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वाराणसी में रानी लक्ष्‍मीबाई जन्‍मस्‍थान पर प्रति वर्ष 14 दिसम्बर को होगा 'लक्ष्मी दीपावली' का आयोजन

वाराणसी में रानी लक्ष्‍मीबाई जन्‍मस्‍थान पर प्रति वर्ष 14 दिसम्बर को होगा 'लक्ष्मी  दीपावली' का आयोजन
Dec 15, 2025, 09:16 AM
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Posted By Gaandiv

वाराणसी - अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय के तत्वावधान में अस्सी स्थित रानी लक्ष्मी बाई जन्मस्थान पर 'काशी की विरासत व रानी लक्ष्मीबाई' विषय पर एक संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया. इसमें रानी लक्ष्मी बाई के योगदान पर चर्चा होने के साथ घाटवाक के आगामी आयोजन पर मंथन किया गया. इस अवसर पर रानी लक्ष्मीबाई की स्मृति में दीप जलाया गया और उपस्थित समस्त घाटवाकर द्वारा संकल्प लिया गया कि प्रति वर्ष 14 दिसम्बर को इस जन्मस्थान पर 'लक्ष्मी दीपावली' का आयोजन किया जाएगा. इसके जरिए काशी में विरासत व वर्तमान के बीच एक संवाद स्थापित होगा. इस अवसर पर लोक कलाकार अष्टभुजा मिश्र द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी कविता 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' की भावपूर्ण प्रस्तुति भी की गई. भूमिका ने रानी लक्ष्मीबाई के चरित्र अभिनय की भूमिका निभाई.


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कार्यक्रम मे स्वागत वक्तव्य देते हुए अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवाक के संस्थापक न्यूरो चिकित्सक प्रो. विजयनाथ मिश्र ने आगामी घाटवॉक  के कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की अवधारणा के बारे बताया. बताया कि हमें अपनी धरोहर को पहचानना होगा. इससे हमें काशी की विरासत पर गर्व की अनुभूति होगी.

कार्यक्रम की अध्‍यक्षता करते हुए हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि घाटवॉक विश्वविद्यालय अपने धरोहर को पहचानने के लिए दृढ़ संकल्पित है. रानी लक्ष्मीबाई को उन्होंने स्वराज के लिए समर्पित वीरांगना के रूप में याद किया और बताता कि वे काशी की ही बेटी है, इसमें संशय के लिए कोई जगह नहीं है. वे नारीत्व की आधुनिक प्रस्तोता रही हैं जिन्होंने जाति व धर्म से परे जाकर झांसी को बचाने का संघर्ष किया.

रानी लक्ष्मीबाई का कथन कि "मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी" – यह केवल एक वाक्य नहीं बल्कि स्वराज के लिए एक आह्वान था. स्वाधीनता के संग्राम  में दलित झलकारीबाई का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा. लक्ष्मी बाई का बचपन काशी में बीता और पेशवाओं के साथ संबंध भी इनके ही कारण मजबूत हो रहा था.


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समाजवादी नेता सूबेदार सिंह ने कहा कि मैं मानसिक रूप से घाट वॉक से हमेशा जुड़ा रहता हूँ. घाट वॉक के बाद बालूवॉक पूर्णतः. डॉ विजयनाथ मिश्र जैसे एक चिकित्सक के ही दिमाग़ की उपज है क्योंकि बालू पर चलने से हमारा घुटना सुरक्षित रहता है. स्वाधीनत चिंतन व स्‍वास्‍थ्‍य घाट वाक का प्रमुख उद्देश्य भी है. डॉ. विंध्याचल यादव ने कहा कि धरोहर से जुड़ना खुद की सार्थकता पाना है. वर्तमान से जुड़ कर हम अपने वर्तमान को सुदृढ़ करते हैं. रानी लक्ष्मीबाई में मातृत्व और वीरता का जबरदस्त सामंजस्य देखने को मिलता है. आगे उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ भारत की एक वीरांगना ने जो क्रांति के दीप जलाए हैं, इतिहास में हमे लगातार रौशनी से भर देने वाला है. जिससे हम अपने वर्तमान और आने वाले समय को, अपनी अखंडता को, अपनी एकजुटता को उस रौशनी में देख सकते हैं.

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संचालन रामयश मिश्र ने किया. इस अवसर पर भारी संख्या में घाटवाकर उपस्थित रहे. धन्यवाद शैलेश तिवारी ने दिया. कार्यक्रम के अंत में दो दर्जन लोगों को कंबल वितरित किया गया. उक्त कार्यक्रम में घाटवॉक के अनेक सदस्य मौजूद रहे.


"अपना हुनर अपनी पहचान" के दृष्टिगत पीएम ने कामगार महिलाओं से सीधा संवाद किया
"अपना हुनर अपनी पहचान" के दृष्टिगत पीएम ने कामगार महिलाओं से सीधा संवाद किया
वाराणसी : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रविवार को अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी आयें और हमेशा की तरह इस बार भी काशीवासियों को सौगात दी. मिर्जामुराद के खोचवां में अहमदाबाद गुजरात की कपड़ा निर्माता कंपनी अरविंद लिमिटेड (अरविंद मिल्स) के लगभग 150 करोड़ रुपये की लागत से लगभग 7-8 एकड़ में बने पहले मैन्युफैक्चरिंग प्लांट का उन्होंने शुभारंभ किया. "अपना हुनर अपनी पहचान" के दृष्टिगत यहां कामगार महिलाओं से सीधा संवाद किया.इस औद्योगिक प्लांट में स्थानीय ही नहीं पूर्वांचल के हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा. इतना ही नहीं स्थानीय महिलाओं को प्राथमिकता दी गई है और 300 से ज्यादा महिलाओं की भर्ती हो भी चुकी है, जिन्हें यूनिट में प्रशिक्षण दिया जा रहा है. यह पहल कपड़ा और परिधान निर्माण इकोसिस्टम को मजबूत करेगी.बताते चलें कि पूर्वांचल में अरविंद मिल्स का यह पहला बड़ा मैन्युफैक्चरिंग प्लांट है. प्लांट शुरू होने के बाद 2 फेस का निर्माण होगा, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा. काशी के इस नए प्लांट में स्पोर्टस वियर, अंडर गारमेंट आदि कपड़े का उत्पादन होगा. यहां जॉकी, यूएस पोलो और एरो जैसे ब्रांड्स का निर्माण होगा.अरविंद मिल्स सिर्फ कपड़ा बनाने वाली कंपनी नहीं है. यह धागे और कपड़े से लेकर तैयार कपड़ों तथा औद्योगिक इस्तेमाल के विशेष वस्त्रों तक का कारोबार करती है. इसकी शुरुआत 1931 में हुई थी और इसका मुख्यालय अहमदाबाद, गुजरात में है. यह डेनिम के कपड़े (इससे जींस बनाई जाती है) के साथ सूती व लिनेन के कपड़े, सादे कपड़े, सूट के लिए फैब्रिक, स्पोर्ट्सवियर के साथ घरेलू और विदेशी परिधान ब्रांडों को कपड़ा उपलब्ध कराती है.ALSO READ : रामनगर में आस्था का सैलाब, भोर की आरती में गूंजा 'जय श्रीराम, लाखों श्रद्धालु बने साक्षीप्रधानमंत्री ने शुभारंभ के पश्चात मिल के पदाधिकारियों से वहां पर बनाए जा रहे कपड़ों, खादी के बने कपड़ों एवं उनके मैटेरियल के बारे में जानकारी ली. "अपना हुनर अपनी पहचान" के दृष्टिगत महिलाओं से संवाद किया. उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों, उनकी चुनौतियों के बाबत विस्तार से जानकारी ली. अरविन्द मिल्स द्वारा उत्पादित कपड़ों की लगाई गई प्रदर्शनी का भी उन्होंने अवलोकन किया. इस दौरान प्रधानमंत्री के साथ उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित अन्य लोग प्रमुख रूप से उपस्थित रहे. इससे पूर्व मिर्जामुराद के खोचवां पहुंचने पर हेलीपैड पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राज्यपाल आनंदीबेन पटेल एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वागत किया.
रामनगर में आस्था का सैलाब, भोर की आरती में गूंजा 'जय श्रीराम, लाखों श्रद्धालु बने साक्षी
रामनगर में आस्था का सैलाब, भोर की आरती में गूंजा 'जय श्रीराम, लाखों श्रद्धालु बने साक्षी
वाराणसी : विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला में भोर की आरती का अप्रतिम महत्व है. यह आरती श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद पहली बार होती है. रविवार 25 अक्‍टूबर की सुबह इस अद्भुत आरती में लाखों लीलाप्रेमी शामिल हुए. आधुनिकता से दूर यह रामलीला अपने अनूठे प्रसंगों और अद्भुत मंचन के लिए जानी जाती है. पूरी काशी मानो इस आरती का हिस्सा बनने के लिए उमड़ पड़ी थी. लाखों की भीड़ ने "जय श्री राम" और "हर हर महादेव" के नारे लगाए. इससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया.सदियों से चली आर रही परंपरायह आरती सूर्योदय के दौरान उगते सूर्य के लिए एक विशेष अनुष्ठान है. यह परंपरा सदियों से इसी तरह चली आ रही है. आस्था का यह सैलाब गांव, गली और मोहल्लों से होता हुआ रामलीला स्थल अयोध्या पहुंचा. आरती के लिए घंटा घड़ियाल बजने लगे, जिससे आस्था का कोई ओर-छोर नजर नहीं आ रहा था.राज्याभिषेक की आरतीराज्याभिषेक की आरती रविवार को तड़के लगभग 5:35 बजे शुरू हुई. अनंत नारायण सिंह राजपरिवार के सदस्यों और दरबारियों के साथ रामनगर दुर्ग से पैदल लीला स्थल अयोध्या मैदान पहुंचे. लगभग 5:45 बजे भगवान भास्कर के दर्शन होते ही माता कौशल्या ने आरती उतारी. उन्होंने अयोध्या के सिंहासन पर विराजमान श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान की आरती की.ALSO READ : रामनगर किले में खुले दुर्लभ 'श्‍याम वर्ण हनुमान' जी के कपाट, उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़लाल और सफेद महताबी रोशनी के बीच यह चार मिनट की आरती झांकी अनुपम थी. उपस्थित विशाल जनसमूह ने इस छटा को अपने मानस पटल पर अंकित कर लिया. अनंत नारायण सिंह ने भी खड़े होकर राम राज्याभिषेक की आरती का दर्शन किया.आरती के बाद अनंत नारायण सिंह टहलने के लिए निकले. इसके बाद श्रीराम को कंधे पर उठाए बजरंग बली और सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न भक्तों के कंधों पर बैठकर बाजार भ्रमण के लिए बलुआघाट स्थित धर्मशाला पहुंचे.
रामनगर किले में खुले दुर्लभ 'श्‍याम वर्ण हनुमान' जी के कपाट, उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
रामनगर किले में खुले दुर्लभ 'श्‍याम वर्ण हनुमान' जी के कपाट, उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
वाराणसी : विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला में 'राम राज्याभिषेक' (राजगद्दी) के पावन अवसर के बाद आज रविवार को ऐतिहासिक रामनगर किले में स्थित रहस्यमयी एवं दुर्लभ दक्षिणमुखी श्‍याम वर्ण हनुमान जी के दर्शन शुरू हो गए हैं. साल में केवल एक बार खुलने वाले इस पौराणिक मंदिर के कपाट खुलते ही भगवान बजरंगबली के दर्शन और आशीर्वाद पाने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की किलोमीटर लंबी कतारें लग गई थी.वर्ष में केवल एक दिन खुलते हैं कपाटवर्ष में केवल एक दिन खुलते हैं मंदिर के कपाटरामनगर दुर्ग (किले) की परंपराओं के अनुसार, दक्षिणमुखी काले हनुमान जी का कपाट साल में केवल एक बार, राम राज्याभिषेक के ठीक अगले दिन ही श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है. स्थानीय मान्यताओं और दुर्ग की परंपरा के अनुसार, इस दक्षिणमुखी काले हनुमान जी की दिव्य शक्ति और आशीर्वाद से ही सदियों से रामनगर किले (दुर्ग) का अस्तित्व और वैभव सुरक्षित है. इसी आस्था के चलते काशी ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के जिलों से भी हजारों भक्त इस दुर्लभ दर्शन का पुण्य लाभ कमाने रामनगर पहुंच रहे हैं.त्रेतायुग और श्रीराम-समुद्र संवाद से जुड़ी है पौराणिक कथामंदिर के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व को लेकर एक बेहद रोचक प्रसंग प्रचलित है. मान्यता है कि इस प्रतिमा का संबंध त्रेतायुग में भगवान श्रीराम और रावण के युद्ध काल से है:समुद्र पर श्रीराम का कोप: जब भगवान रामेश्वरम में लंका जाने के लिए समुद्र तट पर मार्ग मांग रहे थे और समुद्र ने रास्ता नहीं दिया, तब कुपित होकर श्रीराम ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर समुद्र को सुखा देने की चेतावनी दी थी.ALSO READ : वाराणसी में पीएम मोदी ने अरविंद मिल की नई परिधान निर्माण इकाई का किया उद्घाटनहनुमान जी ने रोका था बाण: भयभीत होकर जब समुद्र प्रकट हुआ और उसने अनुनय-विनय की, तो श्रीराम ने प्रत्यंचा पर चढ़ चुके उस अमोघ बाण को दिशा बदलकर पश्चिम की ओर छोड़ दिया.अग्निबाण के तेज से काला पड़ा रंग: उस प्रचंड बाण के प्रभाव से सृष्टि को बचाने के लिए हनुमान जी ने उसे स्वयं पर रोक लिया था. बाण के असीम तेज और ज्वाला के कारण हनुमान जी का रंग श्याम (काला) पड़ गया था.सुरक्षा के कड़े इंतजाम, जयकारों से गूंजा किला परिसरअलौकिक दक्षिणमुखी काले हनुमान जी के दर्शन के लिए रामनगर किला परिसर में सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के कड़े इंतजाम किए गए हैं. पूरा किला परिसर 'जय श्री राम' और 'जय बजरंगबली' के उद्घोष से गुंजायमान है. श्रद्धालु अनुशासित रूप से कतारबद्ध होकर दर्शन कर रहे हैं और पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं.