आईआईटी-बीएचयू में उभरते जल प्रदूषकों पर प्रशिक्षण, माइक्रोप्लास्टिक के खतरों पर विशेषज्ञों ने किया मंथन

वाराणसी: आईआईटी-बीएचयू और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के सहयोग से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में गुरुवार को Emerging Contaminants यानी उभरते प्रदूषकों पर विशेषज्ञों ने विस्तार से चर्चा की, कार्यक्रम में सीपीसीबी मुख्यालय दिल्ली के साथ आरडी चंडीगढ़, लखनऊ और कोलकाता से प्रोजेक्ट साइंटिस्ट एवं वैज्ञानिक स्तर के अधिकारी शामिल हुए.प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य जल में तेजी से बढ़ रहे नए प्रकार के प्रदूषकों, उनके प्रभाव और उपचार की मौजूदा चुनौतियों को समझना रहा.
विशेषज्ञों ने बताया कि वर्तमान समय में पानी में ऐसे कई नए प्रदूषक पाए जा रहे हैं, जिनके बारे में वैज्ञानिक जानकारी अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है। इन प्रदूषकों के कारण सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और अन्य जल उपचार संयंत्रों के सामने नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं, सवाल यह भी है कि उपचार के बाद ये प्रदूषक पूरी तरह खत्म हो रहे हैं या जल और मिट्टी के माध्यम से खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर मानव एवं अन्य जीव-जंतुओं को प्रभावित कर रहे हैं.
प्रशिक्षण के दौरान माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि माइक्रोप्लास्टिक का प्रभाव केवल पानी तक सीमित नहीं है। मिट्टी से पानी, पानी से पौधों और फिर पौधों के माध्यम से पशुओं एवं अन्य जीवों तक इसके पहुंचने की पूरी संभावना है, इस तरह यह पर्यावरण और खाद्य श्रृंखला में लंबे समय तक बने रहने वाला प्रदूषण बन सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक के संभावित प्रभावों में न्यूरोलॉजिकल और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल प्रभावों के साथ-साथ अन्य गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर भी अध्ययन जारी हैं. इसके संभावित कार्सिनोजेनिक प्रभावों को लेकर भी वैज्ञानिक स्तर पर शोध किया जा रहा है, ऐसे में आम लोगों के बीच इसके प्रति जागरूकता बढ़ाना जरूरी है.
प्रशिक्षण में यह भी बताया गया कि माइक्रोप्लास्टिक के लिए अभी भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में मानकीकृत परीक्षण प्रक्रिया और स्पष्ट क्रिटिकल लिमिट तय करने की चुनौती बनी हुई है, भारत में बीआईएस और सीपीसीबी सहित विभिन्न संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं, यूरोपीय संघ और अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसियां भी माइक्रोप्लास्टिक की पहचान, मात्रा निर्धारित करने और उसके सुरक्षित स्तर तय करने के लिए अध्ययन कर रही हैं.
कार्यक्रम के आगामी सत्रों में दूषित जल को उपचारित कर दोबारा कृषि सिंचाई में उपयोग करने, एंटीबायोटिक्स और बायोटेक्नोलॉजिकल उत्पादों के जल पर पड़ने वाले प्रभाव तथा जल में बैक्टीरियल एवं फीकल कंटामिनेशन की जांच के लिए एमपीएन (Most Probable Number) जैसी विधियों पर प्रशिक्षण दिया जाएगा, वैज्ञानिकों और प्रतिभागियों को प्रयोगशाला में इन तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है.
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विशेषज्ञों ने कहा कि प्रदूषण से निपटना केवल सरकार या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है, इसके लिए सामूहिक भागीदारी जरूरी है. जिस तरह सिंगल यूज प्लास्टिक को लेकर जागरूकता और सरकारी हस्तक्षेप बढ़ाया गया है, उसी तरह माइक्रोप्लास्टिक और अन्य उभरते प्रदूषकों को लेकर भी आम लोगों को जागरूक करना आवश्यक है. विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम हुआ है, लेकिन बदलते प्रदूषकों और उनके प्रभाव को देखते हुए अभी और व्यापक शोध एवं जागरूकता की जरूरत है.



