25 साल बाद फिर टूटी रामनगर रामलीला की परंपरा, चयन के बाद बदलना पड़ा सीता का पात्र

वाराणसी : विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला में चयनित कलाकार को नहीं बदलने की परंपरा 25 साल बाद टूट गई है. इस बार सीता का पात्र बदलना पड़ा है. चयनित रुद्र उपाध्याय के व्यक्तिगत कारणों से पीछे हटने पर अब महमूरगंज निवासी देव पांडेय को यह भूमिका सौंपी गई है. गणेश पूजन के बाद उनका प्रशिक्षण भी शुरू करा दिया गया है.

रामलीला का औपचारिक शुभारंभ पिछले रविवार को गणेश पूजन के साथ हुआ. इस दौरान पंच पात्रों में श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का पूजन कराया गया, लेकिन सीता की भूमिका के लिए चयनित रुद्र उपाध्याय उपस्थित नहीं थे. रामलीला के व्यास शिवदत्त ने बताया कि रुद्र उपाध्याय ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए भूमिका निभाने में असमर्थता जताई. इसके बाद देव पांडेय का चयन किया गया और उन्हें गणेश पूजन के बाद से प्रशिक्षण में शामिल कर लिया गया.
करीब 25 साल पहले भी बदला गया था पात्र
रामलीला व्यास के अनुसार, इससे पहले करीब 25 वर्ष पहले भी चयनित पात्र को पारिवारिक कारणों से हटाना पड़ा था. उस समय भी नए कलाकार को भूमिका सौंपी गई थी. इसके बाद पहली बार चयन के बाद सीता का पात्र बदला गया है. इस वर्ष रामलीला में अंश पांडेय श्रीराम, देव पांडेय सीता, भरत तिवारी लक्ष्मण, श्रेयांश उपाध्याय भरत और शिवांश उपाध्याय शत्रुघ्न की भूमिका निभाएंगे. रामनगर रामलीला की परंपरा के अनुसार, पंच पात्र लगभग तीन महीने तक विशेष प्रशिक्षण लेते हैं. इस दौरान उन्हें उनके वास्तविक नामों से नहीं, बल्कि श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के नाम से ही संबोधित किया जाता है. यही परंपरा रामनगर रामलीला की धार्मिक गरिमा और अनुशासन की विशेष पहचान मानी जाती है.
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आज भी मशालों की रोशनी में होती है लीला
रामनगर की रामलीला को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया गया है. काशी के प्रसिद्ध लक्खा मेलों में शुमार यह रामलीला 5 किलोमीटर से अधिक के मुक्ताकाशीय मंच पर आयोजित होती है, जिसके कारण इसे दुनिया की सबसे बड़ी रामलीलाओं में गिना जाता है. आधुनिक दौर में भी इसकी परंपराएं अक्षुण्ण हैं. आज भी मंचन मशाल और पंचलाइट की रोशनी में होता है तथा कलाकार बिना माइक के ऊंचे स्वर में संवाद बोलते हैं.



