वाराणसी में मांस-मछली दुकानों के विस्थापन के मुद्दे पर सड़क पर उतरा 'साझा संस्कृति मंच', सौंपा ज्ञापन...

वाराणसी : मांस, मछली और मुर्गे की दुकानों को पूरी तरह हटाकर शहर से बाहर भेजने के फैसले के खिलाफ आज 'साझा संस्कृति मंच' ने जिलाधिकारी को संबोधित ज्ञापन एसडीएम शिवानी सिंह को सौंपा. मंच ने चेतावनी दी कि स्वच्छता और सुंदरीकरण की आड़ में गरीबों की रोजी-रोटी छीनने और बनारस के बहुसांस्कृतिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की किसी भी कोशिश का पुरजोर विरोध किया जाएगा.
ज्ञापन सौंपते हुए मंच के प्रतिनिधियों ने कहा कि शहर से 5 से 10 किलोमीटर दूर सुदूर इलाकों में दुकानों को शिफ्ट करना असल में इस व्यापार को पूरी तरह ठप करने की साज़िश है. यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (पसंद के भोजन का अधिकार) का खुला उल्लंघन है. बिना किसी पूर्व परामर्श या संवाद के लिया गया नगर निगम का यह फैसला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है.
ये स्वच्छता नहीं, कॉर्पोरेट के लिए 'मार्केट ड्रिवन तिकड़म'
साझा संस्कृति मंच ने नगर निगम की कार्यवाही पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए आरोप लगाया कि
"एक तरफ गरीब खुदरा दुकानदारों को उजाड़ा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बड़े होटलों, मॉल्स और जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को धड़ल्ले से मांस-मछली बेचने की खुली छूट है. यह साफ तौर पर हिंदू-मुस्लिम राजनीति का मोहरा बनाकर गरीब व्यापारियों को तबाह करने और पूरा बाजार कॉर्पोरेट घरानों की झोली में डालने का खेल है."
मार्च और ज्ञापन कार्यक्रम में शामिल हुए नेताओं ने कहा कि बनारस सिर्फ एक शहर नहीं, एक साझी संस्कृति है. यहाँ मल्लाह समाज की पीढ़ियों की आजीविका मछली मारने और बेचने पर टिकी है. शहर में रहने वाले लगभग एक लाख बंगाली समाज के खान-पान और पूजा-पाठ के रीति-रिवाजों में मछली अनिवार्य हिस्सा है. यही नहीं, बनारस की प्राचीन औघड़-तांत्रिक साधना में भी मांस का धार्मिक महत्व है. इस विविधता को नकार कर शहर पर एकतरफा खान-पान थोपना बनारस के मिजाज के खिलाफ है.

मंच ने स्पष्ट किया कि वे स्वच्छता के विरोधी नहीं हैं. सरकार को अगर समस्या खुले में मांस काटने से है, तो इसका समाधान विस्थापन नहीं बल्कि नियमन है. नगर निगम दुकानों को आधुनिक बनाए, काले/रंगीन शीशे और रेफ्रिजरेशन की व्यवस्था अनिवार्य करे, लेकिन रोजगार न छीने.
उन्होंने मांग की कि शहर से बाहर पूरी तरह शिफ्ट करने के एकतरफा आदेश पर तत्काल रोक लगाई जाए. सुंदरीकरण के नाम पर मांस व्यापारियों का उत्पीड़न बंद हो. कचरा प्रबंधन और बंद शीशों के पीछे बिक्री जैसे स्वच्छता के नियम कड़ाई से लागू किए जाएं, न कि दुकानें बंद कराई जाएं. कार्यकर्ताओं ने कहा कि यदि इस संवेदनशील फैसले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं किया गया और रोजगार व भोजन की आजादी पर वार जारी रहा, तो बनारस की जनता सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगी.
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जिला मुख्यालय पर मार्च और ज्ञापन सौंपने के कार्यक्रम में प्रमुख रूप से धनंजय त्रिपाठी, सतीश सिंह, रामजन्म यादव, डॉ अनूप श्रमिक, संजीव सिंह, विनय राय मुन्ना, नेविश, अबब्दुला, नीरज, अंनत, डॉ छेदी लाल निराला , मनीष शर्मा, नीति, सलमा, ओमप्रकाश मिश्रा, ध्रुव, लता, शाहिद जमाल, गौतम, धन्नजय इत्यादि शामिल रहे.



