आदि समाजवादी है अडभंगी शिव और काशी है उनका प्रतिरूप

आज महाशिवरात्रि है.सनातन परंपरा में इस रात्रि को लेकर कई मान्यतायें है जिसमे एक ये भी है कि आज के दिन ही माता पार्वती और अड़भंगी शिव का विवाह हुआ था.
शिव रूप पुरुष (चेतन) और पार्वती रूप प्रकृति (ऊर्जा ) का सुखद संयोग ही सृष्टि के सृजन का कारक है. आज का दिन सिर्फ शिव पार्वती के विवाह का सामान्य सालगिरह नहीं अपितु यह चेतन और उर्जा के मिलन का प्रतीक भी है जिससे जीवन एक संतुलन के साथ गतिमान होता है और सृष्टी का संचालन और नियमन भी. शिव का पूरा शिवत्व सामाजिक ताने बाने के एक देवत्व स्वरूप के रूप में हमारे सामने आता है. एक ऐसे देवता जिससे सामान्य भी खुद को उतना ही जुड़ा हुआ पाता है जितना की अभिजात्य. दूसरे किसी देव या भगवान की तरह स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित नहीं बल्कि प्रकृति से सीधा जुड़ाव. श्रृंगार किया तो गले में सर्प डाल लिया और शीश पर चंद्र को विराजमान करा दिया.
सिर्फ बारात नही, सामाजिक व्यवस्था

माता पार्वती से विवाह करने गये बारात में भी समाज. शायद ही कोई ऐसा हो जो की छूटा हो. जहा हर कोई बाराती, देवता, मानव, राक्षस, साधु संत, गंधर्व किन्नर सब समाज के अंतिम व्यक्ति से लेकर राजा तक. खास ये है कि हर किसी को उसका अपना विशिष्ट स्थान, समाजवाद के सिद्धांत का मूलस्वरूप भी तो कुछ ऐसा ही है. हर एक को उसकी क्षमता के अनुसार, हर एक को उसके कार्य के अनुसार. बाबा की बारात इस बात को बखूबी प्रदर्शित करती है की निमंत्रण सभी को है. छोटे बड़े को कोई भेद नहीं. हर किसी का समाज में अपना महत्व है और उसका अपनी क्षमता है.
अव्यवस्था में सामाजिक व्यवस्था

शिव व्यवस्थित नहीं हैं पर वह स्वयं में व्यवस्था है और सम्पूर्ण चराचर के व्यवस्था के कारक हैं. अव्यवस्थित होते हुए भी जो व्यवस्थित है वही शिव है. शिव की सारी व्यवस्था ही ऐसी है. न तो पहनने ओढ़ने में कोई व्यवस्था न तो खाने पीने में. कपड़े के नाम पर मृगछाल, गले मे भुजंग और ललाट पर चंद्रमा और केश में गंगधार. क्या देवता भी कोई ऐसा होता है? खाने की बात करें तो क्या पसंद है भांग, धतूरा, मदार. जो सामान्य जन के लिए अग्राह्य है वह इनके लिए ग्राह्य है. और तो और रहने को इन्हें कोई और जगह नही मिली तो कैलाश पर जा बैठे. चारो तरफ बर्फ ही बर्फ. जहां कोई घंटा भर जिंदा न रहे वहां शिव अनादि से व्यवस्थित हैं. सहचर भी कौन ? बैल नंदी. यानी की हर जगह व्यवस्था के विरुद्ध पर व्यवस्था में हर जगह समाज.
काशी को भी अपने जैसा बनाया
काशी को शिव ने अपना प्रिय बनाया तो इसे भी अपने जैसा भी बनाया. यहां के लोगों को भी. खुद अड़भंगी और उनके चेले भी. गरीब भी उतना ही मस्त और व्यस्त जितना की अमीर. चांडल भी इतना ज्ञानी कि शंकर को शंकराचार्य बना दे. डोम को भी राजा की संज्ञा. ये किसी समाजवादी व्यवस्था से कम है क्या. किसी ने पूछा कि काशी ऐसी क्यों है तो उत्तर मिला कि जिसके आराध्य ही ऐसे हों तो उनके अनुयायी वैसे हो तो इसमें गलत क्या है? काशी में शिव की व्यवस्था अव्यवस्थाओं के व्यवस्थित होने की सर्वमान्य व्यवस्था है. शिव योगी है लेकिन माता पर्वती के साथ उनका गृहस्थ और व्यवस्थित स्वरूप सामने आता है.
शिव को साधु, संत, असुर, नाग ,गंधर्व देवता, मानव, जलचर, नभचर और थलचर सभी ने माना है. और जब शिव मान्य है तो काशी भी मान्य हैं और यहां की अव्यवस्थित व्यवस्था भी. यही काशी है वाराणसी है और बनारस भी.
हमेशा रस से लबालब
अगर सामान्य किसी रस की बात करे तो यह रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन है लेकिन जब इसे मीठा , खट्टा, कड़वा जैसे विशेषणों का साथ मिलता है तब ये अपनी अर्थ की पूर्णता को प्राप्त करता हैं. पर बनारस का बना शब्द (बनाना, क्रिया )के साथ मिलकर रस शब्द अर्थ की पूर्णता को प्राप्त करता है, यानि कि यहां भी कुछ अलग. बनारस तो ऐसा ही है न. पर खास ये की यहां रस को बनाने की जरूरत नहीं है. ये अपने आप से "बना" है ठीक शिव की तरह. अपने आप से बने. अड़भंगी, समाज के साथ रहने वाले और समाजिक व्यवस्था का प्रतिरूप बनकर. ऐसे देव जो सर्व समाज के हैं और सबके लिए हैं.
(इस आर्टिकल के लेखक वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु शर्मा हैं।)
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