IIT-BHU में जल गुणवत्ता और नदी प्रदूषण प्रबंधन पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम कल से

वाराणसी : भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (बीएचयू), वाराणसी में जल गुणवत्ता की निगरानी, उभरते प्रदूषकों के आकलन तथा नदी प्रदूषण प्रबंधन को लेकर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है.19 से 21 अगस्त 2026 तक चलने वाले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में जल एवं अपशिष्ट जल की गुणवत्ता, माइक्रो एवं नैनो प्लास्टिक, नदी पारिस्थितिकी, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और आधुनिक तकनीकों के उपयोग जैसे विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा जानकारी दी जा रही है.
कार्यक्रम के पहले दिन 19 अगस्त को पंजीकरण और उद्घाटन सत्र के बाद जल एवं अपशिष्ट जल की गुणवत्ता की निगरानी के सिद्धांतों पर चर्चा होगी. इसमें सैंपलिंग एवं टेस्टिंग, डेटा की गुणवत्ता, प्रिसीजन, एक्यूरेसी और मानकों जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को समझाया जाएगा. इस सत्र में प्रो. एस.एन. उपाध्याय, पूर्व निदेशक, IIT-BHU विशेषज्ञ वक्ता होंगे. इसके बाद स्थानीय नदी तंत्र में प्रदूषकों की जटिल अंतःक्रियाओं पर प्रो. जितेंद्र पांडेय, वरिष्ठ प्रोफेसर, वनस्पति विज्ञान, इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, BHU व्याख्यान देंगे.
पहले दिन के अगले सत्र में गंगा जैसी नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र में बैक्टीरियोफेज की भूमिका पर प्रो. गोपाल नाथ, सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रोफेसर, माइक्रोबायोलॉजी, IMS-BHU जानकारी देंगे। दिन के अंतिम सत्र में प्रतिभागियों को सैंपलिंग, कैलिब्रेशन और संरक्षण की व्यावहारिक जानकारी दी जाएगी. इसके साथ ही प्रयोगशाला में एक्सपोजर और QA/QC की प्रक्रिया समझाई जाएगी. यह व्यावहारिक सत्र वाराणसी के तुलसी घाट स्थित संकट मोचन फाउंडेशन में प्रस्तावित है.
20 अगस्त को प्रशिक्षण के दूसरे दिन उभरते प्रदूषकों पर विशेष चर्चा होगी. इसमें जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में माइक्रो और नैनो प्लास्टिक तथा उभरते प्रदूषकों के विश्लेषण के लिए अपनाई जाने वाली आधुनिक विधियों पर विशेषज्ञ जानकारी देंगे. इसके बाद गंगा बेसिन में उभरते प्रदूषकों और उनके समाधान की दिशा पर चर्चा होगी.
दूसरे दिन के एक प्रमुख सत्र में माइक्रोप्लास्टिक, एंडोक्राइन डिसरप्टर्स, प्रदूषकों और मृदा स्वास्थ्य के बीच संबंध तथा पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता पर चर्चा होगी. इसके अलावा सिंचाई के लिए अपशिष्ट जल एवं रनऑफ के पुनः उपयोग तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में फार्मास्यूटिकल्स एवं पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स (PPCPs), एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स (EDCs) जैसे प्रदूषकों पर भी विशेषज्ञ विचार रखेंगे. पारंपरिक एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ETP) से ऐसे प्रदूषकों के उपचार की सीमाओं पर भी चर्चा होगी.
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21 अगस्त को तीसरे दिन प्रशिक्षण का फोकस नदी प्रबंधन में तकनीक और समेकित दृष्टिकोण पर रहेगा। कार्यक्रम में इंटीग्रेटेड रिवर बेसिन मैनेजमेंट, IoT सेंसर और तकनीकी एकीकरण, नदी बेसिन प्रबंधन के लिए सैटेलाइट एवं GIS मैपिंग तथा बाढ़ मैदान और पारिस्थितिक पुनर्स्थापना जैसे विषय शामिल हैं.
तीसरे दिन जल गुणवत्ता के आकलन में आइसोटोपिक ट्रेसर्स, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और सतत जल प्रबंधन पर भी विशेषज्ञ व्याख्यान होगा. इसके बाद वैलेडिक्टरी समारोह एवं प्रमाणपत्र वितरण के साथ तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन होगा.
कार्यक्रम का उद्देश्य जल गुणवत्ता की वैज्ञानिक निगरानी से जुड़े शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और संबंधित क्षेत्र के प्रतिभागियों को आधुनिक तकनीकों एवं व्यावहारिक प्रक्रियाओं से परिचित कराना है। IIT-BHU में जल गुणवत्ता, नदी स्वास्थ्य और उभरते प्रदूषकों पर शोध की दीर्घ परंपरा रही है तथा संस्थान के विशेषज्ञ नदी स्वास्थ्य आकलन, उभरते प्रदूषकों और जल गुणवत्ता प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं.



