तीजन बाई के मन में बसते थे कबीर और उनकी काशी, निधन से मर्माहत हुए काशीवासी...

वाराणसी : पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन हो गया है. यह संगीत और संस्कृति की दुनिया की क्षति के साथ काशी का बड़ा नुकसान है. काशी उनके मन में बसती थी. यहां जन्मे कबीर दास को ईश्वर के रूप में पूजती थीं और अपनी प्रस्तुति कबीर के पद के बाद ही करती थीं. उन्होंने पूरी दुनिया में कबीर को पहुंचाया.
तीजन बाई कई बार वाराणसी आईं यहां उन्होंने अलग-अलग जगहों पर अपनी प्रस्तुति दी. वर्ष 2018 में तीजन बाई वाराणसी आईं थीं तो वह 62 वर्ष की थीं लेकिन उनकी ऊर्जा 18 साल के युवा की थी. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पंडवानी गायन के प्रस्तुतीकरण के बाद अस्सी घाट पर जब उन्होंने गायन की शुरुआत की तो थकान साफ दिख रही थी. गले से खुलकर नमस्कार भी साफ साफ नहीं निकला था मगर जैसे-जैसे महाभारत में जुए का प्रकरण आगे बढ़ता गया कथानक में भावनात्मकता बढ़ती गई, वैसे तीजन बाई का गला भी खुलता गया. द्रोपदी चीरहरण की कहानी सुनाते सुनाते वक्त तीजन बाई का गायन अपने चरम पर था. तीजन बाई की कबीर के प्रति आस्था को ऐसे समझा जा सकता है कि वह सभी प्रस्तुति में कबीर के पद गाया करती थीं. अस्सी घाट पर भी उस दिन उन्होंने
पंडवानी गायन के बाद उज्जैन के प्रह्लाद सिंह टिपानिया ने विशेष अंदाज में कबीर को याद किया। गुरु वंदना से कार्यक्रम की शुरुआत करने के उपरांत कबीर के कई प्रसिद्ध पद गाए। पारंपरिक वाद्य यंत्र लेकर बैठी अपनी टोली के साथ वह डेढ़ घंटे से अधिक समय तक काशी वासियों को कबीर वाणी का श्रवण कराती रहीं। उन्होंने अपनी पसंदीदा रचना जरा हल्के गाड़ी हांको मेरे राम गाड़ी वाले की प्रस्तुति से श्रोताओं को विभोर कर दिया। यह भजन टिपानिया के हृदय के बहुत करीब है। कार्यक्रम से पूर्व उन्होंने यह कहा कि काशी में कबीर के पदों का गायन उनके लिए सौभाग्य की बात है.
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तीजन बाई की विरासत
जन्म: 8 अगस्त 1956, गनियारी गांव (छत्तीसगढ़)।
पुरस्कार: पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण समेत अनेक
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान।
महाभारत के प्रसंगों (खासकर द्रौपदी चीरहरण, जुए का खेल आदि) को गायन, अभिनय और वार्ता शैली में प्रस्तुत करना.
तीजन बाई ने पंडवानी को पुरुष-प्रधान क्षेत्र से बाहर निकालकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी. महाभारत के प्रसंगों को अपनी अनोखी शैली से जीवंत करने वाली इस महान कलाकार ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को नई ऊंचाई दी.
उनके निधन पर कला जगत गमगीन है. काशी की वह आखिरी प्रस्तुति काशीवासियों को हमेशा याद रहेगी.



