खाड़ी युद्ध में फंसा बासमती चावल का निर्यात, वरिष्ठ कृषि विज्ञानी ने कही बड़ी बात
वाराणसी: अमेरिका-इजरायल के साथ ईरान के युद्ध के चलते भारत से बासमती चावल का निर्यात फंस गया है. देश के किसानों द्वारा उत्पादित लगभग चार लाख टन बासमती चावल से भरे जहाज समुद्र और विभिन्न बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं. इस स्थिति में शिपिंग कंपनियों ने प्रति कंटेनर लगभग 2000 डॉलर का वार सरचार्ज भी लगा दिया है. एक कंटेनर में औसतन 20 टन चावल लोड होता है. यह चौंकाने वाली जानकारी अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आइसार्क) में आयोजित धान फसल संबंधी दो दिवसीय नीति संवाद में पहुंचे पूसा के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ कृषि विज्ञानी पद्मश्री डा. अशोक कुमार सिंह ने दी.

खाड़ी देशों में होता है निर्यात
उन्होंने बताया कि भारत से बासमती चावल का सबसे अधिक निर्यात ओमान से सऊदी अरब के बीच पड़ने वाले खाड़ी देशों में होता है. देश के कुल बासमती निर्यात का लगभग 25 प्रतिशत अकेले ईरान खरीदता है, जबकि खाड़ी देशों का कुल हिस्सा करीब 45 प्रतिशत है. डा. सिंह के अनुसार, भारत हर वर्ष 50 हजार करोड़ रुपये का लगभग 60 लाख टन बासमती चावल निर्यात करता है.
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देश में उत्पादित कुल बासमती का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा निर्यात किया जाता है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द समस्या का समाधान नहीं निकाला गया, तो देश में बासमती चावल की कीमतों में तेजी से गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. इसके साथ ही, अगले सीजन में बासमती की खेती और उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है.
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किसानों के सामने चुनौती
इस संकट के चलते किसानों के सामने आर्थिक चुनौतियाँ उत्पन्न हो गई हैं. बासमती चावल की खेती पर निर्भर किसान अब निर्यात में रुकावट के कारण चिंतित हैं. यदि स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो यह न केवल किसानों के लिए बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर परिणाम ला सकता है.
ईरान युद्ध के कारण बासमती चावल का निर्यात प्रभावित होना एक गंभीर मुद्दा बन गया है, जिसे तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, ताकि किसानों की आर्थिक स्थिति को सुरक्षित रखा जा सके और बासमती चावल के निर्यात को पुनः सुचारू किया जा सके.

