सारनाथ उत्खनन को लेकर ASI ने लगाया नया शिलापट्ट, औपनिवेशिक गलत फहमी समाप्त

वाराणसी: बुद्ध की उपदेश स्थली सारनाथ में एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है, जहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने धर्मराजिका स्तूप के पास लगे पुराने शिलापट्ट को हटाकर नया संशोधित शिलापट्ट लगा दिया है. इस नए पट्ट पर अब बाबू जगत सिंह के योगदान को स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है, जिन्होंने 18वीं शताब्दी के अंत में (1787-94 के आसपास) सारनाथ के पुरातात्विक महत्व को सबसे पहले उजागर किया था.

सारनाथ की ऐतिहासिक पहचान आई सामने
बाबू जगत सिंह, बनारस के महाराजा चेत सिंह के रिश्तेदार और दीवान थे. उन्होंने क्षेत्र में उत्खनन करवाया, जिसमें धर्मराजिका स्तूप से रत्न, अस्थि कलश और अन्य बौद्ध अवशेष प्राप्त हुए. उन्होंने इन अवशेषों को पवित्र मानकर उत्खनन रोका और ब्रिटिश अधिकारी जॉनाथन डंकन को सौंपने से इनकार कर दिया. ब्रिटिश काल में उन्हें गलत तरीके से स्तूप नष्ट करने वाला बताया गया था, जबकि वास्तव में उनके प्रयासों से ही सारनाथ की ऐतिहासिक पहचान सामने आई.
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रॉयल फैमिली शोध समिति के संरक्षक और जगत नारायण के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने इसे ऐतिहासिक दिन करार देते हुए कहा कि यह बदलाव औपनिवेशिक इतिहास लेखन में सुधार की दिशा में बड़ा कदम है. उनके वंशजों की लंबी मांग और प्रमाणों के आधार पर एएसआई ने यह संशोधन किया. सारनाथ, जहां भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन) दिया था, विश्व प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थस्थल है. यह सुधार न केवल स्थानीय इतिहास को सही करता है, बल्कि सारनाथ को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने की प्रक्रिया को भी मजबूती दे सकता है.

प्रदीप नारायण सिंह ने जोर देकर कहा, “यह संशोधन औपनिवेशिक गलत मान्यताओं को चुनौती देता है और भारतीय योगदान को उसका उचित सम्मान प्रदान करता है.” बाबू जगत सिंह के उत्खनन कार्य को समय तक इतिहास के पन्नों में दबाए रखा गया. हाल के वर्षों में जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट शोध समिति के प्रयासों से इस तथ्य को आधिकारिक मान्यता मिली है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय इतिहास लेखन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.



