शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति की अपूर्णताओं को दूर कर उसे प्रज्ञावान और लोकमंगल के लिए सक्षम बनाना : प्रो. हरिकेश सिंह

वाराणसी : शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना और ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि व्यक्ति की अपूर्णताओं को पहचानकर उन्हें दूर करना और उसे समाज के कल्याण के लिए सक्षम बनाना है। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह व्यक्ति के जीवन में सुधार और समाज के दुःख-कष्ट दूर करने का माध्यम बने। यह विचार जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा के पूर्व कुलपति प्रो. हरिकेश सिंह ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र एवं इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 15 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला ‘भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ’ के समापन सत्र में व्यक्त किए।
31 अगस्त को आयोजित समापन सत्र में कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्ड्याल मुख्य अतिथि रहीं। कार्यशाला का आयोजन 10 से 31 अगस्त तक किया गया। इसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान-परम्परा, दर्शन, साहित्य, कला, लोकपरम्परा, संस्कृति तथा विभिन्न संस्थाओं और व्यक्तित्वों के माध्यम से भारत को समझने की समग्र दृष्टि विकसित करना था।
प्रो. हरिकेश सिंह ने कहा कि शिक्षा मनुष्य को केवल रोजगार या व्यक्तिगत उन्नति के लिए तैयार करने की प्रक्रिया नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के भीतर की अपूर्णताओं को पहचानना और उन्हें दूर करने की क्षमता विकसित करना है। यदि ज्ञान के बावजूद संवेदना, विवेक और लोकमंगल की चेतना विकसित नहीं होती तो शिक्षा अधूरी है।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा में ज्ञान और प्रज्ञा का संबंध महत्वपूर्ण है। ज्ञान को जीवन में उतारने की क्षमता ही प्रज्ञा है। इसलिए भारत अध्ययन से प्राप्त ज्ञान को केवल पाठ्यक्रम या बौद्धिक जानकारी तक सीमित न रखकर जीवन के अनुभवों और सामाजिक समस्याओं से जोड़ना चाहिए।
काशी और बीएचयू की ज्ञान परंपरा का किया उल्लेख
प्रो. सिंह ने काशी की प्राचीन ज्ञान परम्परा और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की ऐतिहासिक दृष्टि का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि काशी सदियों से ज्ञान, साधना और विद्या की भूमि रही है। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने इसी व्यापक भारतीय ज्ञान-दृष्टि को आधुनिक विश्वविद्यालयीय स्वरूप देने का प्रयास किया। बीएचयू में भारतीयता, आधुनिक शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना के समन्वय की दृष्टि दिखाई देती है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान-परम्परा की व्यापकता और उदारता को रेखांकित करते हुए कहा कि ज्ञान को किसी एक मत, सम्प्रदाय या सीमित क्षेत्र तक नहीं बांधा जा सकता। जहां से व्यक्ति और समाज के सुधार के लिए श्रेष्ठ ज्ञान मिले, वहां से सीखने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। उन्होंने वेदों को विश्व की प्राचीन ज्ञान-विरासत के महत्वपूर्ण स्रोतों में शामिल बताते हुए गुरु-शिष्य, मौखिक और शास्त्रीय परम्पराओं के जरिए ज्ञान के संरक्षण और हस्तांतरण की परंपरा पर भी प्रकाश डाला।
भारत अध्ययन सामूहिक ज्ञान-यात्रा : प्रो. सुषमा
मुख्य अतिथि प्रो. सुषमा घिल्ड्याल ने भारत अध्ययन की व्यापकता और सामूहिकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत अध्ययन किसी एक व्यक्ति या संस्था का कार्य नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने वाली ज्ञान-यात्रा है। भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परम्परा को उसके मूल स्रोतों, परम्पराओं और व्यापक सांस्कृतिक संदर्भों में समझने की आवश्यकता है।
भारत अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो. शरदिन्दु कुमार तिवारी ने कार्यशाला के आयोजन और उपलब्धियों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि केन्द्र भारतीय प्राचीन विद्याओं, ज्ञान-परम्पराओं और सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन एवं शोध को आगे बढ़ाने के लिए लगातार कार्य कर रहा है।
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वहीं, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के निदेशक डॉ. अभिजित दीक्षित ने आयोजन में सहयोग के लिए प्रतिभागियों और वक्ताओं के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए लोक और शास्त्र, परम्परा और आधुनिकता तथा व्यक्ति और संस्थाओं के बीच संवाद को समझना आवश्यक है।
15 दिवसीय कार्यशाला में विभिन्न विषयों के विद्वानों ने भारतीय ज्ञान-परम्परा, साहित्य, दर्शन, संस्कृति, कला, लोकपरम्परा, व्यक्तित्वों और संस्थाओं के विविध पक्षों पर विमर्श किया। समापन पर इस बात पर जोर दिया गया कि भारतीय ज्ञान-परम्परा को केवल अतीत के अध्ययन तक सीमित न रखते हुए वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं से जोड़ा जाए। ज्ञान से प्रज्ञा, प्रज्ञा से आत्म-सुधार और आत्म-सुधार से लोकमंगल को शिक्षा और भारत अध्ययन की सार्थक दिशा बताया गया।



