बीएचयू में ‘सत्य हरिश्चंद्र’ का दोबारा मंचन, नाट्य परंपरा में दिखी ‘लघु भारत’ की झलक

वाराणसी. 22 अगस्त। दर्शकों की उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया और दोबारा मंचन की मांग के बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के थिएटर सेल ‘रंगशाला’ ने शनिवार को ‘सत्य हरिश्चंद्र’ का पुनर्मंचन किया। पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ऑडिटोरियम में आयोजित संगीतमय नाटक का मंचन रंगशाला ने बीएचयू की परफॉर्मिंग आर्ट्स फैकल्टी और कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, फ्रेस्नो, अमेरिका के सहयोग से किया। नाटक का निर्देशन कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, फ्रेस्नो के कम्युनिकेशन विभाग के प्रोफेसर और सातवीं पीढ़ी के सांगीत कलाकार प्रो. देवेंद्र शर्मा ने किया।
कार्यक्रम की शुरुआत देवी सरस्वती, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर और बीएचयू के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर हुई। मुख्य अतिथि डीन ऑफ स्टूडेंट्स प्रो. रंजन कुमार सिंह और विशिष्ट अतिथि कला संकाय की डीन प्रो. सुषमा घिल्डियाल रहीं।
रंगशाला के समन्वयक प्रो. संजय कुमार ने स्वागत भाषण में सांगीत, स्वांग और नौटंकी जैसी भारतीय लोकनाट्य परंपराओं की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इन विधाओं में संगीत, कविता, अभिनय, नृत्य और लोकभाषा का अनूठा समन्वय है। बदलते समय और मनोरंजन के नए माध्यमों के कारण इन लोकनाट्य शैलियों की लोकप्रियता कम हुई है। रंगशाला का प्रयास युवा पीढ़ी को इस समृद्ध नाट्य विरासत से जोड़ना और इसे नए रूप में आगे बढ़ाना है।
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मुख्य अतिथि प्रो. रंजन कुमार सिंह ने ‘सत्य हरिश्चंद्र’ की समकालीन प्रासंगिकता बताते हुए सत्य, ईमानदारी, नैतिक साहस, त्याग और विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने जैसे मूल्यों को रेखांकित किया। वहीं प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने सांस्कृतिक और नाट्य विरासत को जीवित रखने के लिए सक्रिय भागीदारी और पहचान को जरूरी बताया।
संगीत, अभिनय, संवाद और पारंपरिक सांगीत शैली के समन्वय से तैयार प्रस्तुति में नाट्य की मूल विशेषताओं को बरकरार रखते हुए उसे आधुनिक दर्शकों के अनुरूप नए मंचीय रूप में प्रस्तुत किया गया। ‘सत्य हरिश्चंद्र’ की कथा के माध्यम से सत्य, साहस, त्याग और स्वतंत्रता जैसे शाश्वत मूल्यों को सामने रखा गया। प्रस्तुति ने नौटंकी की कथात्मक क्षमता और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया।
मंच पर दिखा ‘लघु भारत’
नाटक की सबसे खास बात यह रही कि इसके कलाकार केवल उत्तर प्रदेश और बिहार तक सीमित नहीं रहे। देश के अलग-अलग हिस्सों से बीएचयू में पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने इसमें भागीदारी की। असम, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पुडुचेरी सहित विभिन्न राज्यों के विद्यार्थियों ने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। इस तरह मंचन में ‘लघु भारत’ की सांस्कृतिक विविधता दिखाई दी।
प्रमुख भूमिकाओं में तरुण सिंह भदौरिया और प्रियांशु शुक्ला ने हरिश्चंद्र, सिफारिश और धीरज सेन ने विश्वामित्र तथा रितुल और अम्रपाली शर्मा ने तारावती की भूमिका निभाई। रितिका सिंह ने तारावती के साथ विष्णु की भूमिका भी निभाई। अन्य कलाकारों में शगुन श्रीवास्तव, तान्या सिंह चौहान, रोहित कश्यप, कार्तिकेय यादव, आदित्य उपाध्याय, भार्गवीप्रिया टी., प्रथम प्रताप सिंह, हरिओम दवार, कौस्तव वेकारिया, मेहुल अपराजिता, नव्या चौबे, अशिमा सिंह, रिया दुबे, मंजरी सूर्यवंशी, पी. कीर्ति सृजना, पालकी प्रिया गोगोई, सोनम कुमारी, डॉ. शुभम विष्णु, रौशन कुमार, यासस्वी शांडिल्य, वैभव राय, सृष्टि पांडेय और अखिलेश राठौड़ शामिल रहे।
प्रस्तुति में लाइव संगीत ने भी विशेष प्रभाव पैदा किया। नगाड़े पर जगदीश जी, हारमोनियम पर कृपा सिंधु और ढोलक पर गुरुदयाल जी ने संगत की। पारंपरिक सांगीत शैली में लाइव वाद्य-संगत ने नाटक के दृश्यों में लय, भाव और नाटकीयता को और प्रभावशाली बनाया।
कार्यक्रम के अंत में अंग्रेजी विभाग के डॉ. राहुल चतुर्वेदी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।



