हिमाद्रि संकल्प के साथ द्विजों ने किया श्रावणी उपाकर्म, पूर्णिमा में पतितपावनी के तट पर भूदेवों ने किया 'श्रावणी'....

वाराणसी : सनातन धर्म में दशहरा क्षत्रियों का प्रमुख पर्व है. दीपावली वैश्यों व होली अन्य जनों के लिए विशिष्ट महत्व का पर्व है. रक्षाबंधन अर्थात् श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाने वाला "श्रावणी उपाकर्म" ब्राह्मणों व द्विजों का सबसे बड़ा पर्व है.
वैदिक काल से द्विज समाज के लोग पवित्र नदियों व तीर्थ के तट पर आत्मशुद्धि का यह उत्सव मनाते आ रहे हैं. इस कर्म में आंतरिक व बाह्य शुद्धि गोबर, मिट्टी, भस्म, अपामार्ग, दूर्वा, कुशा एवं मंत्रों द्वारा की जाती है.
पंचगव्य महाऔषधि है. श्रावणी में दूध, दही, घृत, गोबर, गोमूत्र प्राशन कर शरीर के अंतःकरण को शुद्ध किया जाता है. प्रतिवर्षानुसार इस बार भी प्राचीन वैदिक परम्परा को जीवंत रखते हुए ब्राह्मणों ने श्रावणी उपाकर्म किया. शुक्रवार को प्रात: अहिल्याबाई घाट समेत अन्य घाटों पर विप्र समाज उत्तर प्रदेश एवं अति प्राचीन संस्था शास्त्रार्थ महाविद्यालय,दशाश्वमेध के संयुक्त तत्वावधान में शुक्लयजुर्वेदीय माध्यांदिनी शाखा के ब्राह्मणों द्वारा श्रावणी मनायी गयी. वहीं शिवाला घाट पर आचार्य पंडित दयाराम पाठक द्वारा श्रावणी उपाकर्म कराया गया. श्री रामदासकाठिया बाबा वेद विद्यालय,शिवाला के द्वारा श्रावणी मनायी गयी.
वैदिक पं.विकास दीक्षित के आचार्यत्व में सर्वप्रथम हेमाद्रि संकल्प लिया गया जो सनातन हिंदू परंपरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक वैदिक प्रायश्चित विधान है. यह मुख्य रूप से श्रावणी उपाकर्म (रक्षाबंधन/श्रावण पूर्णिमा) और ऋषि पंचमी के पावन अवसर पर ब्राह्मणों और सनातनी धर्मावलंबियों द्वारा सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से लिया जाता है. इस संकल्प के मुख्य रूप में धार्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व का पाठ करते हुए वैदिक रीति से सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक के कालखंड का पूरा भूगोल और पंचांग बोला गया. इसमें अनंत कोटि ब्रह्मांड, सात लोक (भूर्लोक, भुवर्लोक आदि) और जम्बूद्वीप का वर्णन होता है.
भारतवर्ष की पवित्र नदियों (गंगा, यमुना, गोदावरी आदि) और पर्वतों का स्मरण किया गया. वर्तमान समय के मन्वन्तर (वैवस्वत मन्वन्तर), युग (कलियुग का प्रथम चरण), वर्तमान संवत्सर, अयन, ऋतु, मास, तिथि, नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति का पूरा विवरण पढ़ा गया. द्विज ब्राह्मणों ने इस संकल्प को लेकर व्यक्ति वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए अपने सभी कायिक, वाचिक और मानसिक पापों के निवारण की प्रार्थना की. इसके पश्चात दशविध स्नान जिसमें शरीर और आत्मा की शुद्धि के लिए 10 पवित्र पदार्थों का उपयोग हुआ.
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भस्म, मृत्तिका (मिट्टी), गोमय (गाय का गोबर), पंचगव्य, गोरज, धान्य, फल, सर्वौषधि, कुशोदक (कुश का जल) और सुवर्ण (सोना)। पश्चात इसके पंचगव्य का पान किया गया जिसमें गाय के गोमय (गोबर), गोघृत, गोदुग्ध, गोदधि तथा गोमूत्र मिश्रित पंचगव्य से स्नान तथा उसका पान किया गया तदुपरांत भस्मलेपन किया गया.
श्रावणी में अपामार्ग के पत्तों एवं कुशा एवं दूर्वा का भी नियमानुसार प्रयोग हुआ. संयोजक शास्त्रार्थ महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य तथा संस्कृत महाविद्यालय प्राध्यापक समिति उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डॉ.गणेश दत्त शास्त्री ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म का आयोजन प्राचीन काल से ही नदियों,तालाबों के किनारे विधिपूर्वक ऋषियों-मुनियों द्वारा किया जाता रहा है.

इस अवसर पर प्रमुख रूप से राष्ट्रपति पुरस्कृत डा. गणेश दत्त शास्त्री, ज्योतिषाचार्य डा. आमोद दत्त शास्त्री, डा. पवन शुक्ला, डा.अशोक पाण्डेय, पं. विशाल औढेंकर, पं. गुल्लू महाराज, पं.दिनेश शंकर दुबे, अविनाश पाण्डेय, राजेश त्रिपाठी, मुकुंद मुरारी पाण्डेय, चन्द्रमणि प्रसाद शुक्ल, संतोष झा सहित सैकड़ों विद्वान् व बटुक शामिल रहे.



