आस्था के नाम पर वरुणा नदी में प्रदूषण, गंदगी का अंबार बयां कर रही ये कहानी

वाराणसी: आस्था के नाम पर वरुणा नदी को प्रदूषित किया जा रहा है. नवरात्र के समापन के बाद गंदगी का अंबार कुछ यही कहानी बयां कर रहा है. श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक मानी जाने वाली इस पौराणिक नदी में बढ़ता प्रदूषण चिंता का विषय बना हुआ है. नवरात्र के नौ दिनों में गौरी की पूजा के दौरान श्रद्धालु पूजा सामग्री को नदी में प्रवाहित कर रहे हैं, जिससे वरुणा का जल और अधिक प्रदूषित हो रहा है. हालांकि वरुणा में गिरने वाले नालों की संख्या कम नहीं है जिसपर आस्था की यह चोट नदी का दम घोंट रही है.

वरुणा नदी बनी करुणा की पात्र
कचहरी के पास शास्त्री घाट पर यदि नजर डालें, तो वहां माला, फूल, नारियल, चुनरी, हवन की राख, बिंदी और सिंदूर जैसे पूजा सामग्री के अवशेष बिखरे हुए हैं. यह सब जलीय जीवों के लिए भी खतरा उत्पन्न कर रहे हैं. श्रद्धा और भक्ति से भरे प्रसाद को मिट्टी में दफन करने के बजाय, श्रद्धालु उसे वरुणा में डालकर न केवल नदी को प्रदूषित कर रहे हैं, बल्कि नवरात्र के व्रत का अपमान भी कर रहे हैं. कभी त्रेतायुग में भगवान राम के कथाओं की साक्षी रही वरुणा अब करुणा की पात्र हो चुकी है.

संकट में वरुणा नदी
इस प्रकार की गतिविधियों से श्रद्धा का भाव प्रदूषण के साथ मिलकर एक नई समस्या उत्पन्न कर रहा है. नवरात्र के दौरान लोग अपनी आस्था को प्रदूषण में बदल रहे हैं, जो कि एक सोचनीय स्थिति है. वरुणा नदी, जो कि एक जीवंत पौराणिक नदी मानी जाती है, अब अपनी करुण पुकार कर रही है. पॉलीथीन नहीं बल्कि मटकों की भीड़ से पाट भी पट रहा है. ऐसे में वरुणा की गहराई और चौड़ाई पर भी दिनों दिन प्रभाव पड़ता जा रहा है.

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इस प्रदूषण के कारण नदी का पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रभावित हो रहा है. जल में घुली हुई पूजा सामग्री और अन्य कचरे से न केवल जल की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है, बल्कि यह जलीय जीवों के जीवन के लिए भी खतरा बन रहा है. ऐसे में यह आवश्यक है कि श्रद्धालु अपनी आस्था को प्रदूषण से दूर रखें और पूजा सामग्री को उचित तरीके से निपटाने का प्रयास करें. लंबे समय से नालों को टैप करने का प्रयास भी नहीं हो रहा है तो नदी का यह रुख चुनौती देता ही नजर आएगा. हालांकि प्रशासन की ओर नदी में गंदगी की सफाई के लिए उपकरण लगाया गया है लेकिन वह भी नाकाफी सिद्ध हो रहा है.



