एक हाथ नहीं, फिर भी आस्था-जुनून बरकरार; 9 साल से कांवड़ लेकर बाबा के दरबार में हाजिरी

वाराणसी:काशी विश्वनाथ धाम में सावन के अंतिम सोमवार को आस्था और जज्बे की ऐसी तस्वीर देखने को मिली, जिसने हर किसी का ध्यान खींच लिया.बहराइच से आए श्रादुल वर्मा एक हाथ से कांवड़ उठाकर बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करने पहुंचे.वर्ष 1995 में एक दुर्घटना में उनका एक हाथ चला गया, लेकिन बाबा के प्रति उनकी आस्था और श्रद्धा आज भी उतनी ही मजबूत है.
श्रादुल वर्मा बताते हैं कि करीब नौ साल पहले उन्होंने बाबा विश्वनाथ से एक मन्नत मांगी थी.उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री रत्न की प्राप्ति हो. मन्नत पूरी होने के बाद उन्होंने सावन में देवघर से कांवड़ लेकर काशी पहुंचकर बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक किया. इसके बाद से हर सावन बाबा के दरबार में जल चढ़ाना उनके जीवन का संकल्प बन गया. पिछले नौ वर्षों से वह लगातार काशी आकर बाबा का जलाभिषेक कर रहे हैं.
एक हाथ से कांवड़ उठाकर बाबा के दरबार तक पहुंचना उनके लिए भले ही चुनौती हो, लेकिन उनका विश्वास है,कि यह सब बाबा की कृपा से संभव हो रहा है. श्रादुल कहते हैं कि बाबा शक्ति देते हैं, इसलिए कांवड़ उठाने और जलाभिषेक करने में किसी तरह की परेशानी महसूस नहीं होती. उनके लिए यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि बाबा के प्रति कृतज्ञता और अटूट विश्वास का प्रतीक है.
श्रादुल का कहना है,कि नौ साल में काशी काफी बदल गई है.पहले की तुलना में श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं बेहतर हुई हैं, और प्रशासन की व्यवस्थाएं भी अच्छी हुई हैं.अब बाबा विश्वनाथ के दर्शन भी पहले के मुकाबले जल्दी हो जाते हैं.
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एक हाथ का सहारा कम हुआ तो क्या, बाबा पर विश्वास का सहारा कभी कम नहीं हुआ. यही विश्वास और जज्बा श्रादुल वर्मा को हर सावन काशी खींच लाता है और वह पूरी श्रद्धा के साथ बाबा विश्वनाथ को जल अर्पित कर अपना संकल्प निभाते हैं.



