निर्माल्य से बनेगी सीएनजी, आईआईटी बीएचयू के शोधछात्र के नवाचार को मिला पेटेंट

वाराणसीः घाटों पर बिखरे फूलों को देखकर उपजा एक विचार अब भारतीय पेटेंट में बदल गया है. मंदिरों में प्रतिदिन चढ़ने वाले फूल-मालाएं और पूजन सामग्री पूजा के बाद अक्सर अन्य कचरे के साथ मिलकर फेंक दी जाती हैं या जल स्रोतों में पहुंच जाती हैं, जिससे पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ श्रद्धालुओं की भावनाएं भी प्रभावित होती हैं. इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए आईआईटी बीएचयू के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग स्कूल में पुष्प अपशिष्ट के वैज्ञानिक एवं आस्था-सम्मत प्रबंधन पर शोध किया गया है। इस शोध में आस्था, विज्ञान और सर्कुलर इकोनामी को साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है.
इस शोध के आधार पर विकसित तकनीक का पेटेंट आईआईटी बीएचयू को प्रदान किया गया है. इस परियोजना में शोधार्थी कैलाश पति पांडेय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और शोध एसोसिएट प्रोफेसर डा. अभिषेक सुरेश ढोबले के मार्गदर्शन में आगे बढ़ाया गया.
“एक दिन घाटों पर घूमते समय कैलाशपति ने देखा कि श्रद्धा से भगवान को अर्पित किए गए फूल कचरे के ढेर में पड़े हैं. तभी लगा कि इन फूलों को अपशिष्ट नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए, उसी सोच से यह शोध शुरू हुआ.
शोध में विकसित माडल के तहत पुष्प अपशिष्ट से बायो-सीएनजी, जैविक खाद और हवन सामग्री तैयार की जा सकती है. सबसे पहले फूलों को नियंत्रित जैविक प्रक्रिया से गुजारा जाता है, जिससे बायोगैस उत्पन्न होती है. इस गैस को शुद्ध और संपीड़ित कर बायो-सीएनजी के रूप में उपयोग किया जा सकता है, जो सीएनजी किट वाले वाहनों के लिए स्वच्छ ईंधन का विकल्प बन सकती है.
वैश्विक स्तर पर तेल संकट, बढ़ती ईंधन कीमतों और भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच स्थानीय जैविक संसाधनों से ईंधन उत्पादन को आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. शोधकर्ताओं के अनुसार धार्मिक स्थलों से निकलने वाला जैविक कचरा ऊर्जा उत्पादन का स्थानीय स्रोत बन सकता है, जिससे आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है.
बायोगैस निकालने के बाद बचा हुआ डाइजेस्टेट पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जाता है. उसी डाइजेस्टेट को प्राकृतिक पदार्थों के साथ मिलाकर हवन सामग्री तैयार की जाती है। शोध के अनुसार यह हवन सामग्री पारंपरिक व्यावसायिक उत्पादों की तुलना में बेहतर दहन क्षमता, कम धुआं और अधिक ऊष्मीय क्षमता प्रदर्शित करती है.
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विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया जाए, तो इससे धार्मिक नगरों में पुष्प अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या कम होगी, स्वच्छ ऊर्जा का स्थानीय उत्पादन बढ़ेगा और फूल संग्रह, प्रसंस्करण, खाद निर्माण तथा हवन सामग्री उत्पादन जैसे क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं. इस परियोजना के माध्यम से वाराणसी में प्रतिदिन 350 किलोग्राम से अधिक संपीड़ित बायो-सीएनजी के उत्पादन का अनुमान है.
डॉ. अभिषेक सुरेश ढोबले का कहना है कि
“यदि ऐसे फूल जल स्रोतों या सामान्य कचरे में मिलते हैं तो पर्यावरण और लोगों की भावनाओं दोनों को नुकसान होता है. हमारा प्रयास है कि इन्हें संसाधन के रूप में देखा जाए, न कि अपशिष्ट के रूप में. हमने ऐसा मॉडल विकसित करने का प्रयास किया है जिसमें फूल पहले ऊर्जा उत्पादन में योगदान दें, फिर उनसे खाद बने और अंत में शेष संसाधन हवन सामग्री के रूप में पुनः भगवान को अर्पित किए जा सकें. यह सच्चे अर्थों में सर्कुलर इकोनॉमी का उदाहरण है. इस उपलब्धि पर संस्थान के निदेशक प्रो.अमित पात्रा ने टीम को बधाई दी. उन्होंने कहा कि “आईआईटी बीएचयू समाज की ज़रूरी समस्याओं के समाधान हेतु अनुसंधान आधारित नवाचारों के लिए प्रतिबद्ध है. यह शोध स्वच्छ ऊर्जा, कचरा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ता है तथा स्वच्छ भारत मिशन जैसी राष्ट्रीय पहलों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है.”
भारतीय पेटेंट IN595095 B1 के रूप में स्वीकृत यह नवाचार वाराणसी सहित देश के अन्य धार्मिक शहरों के लिए भी एक उपयोगी और टिकाऊ मॉडल साबित हो सकता है। यह मॉडल “आस्था से संसाधन और संसाधन से आत्मनिर्भरता” की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकता है.



