बीएचयू कर्मचारियों के नियमितीकरण का मामला पहुंचा हाईकोर्ट, केंद्र सरकार और यूजीसी से मांगा जवाब...

वाराणसी: काशी हिंदू विश्वविद्यालय में वर्षों से कार्यरत संविदा और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण का मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया है. हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार, यूजीसी और बीएचयू प्रशासन से जवाब तलब किया है. अदालत के इस आदेश के बाद विश्वविद्यालय में लंबे समय से कार्यरत हजारों कर्मचारियों में नई उम्मीद जगी है.
दरअसल, बीते दिनों बीएचयू में नियमितीकरण की मांग को लेकर कर्मचारियों का आंदोलन तेज हो गया था. विभिन्न विभागों के कर्मचारी मधुबन पार्क में बड़ी संख्या में जुटे और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हुए स्थायी नियुक्ति की मांग उठाई. कर्मचारियों का कहना था कि वे वर्षों से विश्वविद्यालय की सेवा कर रहे हैं, लेकिन आज तक उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिल सका. बाद में विश्वविद्यालय प्रशासन और जिला प्रशासन के आश्वासन पर आंदोलन को फिलहाल स्थगित कर दिया गया था.
इसी बीच टेलीफोन लाइनमैन के रूप में कार्यरत राम सिंह उर्फ शमशेर सिंह समेत अन्य कर्मचारियों द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया. याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि वे वर्ष 1998 से लगातार बीएचयू में कार्यरत हैं और उनका सेवा रिकॉर्ड पूरी तरह साफ-सुथरा रहा है.
अदालत में यह भी बताया गया कि वर्ष 2004 में बीएचयू की टेलीकम्युनिकेशन सर्विसेज कमेटी ने इन कर्मचारियों के नियमितीकरण का प्रस्ताव पारित किया था. उस समय के कुलपति ने प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए वर्ष 2005 में इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी थी, लेकिन आज तक इस फैसले को लागू नहीं किया गया.
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कर्मचारियों का आरोप है कि उनसे लगातार स्थायी प्रकृति का कार्य लिया जा रहा है, बावजूद इसके उन्हें संविदा और दैनिक वेतनभोगी के रूप में रखा गया है. याची पक्ष ने अदालत में इसे श्रम शोषण बताते हुए कहा कि स्वीकृत पदों पर वर्षों तक अस्थायी रूप से काम कराना संविधान की भावना के विपरीत है.
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि बीएचयू रजिस्ट्रार ने 18 सितंबर 2025 को नियमितीकरण की मांग खारिज कर दी थी, जबकि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा पर जोर दिया गया है.
हाईकोर्ट द्वारा केंद्र सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और बीएचयू प्रशासन से जवाब मांगे जाने के बाद अब इस मामले पर सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिक गई हैं. कर्मचारियों का मानना है कि यदि अदालत से राहत मिलती है तो विश्वविद्यालय में वर्षों से लंबित नियमितीकरण की प्रक्रिया को बड़ा रास्ता मिल सकता है.



