भारतीय संगीत और इतिहास लेखन की परंपरा पर BHU में मंथन, मालिनी अवस्थी बोलीं- घराने भारत की ज्ञान-स्मृति के जीवंत दस्तावेज

वाराणसी: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में चल रही 15 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला ‘भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ’ में सोमवार को भारतीय इतिहास लेखन और संगीत परंपरा के विविध आयामों पर चर्चा हुई. कार्यशाला के तहत दो महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किए गए.
पहले सत्र में IIT-BHU की प्रो. विनीता चन्द्रा ने ‘राधा कुमुद मुखर्जी का इतिहास-दर्शन : भारतीय स्रोतों की पुनर्प्रतिष्ठा’ विषय पर व्याख्यान दिया, जबकि दूसरे सत्र में प्रसिद्ध लोक एवं शास्त्रीय गायिका पद्मश्री प्रो. मालिनी अवस्थी ने ‘भारतीय संगीत घराने : परम्परा, संरक्षण और सांस्कृतिक निरंतरता’ विषय पर अपने विचार रखे.
संगीत केवल कला नहीं, ज्ञान और साधना की अभिव्यक्ति : मालिनी अवस्थी
प्रो. मालिनी अवस्थी ने कहा कि भारत में संगीत केवल कला नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और आध्यात्मिक चेतना की अभिव्यक्ति है. भारतीय संगीत परंपरा अपनी प्रकृति और दार्शनिक आधार के कारण विश्व की अन्य संगीत परंपराओं से विशिष्ट है. उन्होंने सामवेद, नाट्यशास्त्र और भारतीय मंत्र परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में नाद और संगीत का ज्ञान अत्यंत प्राचीन और वैज्ञानिक रहा है.
उन्होंने कहा कि नाट्यशास्त्र को पंचम वेद की संज्ञा दिया जाना इस बात का प्रमाण है, कि भारत में संगीत, नृत्य और अभिनय को ज्ञान की व्यापक परंपरा का हिस्सा माना गया. भारतीय संगीत मूलतः श्रुति और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ा, जिसमें सुनना, सीखना, स्मरण करना और अगली पीढ़ी तक ज्ञान पहुंचाना महत्वपूर्ण रहा.

घराना केवल भौगोलिक पहचान नहीं
संगीत घरानों की चर्चा करते हुए प्रो. अवस्थी ने कहा कि घराना केवल किसी स्थान की पहचान नहीं, बल्कि किसी विशिष्ट परिवार या गुरु-परंपरा से विकसित संगीत शैली, साधना और रवायत का नाम है. उन्होंने कव्वाल बच्चा, ग्वालियर, लखनऊ, दिल्ली, किराना, भिंडी बाजार, जयपुर-अतरौली, पटियाला, रामपुर-सहसवान, मेवाती और शाम चौरासी सहित विभिन्न घरानों की विशेषताओं पर प्रकाश डाला.
उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की मूल परंपरा ध्रुपद से जुड़ी है, बाद में संगीत की अभिव्यक्ति में स्वतंत्रता की आवश्यकता के साथ खयाल जैसी शैलियों का विकास हुआ और विभिन्न गायन शैलियों तथा घरानों ने भारतीय संगीत को बहुआयामी स्वरूप प्रदान किया.
प्रो. अवस्थी ने विष्णु दिगंबर पलुस्कर, ओंकारनाथ ठाकुर, कुमार गंधर्व, बेगम अख्तर, पं. भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, अमीर खां, केसरबाई केरकर, किशोरी अमोनकर, पं. मल्लिकार्जुन मंसूर, बड़े गुलाम अली खां, पं. जसराज और उस्ताद राशिद खां समेत अनेक महान कलाकारों का स्मरण किया. उन्होंने कहा कि कुछ कलाकार अपने जीवनकाल में ही स्वयं एक ‘स्कूल’ और ‘संस्थान’ बन जाते हैं और उनकी शिष्य परंपरा आगे चलकर स्वतंत्र संगीत धारा का रूप लेती है.
काशी की संगीत परंपरा को बताया बहुआयामी
प्रो. मालिनी अवस्थी ने कहा कि काशी में बैठकर भारतीय संगीत घरानों की चर्चा करना विशेष महत्व रखता है, बनारस घराना भारतीय संगीत की अत्यंत व्यापक और बहुआयामी परंपरा है. काशी में गायन, वादन, नृत्य और तबले की समृद्ध परंपराएं विकसित हुईं.
उन्होंने पं. गदाधर मिश्र, पं. राम सहाय तथा बनारस तबला घराने की गुरु-शिष्य परंपरा का उल्लेख करते हुए पं. अनोखे लाल मिश्र, पं. कंठे महाराज, पं. किशन महाराज, पं. पुरन महाराज, पं. भुलई महाराज, पं. शांता महाराज और पं. कुमार बोस के योगदान को रेखांकित किया.
उन्होंने कहा कि काशी की ठुमरी में शब्द केवल शब्द नहीं रह जाते, बल्कि संवाद और भाव में बदल जाते हैं. काशी की संगीत परंपरा ने लखनऊ, फैजाबाद, फर्रुखाबाद सहित विभिन्न क्षेत्रों की संगीत धाराओं से संवाद करते हुए उन्हें आत्मसात किया.
प्रो. अवस्थी ने गया की ठुमरी शैली और विष्णुपुर घराने का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि विष्णुपुर की संगीत परंपरा पर अभी और शोध किए जाने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि घराना परंपरा केवल कलाकारों की वंशावली नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक ज्ञान-स्मृति, साधना, गुरु-शिष्य परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत दस्तावेज है.
भारतीय स्रोतों को इतिहास लेखन के केंद्र में लाने का प्रयास : प्रो. विनीता चन्द्रा
दूसरे सत्र में प्रो. विनीता चन्द्रा ने भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा और उसके विभिन्न चरणों पर चर्चा की, उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास को समझने के लिए स्वदेशी स्रोतों और भारतीय ज्ञान परंपराओं को आधार बनाना आवश्यक है.
उन्होंने Historicism, Orientalism और Imperial Colonialism जैसी प्रवृत्तियों के संदर्भ में भारतीय इतिहास-दृष्टि के विकास को समझाया. उनके अनुसार औपनिवेशिक प्रभाव के कारण इतिहास लेखन के शुरुआती दौर में भारतीय स्रोतों और परंपराओं के कई महत्वपूर्ण पक्षों की उपेक्षा हुई.
प्रो. चन्द्रा ने कहा कि इतिहासकार राधा कुमुद मुखर्जी ने उपेक्षित भारतीय स्रोतों को फिर से इतिहास लेखन के केंद्र में लाने का प्रयास किया. उन्होंने भारतीय साहित्य, परंपराओं और मूल स्रोतों के आधार पर भारतीय इतिहास को समझने की जरूरत पर जोर दिया.
उन्होंने राधा कुमुद मुखर्जी की पुस्तक Indian Shipping का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारत की समुद्री गतिविधियों और व्यापार की परंपरा के प्रमाण Periplus of the Erythraean Sea जैसे स्रोतों में भी मिलते हैं. इसी तरह उनके Local Government in India संबंधी अध्ययन के माध्यम से भारतीय स्थानीय शासन की प्राचीन जड़ों को समझने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला.
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प्रो. चन्द्रा ने कहा कि राधा कुमुद मुखर्जी का योगदान इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि उन्होंने भारतीय इतिहास को केवल औपनिवेशिक लेखकों की व्याख्याओं के आधार पर देखने के बजाय भारतीय स्रोतों और ज्ञान परंपरा के माध्यम से समझने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि आर.सी. मजूमदार समेत अन्य इतिहासकारों के कार्यों के साथ राधा कुमुद मुखर्जी की इतिहास-दृष्टि को समग्रता में समझने की आवश्यकता है.



