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आँसुओं, आक्रोश के बाद खुले आसमान के नीचे दालमंडी

आँसुओं, आक्रोश के बाद खुले आसमान के नीचे दालमंडी
Aug 09, 2026, 08:33 AM
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Posted By gagan arora

वाराणसी: आठ महीने पहले तक कुछ फीट चौडी दालमंडी की गली से आसमान नजर नहीं आता था। अब यह 17.5 मीटर चौड़ी हो गई है। आज भूमि पूजन के साथ इसके रोड बनने की शुरुआत भी हो गई। लेकिन यह बदलाव यूं ही नहीं हो गया। इस गली में बसे सैकड़ों लोगों के मकान दुकान टूटे, इस दर्द में उनके आंसु बहे। समय समय पर उनका आक्रोश भी झलका अरसे तक जिंदगी खाना बदोश भी रही।


कभी तंग गलियों, भीड़ और दुकानों से गुलजार रहने वाली वाराणसी की दालमंडी अब एक नए रूप में नजर आएगी. लंबे समय से चल रहे चौड़ीकरण और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बाद रविवार को यहां मॉडल सड़क के निर्माण की शुरुआत हो गई. चौक थाने के पास भूमि पूजन के साथ पीडब्ल्यूडी ने सड़क निर्माण का काम शुरू किया.

भूमि पूजन विधायक डॉ. नीलकंठ तिवारी ने किया. करीब 650 मीटर लंबी दालमंडी की सड़क को 17.5 मीटर यानी करीब 60 फीट चौड़ा किया जाएगा. पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों के मुताबिक करीब तीन महीने में सड़क का निर्माण पूरा कर इसे जनता को सौंपने का लक्ष्य रखा गया है.


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वर्षों पुरानी तस्वीर अब बदलने की तैयारी


दालमंडी सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि काशी की पुरानी पहचान का हिस्सा रही है. यहां की गलियों में वर्षों से कारोबार करने वाले दुकानदारों और रहने वाले परिवारों की यादें जुड़ी हैं. चौड़ीकरण की कार्रवाई के दौरान कई घर और दुकानें टूट गईं. कहीं लोगों ने अपनी आंखों के सामने पुश्तैनी मकानों को गिरते देखा तो कहीं दुकानों के टूटने के साथ वर्षों पुराना कारोबार भी खत्म हुआ.

प्रशासन के मुताबिक चौड़ीकरण की जद में आए 181 मकानों में से करीब 150 मकानों को गिराया जा चुका है. बाकी मकानों पर भी कार्रवाई चल रही है. इसके अलावा 6 मस्जिदों के वे हिस्से भी हटाए गए जो सड़क चौड़ीकरण की जद में आ रहे थे.

अब इन्हीं टूटे हुए हिस्सों के बीच से एक नई सड़क का निर्माण शुरू हो रहा है. यानी जिस जगह कुछ समय पहले तक मलबा और टूटे मकान दिखाई दे रहे थे वहां आने वाले दिनों में एक चौड़ी और व्यवस्थित सड़क नजर आएगी.


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109 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा


चौड़ीकरण की कार्रवाई के तहत प्रभावित मकानों और धार्मिक स्थलों के लिए मुआवजे का प्रावधान किया गया. पीडब्ल्यूडी की ओर से अब तक 109 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा दिए जाने की बात सामने आई है. परियोजना के लिए कुल 215.88 करोड़ रुपये का पुनरीक्षित बजट स्वीकृत किया गया है.

अधिकारियों ने प्रत्येक मकान की नापी निर्माण और सड़क की जद का आकलन करने के बाद मुआवजे की प्रक्रिया पूरी की. रजिस्ट्री के बाद धीरे-धीरे ध्वस्तीकरण की कार्रवाई आगे बढ़ी.


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जुलाई 2025 से शुरू हुई थी प्रक्रिया


दालमंडी चौड़ीकरण परियोजना को जुलाई 2025 में कैबिनेट की मंजूरी मिली थी. इसके बाद 23 जुलाई से मकानों की नापी शुरू हुई. नापी के बाद मकानों का मूल्यांकन और मुआवजा तय किया गया. अंतिम नापी के बाद संबंधित मकानों पर लाल निशान लगाए गए और फिर रजिस्ट्री की प्रक्रिया शुरू हुई.

स्थानीय लोगों की सुविधा के लिए चौक थाने में पीडब्ल्यूडी का कैंप कार्यालय भी बनाया गया, जहां लोगों को दस्तावेज और रजिस्ट्री से जुड़ी जानकारी दी गई.


29 अक्टूबर 2025 से शुरू हुआ था ध्वस्तीकरण


दालमंडी में ध्वस्तीकरण की पहली कार्रवाई 29 अक्टूबर 2025 को शुरू हुई थी. शुरुआत में हथौड़े से मकान और दुकानें तोड़ी गईं. बाद में जनवरी 2026 में बुलडोजर की मदद से कार्रवाई तेज की गई.

9 फरवरी को जर्जर बताए गए मकानों और दुकानों पर भी कार्रवाई हुई. उस दौरान विरोध के बीच एक व्यापारी ने खुद पर पेट्रोल डालकर आत्मदाह की चेतावनी तक दे दी थी और अपनी दुकान में आग लगा दी थी. इस घटना ने चौड़ीकरण के दौरान लोगों की भावनाओं और उनके वर्षों पुराने आशियाने-कारोबार से जुड़े दर्द को सामने ला दिया था.


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पोकलैंड आने के बाद तेज हुई कार्रवाई


8 जून 2026 को दालमंडी में पोकलैंड मशीन पहुंची. अगले दिन से मशीनों के जरिए ध्वस्तीकरण तेज कर दिया गया. जिन मकानों को हाथ से तोड़ने में मुश्किल हो रही थी, उन्हें मशीनों की मदद से जमींदोज किया गया.

इसके बाद मस्जिदों के चौड़ीकरण की जद में आ रहे हिस्सों को भी संबंधित कमेटियों की सहमति से हटाया गया. जुलाई में खुदा बक्श उर्फ लंगड़े हाफिज मस्जिद के जद में आने वाले हिस्से को भी हटाने का काम शुरू हुआ. यहां मस्जिद से जुड़ी करीब 24 दुकानें भी हटाई गईं.


अब मलबे की जगह दिखेगी नई सड़क


ध्वस्तीकरण के बाद अब दालमंडी से मलबा हटाने का काम चल रहा है. भूमि पूजन के साथ सड़क निर्माण की शुरुआत हो गई है. नई सड़क के दोनों तरफ पटरी बनाई जाएगी. सड़क के नीचे बिजली, पानी और सीवर की व्यवस्था करने की योजना है. इससे वर्षों से दिखाई देने वाला तारों का जंजाल भी हटाया जाएगा.

नई सड़क नई व्यवस्था की शुरुआत जरूर है, लेकिन इसके साथ दालमंडी के लोगों की पुरानी यादें भी जुड़ी हैं. जिन घरों में पीढ़ियां बीतीं, जिन दुकानों से परिवारों की रोजी-रोटी चली और जिन गलियों में लोगों ने अपना पूरा जीवन देखा, अब वहां एक नई तस्वीर बनने जा रही है.

प्रशासन इसे काशी की आधुनिक और व्यवस्थित सड़क के रूप में देख रहा है, जबकि स्थानीय लोगों के लिए यह बदलाव उनकी पुरानी पहचान और नई उम्मीदों के बीच का सफर है.

अब देखना होगा कि अगले तीन महीनों में दालमंडी की यह पुरानी तस्वीर किस तरह एक नई और आधुनिक सड़क में बदलती है.

अन्विति में ‘रंगों की उड़ान’ ने भरी कल्पनाओं में उड़ान, हिंदी दिवस कार्यक्रम के अतिथि होंगे संजय मिश्रा...
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वाराणसी : काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित ‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ के पांचवें दिन शनिवार को ‘रंगों की उड़ान’ चित्रकला प्रतियोगिता के साथ कार्यक्रमों की श्रृंखला आगे बढ़ी. जंतु विज्ञान विभाग के एसपीआरसी हाल में आयोजित प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने शब्दों के बजाय रंगों और रेखाओं के माध्यम से विज्ञान, तकनीक, पर्यावरण और भविष्य की अपनी कल्पनाओं को कैनवास पर उकेरा.हिंदी प्रकाशन समिति की ओर से आयोजित ‘अन्विति’ के तहत यह पांचवां और अंतिम कार्यक्रम रहा. प्रतियोगिता के दौरान विद्यार्थियों की कलाकृतियों में वर्ष 2200 का मंगल, ऑक्सीजन सिलेंडरों वाले शहर, हरित गुंबदनुमा आवास, भारतीय ध्वज फहराते अंतरिक्ष यात्री, रोबोट, उड़न तश्तरी, डीएनए की सर्पिल संरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पौधों से भरे बल्ब जैसे विषय देखने को मिले.विद्यार्थियों ने वैज्ञानिक अवधारणाओं को कला के माध्यम से सहज और रचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया. स्वीकृति कुमारी, श्रुति पाठक, अंकिता बिंद, प्राची तिवारी, सत्य राव और वैष्णवी बजाज सहित अनेक विद्यार्थियों की कृतियों में विज्ञान और कल्पना का अनूठा मेल दिखाई दिया.कुछ चित्रों में मंगल ग्रह पर कृषि और मानव बस्तियों की कल्पना की गई तो कुछ में पृथ्वी से दूर भविष्य की काल्पनिक नगरी दिखाई दी. कई चित्रों में तकनीक और प्रकृति के बीच संतुलन का संदेश दिया गया, जबकि कुछ विद्यार्थियों ने भविष्य की प्रयोगशालाओं और अंतरिक्ष अभियानों को अपनी कला का विषय बनाया.प्रतियोगिता में एक ओर धुएं से घिरे शहर और ऑक्सीजन सिलेंडर नजर आए तो दूसरी ओर हरित आवास और अंतरिक्ष में तैरते यान दिखाई दिए. प्रदूषण और पर्यावरण संकट के बीच हरित भविष्य की कल्पना का यह विरोधाभास प्रतियोगिता की प्रमुख विशेषता रहा.7 सितंबर से शुरू हुआ था ‘अन्विति’ का सफर‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ की शुरुआत 7 सितंबर को ‘काव्य सरिता’ से हुई थी। इसके बाद 8 सितंबर को ‘कथा सृजन’, 9 सितंबर को वाद-विवाद प्रतियोगिता और 10 सितंबर को ‘ज्ञान प्रभा’ प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को हिंदी में कविता, कहानी, तर्क-वितर्क और वैज्ञानिक विषयों को अभिव्यक्त करने का मंच मिला।ALSO READ : बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...15 सितंबर को संजय मिश्रा के साथ हिंदी दिवस समारोह‘अन्विति’ हिंदी सप्ताह का समापन अब 15 सितंबर को हिंदी दिवस समारोह के साथ होगा। समारोह का आयोजन महामना हॉल, सेमिनार कॉम्प्लेक्स, विज्ञान संकाय में दोपहर 2:45 बजे किया जाएगा। कार्यक्रम में प्रख्यात अभिनेता संजय मिश्रा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे।इस अवसर पर ‘अचिंत्य’ पत्रिका की नई कड़ी ‘क्षितिज से परे’ का विमोचन भी प्रस्तावित है। समारोह के साथ ही ‘अन्विति’ के तहत आयोजित विभिन्न साहित्यिक, बौद्धिक और रचनात्मक गतिविधियों का समापन होगा।
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वाराणसी : देश के कई शहरों के साथ वाराणसी की हवा की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है। ताजा रैंकिंग में वाराणसी की स्थिति पिछले साल की तुलना में नीचे खिसकी है. शहर के 11वें पायदान से 34वें स्थान पर पहुंचने को पर्यावरण विशेषज्ञ गंभीर संकेत मान रहे हैं. बढ़ती आबादी, वाहनों की संख्या, ट्रैफिक जाम, निर्माण गतिविधियां और कचरे का उचित प्रबंधन नहीं होना वायु प्रदूषण बढ़ने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं.इस संबंध में आईआईटी बीएचयू के केमिकल वैज्ञानिक प्रो. आर.एस. सिंह ने बताया कि किसी भी एयर क्वालिटी रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उसका आकलन किस अवधि और किन मानकों के आधार पर किया गया है. रैंकिंग में सार्वजनिक धारणा के साथ-साथ केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सेंसर से मिलने वाले आंकड़ों की भी भूमिका होती है. यह भी महत्वपूर्ण है कि आंकड़े वर्ष के किस मौसम के लिए लिए गए हैं.उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर सर्दियों में गंगा के किनारे बसे शहरों में प्रदूषण की स्थिति ज्यादा खराब हो जाती है. वहीं बारिश के दौरान वातावरण में मौजूद धूल और कई तरह के कण बारिश के साथ नीचे बैठ जाते हैं, जिससे हवा अपेक्षाकृत साफ रहती है. ऐसे में वाराणसी की मौजूदा रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि इसमें किन महीनों के आंकड़ों को आधार बनाया गया है.बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या बनी चुनौतीप्रो. सिंह के मुताबिक वाराणसी में पर्यटन गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं. काशी विश्वनाथ धाम और अयोध्या समेत धार्मिक पर्यटन के चलते शहर में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है. पहले से अधिक जनसंख्या घनत्व वाले शहर में लोगों और वाहनों का दबाव बढ़ने से प्रदूषण पर भी असर पड़ता है.उन्होंने कहा कि वाहनों से होने वाला उत्सर्जन वायु प्रदूषण का बड़ा कारण है. वाराणसी में लगातार बढ़ता ट्रैफिक और जाम स्थिति को और गंभीर बनाता है. जाम में वाहन लंबे समय तक धीमी गति से चलते या खड़े रहते हैं, जिससे ईंधन की खपत और प्रदूषक उत्सर्जन दोनों बढ़ते हैं. वाहनों से निकलने वाले विभिन्न प्रदूषक हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं.निर्माण कार्यों से बढ़ता पार्टिकुलेट प्रदूषणशहर में लगातार चल रहे निर्माण कार्य भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं. विशेषज्ञ के अनुसार निर्माण स्थलों पर सीमेंट, बालू और अन्य सामग्री का इस्तेमाल होता है. यदि इनका उचित तरीके से भंडारण और प्रबंधन नहीं किया जाता तो धूल के महीन कण हवा में फैल जाते है. यही पार्टिकुलेट मैटर वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण घटकों में शामिल है.प्लास्टिक प्रदूषण भी बन रहा गंभीर खतराप्रो. आर.एस. सिंह ने प्लास्टिक प्रदूषण को भी गंभीर समस्या बताया. उन्होंने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल पानी या मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव हवा पर भी पड़ रहा है. वाहनों के टायर सड़क पर घिसते हैं, जिससे प्लास्टिक आधारित सूक्ष्म कण पर्यावरण में पहुंच सकते हैं.उन्होंने शहर के कचरा डंपिंग यार्ड का उदाहरण देते हुए बताया कि लंबे समय तक खुले में पड़े प्लास्टिक के टुकड़े धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं और माइक्रोप्लास्टिक में बदल सकते हैं. ये सूक्ष्म कण पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं और इनके प्रभाव को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है.घरों में इस्तेमाल होने वाली चीजें भी प्रदूषण का कारणप्रो. सिंह के अनुसार घरों में इस्तेमाल होने वाले कई उत्पाद भी ऐसे रसायन छोड़ सकते हैं जो प्रदूषण में योगदान करते हैं. पेंट और उसमें इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट से निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) इसका उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि आम लोगों को प्रदूषण के कई ऐसे स्रोतों की जानकारी नहीं होती, जिनका सामना वे रोजाना करते हैं.उन्होंने जल प्रदूषण के संदर्भ में दवाओं के अवशेषों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक कई दवाएं शरीर में पूरी तरह मेटाबोलाइज नहीं होतीं और सीवेज के माध्यम से जल स्रोतों तक पहुंच सकती हैं। यानी प्रदूषण केवल हवा की समस्या नहीं है, बल्कि हवा, पानी और मिट्टी—तीनों स्तरों पर इसके प्रभाव को समझने की जरूरत है.15-25 साल बाद स्थिति और भयावह होने की आशंकाप्रो. सिंह ने चेतावनी दी कि यदि प्रदूषण को लेकर समाज में जागरूकता नहीं बढ़ाई गई और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले 15 से 25 वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है. उन्होंने कहा कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है.ALSO READ : बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगानपहली कक्षा से बच्चों को दी जाए प्रदूषण की जानकारीप्रदूषण की रोकथाम के उपायों पर उन्होंने सबसे पहले जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया. उनका कहना है कि बच्चों को कम उम्र से ही प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में बताया जाना चाहिए. कक्षा एक से ही पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े विषयों को व्यवहारिक तरीके से समझाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी प्रदूषण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर अपनी भी जिम्मेदारी समझे.विशेषज्ञ का संदेश साफ है—शहर की हवा केवल मौसम से नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली, ट्रैफिक, निर्माण, कचरा प्रबंधन और जागरूकता से भी तय होती है. ऐसे में वाराणसी की गिरती रैंकिंग को महज आंकड़ा मानने के बजाय प्रदूषण के स्रोतों पर तत्काल काम करने की जरूरत है.
बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगान
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वाराणसी : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में चल रहे हिंदी माह-2026 के तहत शनिवार को विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षण कार्मिकों के लिए स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। समिति कक्ष में आयोजित प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने अपनी मौलिक कविताओं के माध्यम से हिंदी, भारतवर्ष, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, काशी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विशेषताओं का भावपूर्ण वर्णन किया।प्रतियोगिता में कुल 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ करते हुए हिंदी भाषा के प्रति समर्पण और गौरव की भावना व्यक्त की। कविताओं में भारत की विविधता, काशी की सांस्कृतिक विरासत और महामना के योगदान को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। प्रतिभागियों ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को महामना के अभूतपूर्व प्रयासों का परिणाम बताते हुए इसे ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखने वाला संस्थान बताया।प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में प्रो. वशिष्ठ अनूप, डॉ. संजीव सराफ और प्रो. उर्वशी गहलौत शामिल रहे। निर्णायक मंडल ने प्रतिभागियों की कविताओं, प्रस्तुति और विषयवस्तु के आधार पर मूल्यांकन किया।कार्यक्रम के दौरान हिंदी अधिकारी डॉ. शिव कुमार त्रिपाठी ने निर्णायक मंडल के सदस्यों को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश सिंह ने किया, जबकि अंशुमान पटेल ने धन्यवाद ज्ञापित किया।ALSO READ : सुब्रतो कप में यूपी का दम दिखाएगी वाराणसी की टीमकार्यक्रम को सफल बनाने में सहायक कुलसचिव विकास कुमार, रामजी त्रिपाठी, कीर्ति शंकर दुबे, रागिब हुसैन और रोहित आनंद का सहयोग रहा।