कालोनाइजर हत्याकांड का सुपारी किलर बनारसी यादव ढेर

वाराणसी। यूपी एसटीएफ ने मंगलवार की देर रात सारनाथ के कालोनाइजर हत्याकांड में शामिल एक लाख के इनामी सुपारी किलर बनारसी यादव को मुठभेड़ में ढेर कर दिया। यह मुठभेड़ वाराणसी के चौबेपुर थाना क्षेत्र में बरियासनपुर के पास हुई। मौके से दो पिस्टल और बड़ी संख्या में कारतूस बरामद किए गए।
गाजीपुर जिले के खानपुर थाना क्षेत्र के गौरहट गांव का रहने वाला शूटर बनारसी यादव शुरुआत में छोटे-मोटे विवादों और लूटपाट से जुड़ा था, लेकिन जल्द ही सुपारी किलर के रूप में उभरा। उसने हत्या, लूट, जबरन वसूली जैसे संगीन अपराधों में हाथ आजमाया। वाराणसी, गाजीपुर, सोनभद्र समेत कई जिलों में उसके खिलाफ 24 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके थे। उसका नाम सुनते ही लोग कांप उठते थे, क्योंकि वह बिना झिझक गोली चलाने वाला शार्पशूटर बन चुका था।
उसके उदय का असली मोड़ तब आया जब वह सुपारी लेकर काम करने लगा। अपराध की दुनिया में पैसे के लिए जान लेना उसका पेशा बन गया। पुलिस ने उसे एक लाख रुपये का इनामी घोषित कर दिया था। लेकिन बनारसी फरार रहकर अपनी खौफनाक छवि को और मजबूत करता रहा। उसने कई हत्याओं में हाथ काला किया, लेकिन आखिरी वारदात ने उसकी किस्मत बदल दी।
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21 अगस्त 2025 की सुबह वाराणसी के सारनाथ थाना क्षेत्र की अरिहंत नगर कॉलोनी फेज-2 में बाइक सवार तीन बदमाशों ने कॉलोनाइजर महेंद्र गौतम को निशाना बनाया। महेंद्र गौतम एक सफल व्यवसायी थे, जिनका जमीन और प्रॉपर्टी से जुड़े विवाद लंबे समय से चल रहे थे। खबरों के मुताबिक, 50 करोड़ रुपये की जमीन विवाद में मुंबई से शूटर हायर किए गए थे, लेकिन मुख्य शूटर बनारसी यादव ही था। उसके साथी अरविंद यादव उर्फ फौजी (कल्लू) और विशाल थे। विशाल बाइक चला रहा था, जबकि बनारसी और अरविंद ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। महेंद्र गौतम मौके पर ही ढेर हो गए। यह हत्या सिर्फ एक कत्ल नहीं थी—यह सुपारी का क्लासिक केस था, जहां पांच लाख रुपये की सुपारी ली गई थी।
हत्या के बाद बनारसी यादव लगभग साढ़े पांच महीने तक पुलिस की पकड़ से दूर रहा।
वाराणसी पुलिस और एसटीएफ ने उसकी तलाश में कई टीमें लगाईं। आखिरकार 3 फरवरी 2026 की देर रात चौबेपुर थाना क्षेत्र के बारियासनपुर रिंग रोड पर एसटीएफ की टीम ने उसे घेर लिया।
बनारसी ने सरेंडर नहीं किया, उसने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में उसे गोलियां लगीं। घायल हालत में उसे अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मौके से दो पिस्टल और भारी मात्रा में कारतूस बरामद हुए।
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महेंद्र गौतम की हत्या ही बनारसी यादव के ताबूत में अंतिम कील साबित हुई। यह हत्याकांड उसके अपराधी जीवन का चरम था, जिसने पुलिस को उसकी तलाश में और तेज कर दिया।
बनारसी का अंत एक मुठभेड़ में हुआ, जैसा अक्सर ऐसे बदमाशों का होता है—गोली से शुरू हुआ सफर गोली से ही खत्म। पूर्वांचल में अपराध की दुनिया को यह संदेश दे गया कि सुपारी लेकर खून बहाने वाले की गोली आखिरकार खुद पर ही लौट आती है।
बनारसी यादव की कहानी अपराध के अंधेरे रास्ते पर चलने वालों के लिए एक चेतावनी है—उदय जितना तेज होता है अंत उतना ही भयानक होता है



