खामेनेई की मौत से उनके गुरु के पुश्तैनी गांव किंतूर में शोक की लहर...

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई के निधन के बाद उनके गुरु अयातुल्लाह रूहोअल्लाह खुमैनी के पैतृक गांव में शोक की लहर है. ख़ामेनेई के निधन के बाद किंतूर के लोगों का कहना है कि ख़ामेनेई के विचारों का असर दुनिया भर के शिया समुदाय पर रहा है.
इतना ही नहीं, ईरान के इस्लामी गणराज्य के संस्थापक रुहोल्लाह खुमैनी के पूर्वज सैयद अहमद मुसावी का किंतूर जन्मस्थान था, जो खुमैनी के दादा थे. 19वीं शताब्दी में जन्मे मुसावी भारत छोड़कर इराक के नजफ चले गए, जो शिया शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था, और अंततः 1834 में ईरान के खुमैन शहर में बस गए. यहीं पर उनके परिवार ने अपनी नींव रखी, जो बाद में राजनीतिक और धार्मिक सत्ता के शिखर पर पहुंचने का कारण बनी.
मुसावी ने अपनी भारतीय पृष्ठभूमि के प्रतीक के रूप में "हिंदी" उपाधि को बरकरार रखा. जो ईरानी अभिलेखों में भी मिलता है और परिवार की वंशावली का एक मौन प्रमाण है.
किंतूर गांव, जो ऐतिहासिक रूप से शिया विद्वत्ता के केंद्र के रूप में जाना जाता है, अयातुल्ला रुहोल्लाह मुसावी खुमैनी का पैतृक घर है - जो 1979 की इस्लामी क्रांति के सूत्रधार और ईरान के इस्लामी गणराज्य के संस्थापक पिता थे.

किंतूर गांव का महत्व...
बाराबंकी का किंतूर गांव छोटा होने के बावजूद ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यहां से सैयद अहमद मुसावी ईरान पहुंचे और उनकी विचारधारा ने आगे चलकर ईरान के इतिहास को प्रभावित किया.
गांव के कुछ शिया परिवार आज भी अपने पूर्वजों के ईरान से संबंध का उल्लेख करते हैं. 70 वर्षीय सैयद निहाल काजमी का दावा है कि उनके परदादा मुफ्ती मोहम्मद कुली मुसावी और सैयद अहमद मुसावी चचेरे भाई थे.
1979 की ईरानी क्रांति
साल 1979 में रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में क्रांति हुई, जिसने शाह की सत्ता समाप्त कर देश को इस्लामी गणराज्य में बदला . इसके बाद खुमैनी ईरान के सर्वोच्च नेता बने. सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बावजूद खुमैनी सादा जीवन जीते थे. वे एक छोटे एक-मंजिला घर में रहते थे और निजी उपयोग के लिए सार्वजनिक धन लेने से इनकार करते थे.
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अली खामेनेई का उदय
अयातुल्ला अली खामेनेई का जन्म 17 जुलाई 1939 को मशहद में हुआ था. वे खुमैनी के विचारों से प्रभावित होकर क्रांति में शामिल हुए और खुमैनी के करीबी सहयोगी बने.1989 में की मृत्यु के बाद खामेनेई ईरान के सुप्रीम लीडर बने. हालांकि भारत से सीधा संबंध नहीं रहा, लेकिन उनके गुरु के पूर्वज भारत से जुड़े थे.
मुसावी की भारतीय स्वतंत्रा संग्राम में सक्रीय भूमिका...
बता दें कि, सैयद अहमद मुसावी ने भारतीय स्वतंत्रा संग्राम में अहम् भूमिका निभाई. और उसके बाद 1834 में एक धार्मिक यात्रा पर ईरान गए. लेकिन तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें वापस नहीं लौटने दिया क्यूंकि वह स्वतन्त्रता सेनानी थे. इसके बाद वह ईरान में ही बस ग



