45 दिनों के प्रशिक्षण और अनुसाशन से जन्म लेते हैं, रामनगर की रामलीला के पात्र

वाराणसी: विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, गुरु-शिष्य परंपरा और लोकनाट्य की ऐसी जीवंत विरासत है, जिसकी मिसाल दुनियाभर में दी जाती है। लगभग दो सौ वर्षों से अधिक पुरानी इस रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां अभिनय को केवल कला नहीं, बल्कि साधना माना जाता है। राम, सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे प्रमुख पात्रों का चयन होने के बाद उनका 45 दिनों तक कठोर अनुशासन और आध्यात्मिक वातावरण में प्रशिक्षण कराया जाता है। गंगा जी के किनारे रामनगर किले के पास बलुआ घाट पर स्थित धर्मशाला के अंदर शिवदत्त शर्मा के नेतृत्व मे पात्रों को 45 दिन तक प्रशिक्षण दिया जाता है।

पोथी पूजन से होती है प्रशिक्षण की शुभारंभ
रामनगर रामलीला की प्रशिक्षण की शुभारंभ सावन माह के चतुर्थी के दिन शुरुआत धार्मिक अनुष्ठान से होती है। सबसे पहले रामचरितमानस और अन्य पूजनीय ग्रंथों का विधिवत पोथी पूजन किया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार और पूजा-अर्चना के बीच गुरुजन एवं काशी राज परिवार की उपस्थिति में यह अनुष्ठान संपन्न होता है। मान्यता है कि बिना पोथी पूजन के प्रशिक्षण प्रारंभ नहीं किया जाता। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि ज्ञान, मर्यादा और भक्ति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। इसी समय से चयनित पात्रों को एक नई साधना में प्रवेश कराया जाता है।
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उपकरण पूजन: औजार भी हैं पूजनीय
रामनगर रामलीला की एक अनूठी परंपरा उपकरण पूजन भी है। मंच निर्माण और सजावट में उपयोग होने वाले औजार—बसूली, हथौड़ी, आरी, ब्रश, रंग, रस्सियां, लकड़ी, मुकुट, धनुष-बाण, सिंहासन और अन्य सामग्री—सभी की विधिवत पूजा की जाती है। कलाकारों से लेकर कारीगरों तक सभी इस परंपरा में भाग लेते हैं।
45 दिनों की साधना, अनुशासन और तपस्या
पात्रों के चयन के बाद प्रशिक्षण का सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू होता है। 45 दिनों तक चयनित पात्र गंगा तट स्थित बलुआ घाट धर्मशाला में रहकर नियमित अभ्यास करते हैं। इस दौरान उनका दैनिक जीवन पूरी तरह अनुशासित होता है। दिन की शुरुआत पूजा-पाठ से होती है और फिर संवाद, उच्चारण, अभिनय तथा मंच संचालन का अभ्यास कराया जाता है। यही कारण है कि रामनगर की रामलीला के पात्र मंच पर अभिनय नहीं करते, बल्कि पात्रों के चरित्र को आत्मसात कर लेते हैं।
संवाद और संस्कार सिखाता है प्रशिक्षण
रामनगर की रामलीला का प्रशिक्षण केवल संवाद याद कराने का अभ्यास नहीं है। यहां कलाकारों को रामचरितमानस की चौपाइयों, दोहों और संस्कृत श्लोकों का शुद्ध एवं स्पष्ट उच्चारण सिखाया जाता है। गुरुजन बार-बार अभ्यास कराते हैं ताकि प्रत्येक शब्द का उच्चारण मर्यादित और प्रभावशाली हो।
इसके साथ ही कलाकारों को संवाद बोलने की गति, स्वर की कोमलता, ठहराव, लय, आरोह-अवरोह और भावनाओ का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। किस प्रसंग में आवाज ऊंची होगी, कहां धीमी होगी, किस चौपाई के साथ कौन-सा भाव प्रदर्शित करना है। इन सभी पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

गुरु-शिष्य परंपरा
रामनगर की रामलीला का प्रशिक्षण पूरी तरह गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है। अनुभवी व्यास और प्रशिक्षक वर्षों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। वे केवल अभिनय नहीं सिखाते, बल्कि रामायण के आदर्शों और जीवन मूल्यों को भी पात्रों के मन में स्थापित करते हैं।
इन्ही परंपराओ के कारण रामनगर की रामलीला केवल नाट्य प्रस्तुति नहीं बल्कि अपनी प्रस्तुति से पूरे वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाया है।



