बनारस लिटरेचर फेस्टिवल-4 - काशी की साहित्यिक फिजा में सृजन, स्मृति और साधना का अद्भुत संगम, अनुपम खेर ने रखे विचार

वाराणसी : देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी की साहित्यिक फिजा में सृजन, स्मृति और साधना का अद्भुत संगम देखने को मिला. अवसर वाराणसी स्थित होटल ताज में शुक्रवार को बनारस लिटरेचर फेस्टिवल-4 के उद्घाटन का था. इस दौरान पद्मभूषण से सम्मानित प्रख्यात अभिनेता अनुपम खेर के दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम प्रारंभ हुआ. मंच पर अनुभव, संघर्ष और प्रेरणा का भी प्रकाश फैला हुआ था.
उद्घाटन सत्र में स्कूली बच्चों द्वारा प्रस्तुत नाट्य मंचन को देखकर अनुपम खेर भाव विभोर हो उठे. उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि यह प्रस्तुति उन्हें अपने स्कूल के दिनों की याद दिला गई. उन्होंने अपने जीवन के पहले नाटक की स्मृति साझा की, जिसमें उन्हें पृथ्वीराज चौहान की भूमिका मिली थी, जबकि जयचंद की भूमिका दूधवाले के बेटे नंदू को दी गई थी. अनुपम खेर ने हंसते हुए कहा, “मुझे चुनने की ‘क्वालिफिकेशन’ बस इतनी थी कि मैं गोरा और पतला था.”
उन्होंने उस नाटक का एक रोचक प्रसंग सुनाया, जिसमें उनका संवाद था— “चला जा, चला जा, तू बकवास ना कर”— जिसे तीन बार बोलना था और हर बार जयचंद को गिरना था. दो बार तो नंदू गिर गया, लेकिन तीसरी बार गिरने से पहले उसके पिता की आवाज़ गूँज उठी— “अब तू गिरा तो घर मत अइयो.” इस संस्मरण को सुनाते हुए पूरा सभागार ठहाकों से गूंज उठा.
अपने वक्तव्य की शुरुआत में अनुपम खेर ने एक सशक्त सूत्रवाक्य दिया. उन्होंने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि प्रतिभा से अधिक परिश्रम, अनुशासन और निरंतर अभ्यास ही किसी कलाकार को गढ़ता है. उन्होंने कहा कि अभिनय केवल मंच या कैमरे की कला नहीं, बल्कि जीवन को गहराई से देखने और महसूस करने की साधना है.
सत्र के अंत में अनुपम खेर ने बच्चों के साथ आत्मीय संवाद किया, उनके प्रश्नों के उत्तर दिए और स्मृतिचिह्न स्वरूप उनके साथ फोटो भी खिंचवाए. यह पल बच्चों के लिए प्रेरणा का स्थायी दीप बन गया. बीएलएफ के अध्यक्ष दीपक मधोक ने स्वागत भाषण में कहा कि काशी से ज्यादा उपयुक्त स्थान कोई और हो ही नहीं सकता। यहां धर्म, आध्यात्म, संस्कृति, संस्कार, संस्कृत आदि का अविरल प्रवाह है. उन्होंने मार्क ट्वेन को उद्धृत करते हुए काशी की महिमा का बखान किया. मधोक ने कहा कि बनारस लिटरेचर फेस्टिवल एक संगठित टीम वर्क है. इस बार फेस्टिवल में 167 सेलिब्रिटीज आए हुए हैं और कई कार्यक्रम एक साथ संचालित हैं. उन्होंने सभागार में मौजूद सैकड़ों संस्कृति एवं कला प्रेमियों को कार्यक्रम का साक्षी बनने का आह्वान किया.
बीएलएफ के सचिव बृजेश सिंह ने इस फेस्टिवल के कॉन्सेप्ट को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि यह बनारस की निरंतर आनंदयुक्त संस्कृति की वाहक है. बाबा काशी विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा की असीम कृपा से यह फेस्टिवल चौथे वर्ष भी भव्य रूप से आयोजित हो रहा है. इसमें 13 देशों के परफॉर्मेंस और 50 से अधिक देशों के दर्शक आए हुए हैं. उन्होंने कहा कि अनुमानतः एक फरवरी को महोत्सव के समापन तक लगभग एक लाख लोग इसके साक्षी बनेंगे.
पंडित चंद्रमौली उपाध्याय ने कहा कि यह आयोजन सामान्य नहीं, बल्कि बहुत कठिन है. इसे पूर्ण करने के लिए जो प्रयत्न किया जा रहा है, वह अतिमहत्वपूर्ण है. नेपाल से आए विशेष अतिथि विनोद चौधरी ने कहा कि नेपाल और काशी का संबंध अद्भुत और अटूट है. डॉ. नीरजा माधव ने काशी की जीवनशैली और मिज़ाज को रेखांकित करते हुए कहा कि काशी के अधिपति बाबा काशी विश्वनाथ का स्वभाव जैसा है, वैसा ही उनके काशीवासियों का भी है.
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उद्घाटन से पूर्व सनबीम लहरतारा के छात्रों ने “चोला टाइगर्स: द एवेंजर्स ऑफ सोमनाथ” नाटक का प्रभावशाली मंचन किया, जिसने दर्शकों में देशभक्ति का ज्वार पैदा कर दिया. बीएलएफ-4 के उद्घाटन सत्र के दौरान दो पुस्तकों का विमोचन भी हुआ, जिसमें सीआरपीएफ के डीआईजी निशित कुमार की पुस्तक 'द बेंगलोर कांसेप्ट' शामिल है.इस दौरान 61 हजार बुक मार्क का भी विमोचन किया गया, जो बच्चों द्वारा बनाए गए थे.



