनकरी लुप्त न हो जाए इसलिए श्रीभास चंद्र सुपकार ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. इसका सुखद परिणाम रहा कि बनारस की हैंडलूम कला को नई पहचान मिली और आज इसे पूरी दुनिया पसंद रही है. श्रीभास चंद्र के इस मेहनत को सरकार ने भी स्वीकार किया और उन्हें सम्मान दिया. उन्हें एक बार फिर सम्मान देते हुए राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस पर सात अगस्त को राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले सम्मान समारोह में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है.
गांडीव डिजिटल से बात करते हुए बनारस के हुकुलंग में रहने वाले टेक्सटाइल डिजाइनर श्रीभास चंद्र सुपकार बताते हैं कि हैंडलूम से जुड़ाव उनका बचपन से रहा है.

पिता यदुनाथ सुपकार भी हैंडलूम टेक्सटाइल डिजाइनर थे. शांति निकेतन के फाइन आर्ट की पढ़ाई पूरी करने बाद वर्ष 1959 बनारस आए और यहां के होकर रह गए. उन्होंने अपनी डिजाइन की बदौलत सदियों पुरानी बनारस की हथकरघा की बुनकरी की कला को नया रूप दे दिया.
इसी परिवेश में श्रीभास चंद्र की परवरिश हुई इसलिए वह बनारस की बुनकरी से भली भांति परिचित थे. उसकी दुश्वारियां को भी अच्छे से समझते थे. युवा होने पर उन्होंने पिता के काम को आगे बढ़ाना तय किया और खुद भी टेक्सटाइल डिजाइनर बन गए. उनके पिता ने जो बीड़ा उठाया था उसे निभाने की ठानी और बनारस की बुनकरी को दुनिया तक पहुंचाने की जुगत में लग गए. उन्होंने सबसे पहले लुप्त हो रही कला को बचाने का प्रयास शुरू किया. कई जगहों पर प्रदर्शनियों में बनारस की खास कला अवध जामदानी, जेठवा, चंदवा को प्रस्तुत किया. इसके प्रति लोगों को आकर्षण बढ़ा. लोंगों को हैंडलूम की डिजाइन, खूबसूरती, बारीकियों को लोगों के सामने रखा. श्रीभास चंद्र सुपकार को पता था कि युवा पीढ़ी को हैंडलूम से जोड़ा जाए तो उसे बचाने के साथ बढ़ाया भी जा सकता है. इसके लिए बनारस में हैंडलूम पर तैयार होने वाले कपड़ों की डिजाइन बेहद अहम थी. उन्होंने इस पर खूब काम किया. बुनकरों को नई-नई डिजाइनों से अवगत कराया. साथ ही अपने प्रोडक्ट को प्रस्तुत करने का तरीका सिखाया. उनका प्रयास सार्थक रहा और वक्त के साथ हैंडलूम की डिमांड काफी बढ़ी. युवा भी बनारस के बुनकरों के हाथ से बुने वस्त्र खूब पसंद कर रहे हैं.

चार बार जा चुके राष्ट्रपति भवन
श्रीभास चंद्र की मेहनत जाया नहीं गई. सरकार ने इसे समझा और समय-समय पर पुरस्कृत करके उत्साह बढ़ाया. वह बताते हैं कि चार बार उन्हें राष्ट्रपति भवन जाने का मौका मिला. सबसे पहले वह 1985 राष्ट्रपति भवन गए जब उनके पिता को पद्मश्री पुरस्कार मिला. इसके बाद खुद राष्ट्रपति पुरस्कार लेने 1995 और उसके बाद पद्मश्री पुरस्कार लेने राष्ट्रपति भवन गए. वह बताते हैं कि अब तक उन्हें पांच राष्ट्रपति से मिलने का मौका मिला.

युवाओं को हैंडलूम से जोड़ने की जरूरत
श्रीभास चंद्र बुनकरों को डिजाइन के साथ सुझाव भी देते हैं. उन्होंने कई ऐसे बुनकर तैयार किए जिन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. उनका कहना है कि बुनकरों की युवा पीढ़ी हैंडलूम से जुड़ना नहीं चाहते हैं. इस कला को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि युवा बुनकरों को लिए ट्रेनिंग सेंटर खोले जाएं ताकि उन्हें हैंडलूम का प्रशिक्षण दिया जा सके और इसे संरक्षित किया जा सके.



