संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के 44वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल ने भारतीय ज्ञान प्रणाली, पांडुलिपि संरक्षण और आधुनिक शिक्षा पर रखा जोर.

वाराणसी: सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के 44वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने भारतीय ज्ञान परंपरा को वैज्ञानिक शोध और प्रमाणों के साथ वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि योग, आयुर्वेद और ध्यान जैसी भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं आज पूरी दुनिया में स्वीकार की जा रही हैं और यूनेस्को भी योग सहित कई भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को वैश्विक विरासत का दर्जा दे चुका है.
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल आधार वैज्ञानिक सोच और नए विचारों का स्वागत है. "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत सदैव ज्ञान और नवाचार का समर्थक रहा है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा से जोड़ा जा रहा है, जबकि 'ज्ञान भारत मिशन' के माध्यम से प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण और शोध कार्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है.
कुलाधिपति ने कहा कि "मेरा गांव मेरी धरोहर" और राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण जैसी योजनाओं के जरिए देश के गांवों की लोक संस्कृति और परंपराओं का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है. उन्होंने युवाओं से भारतीय भाषाओं, योग, आयुर्वेद, लोक कलाओं और इतिहास को अपनाकर डिजिटल माध्यमों से दुनिया तक पहुंचाने का आह्वान किया.
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति का प्रचार केवल गौरवगान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे वैज्ञानिक शोध और प्रमाणों के आधार पर विश्व समुदाय के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि वर्षों तक प्राचीन पांडुलिपियों की उपेक्षा होती रही, लेकिन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद उनके संरक्षण और डिजिटलीकरण के कार्यों में तेजी आई है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में संरक्षित पांडुलिपियों के बेहतर संरक्षण और उपयोग की आवश्यकता भी बताई.
अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए राज्यपाल ने कहा कि विकास कार्यों में ग्रांट की कमी नहीं है, बल्कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की कमी है. उन्होंने कुलपति प्रो. बिहारीलाल शर्मा की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने विभिन्न स्रोतों से संसाधन जुटाकर विश्वविद्यालय में कई महत्वपूर्ण कार्य पूरे कराए हैं. साथ ही अधूरे विकास कार्यों, विशेषकर बाउंड्री वॉल के निर्माण में हो रही देरी पर भी नाराजगी व्यक्त की.
दीक्षांत समारोह में उन्होंने आंगनवाड़ी केंद्रों के आधुनिकीकरण पर भी जोर दिया. उन्होंने बताया कि अब तक 17 हजार से अधिक आंगनवाड़ी केंद्रों को बेहतर सुविधाओं से जोड़ा जा चुका है, जहां बच्चों के लिए बेहतर वातावरण, टेबल-कुर्सी और सम्मानजनक भोजन व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है. इस कार्य में जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी के सहयोग की उन्होंने सराहना की.
एचपीवी (HPV) वैक्सीन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि जनसहयोग से पिछले तीन वर्षों में तीन लाख से अधिक बेटियों का टीकाकरण कराया गया है. उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा 14 वर्ष की बेटियों के लिए एचपीवी वैक्सीन मुफ्त किए जाने का स्वागत करते हुए सभी अभिभावकों, स्कूलों, कॉलेजों और आंगनवाड़ी केंद्रों से प्रत्येक पात्र बेटी का टीकाकरण सुनिश्चित कराने की अपील की। उन्होंने सीरम इंस्टीट्यूट, पुणे के साथ हुए एमओयू का उल्लेख करते हुए बताया कि इसके माध्यम से लाखों वैक्सीन उपलब्ध कराई गई हैं। सोनभद्र में 40 हजार एचपीवी वैक्सीन उपलब्ध कराने तथा अन्य आदिवासी बहुल जिलों में भी अभियान चलाने की जानकारी दी.
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उन्होंने बेटियों के प्रति भेदभाव समाप्त करने, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने, सामाजिक समरसता बढ़ाने तथा सफाई कर्मियों सहित सभी वर्गों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने का संदेश दिया. साथ ही विश्वविद्यालय परिसर में स्वच्छता, अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना विकसित करने तथा संस्थान की विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसके समग्र विकास के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की कार्यशैली और मानसिकता में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आत्ममंथन समय की मांग है.



