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भारतीय संगीत और इतिहास लेखन की परंपरा पर BHU में मंथन, मालिनी अवस्थी बोलीं- घराने भारत की ज्ञान-स्मृति के जीवंत दस्तावेज

भारतीय संगीत और इतिहास लेखन की परंपरा पर BHU में मंथन, मालिनी अवस्थी बोलीं- घराने भारत की ज्ञान-स्मृति के जीवंत दस्तावेज
Aug 18, 2026, 03:26 AM
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Posted By Niharika dwivedi

वाराणसी: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में चल रही 15 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला ‘भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ’ में सोमवार को भारतीय इतिहास लेखन और संगीत परंपरा के विविध आयामों पर चर्चा हुई. कार्यशाला के तहत दो महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किए गए.


पहले सत्र में IIT-BHU की प्रो. विनीता चन्द्रा ने ‘राधा कुमुद मुखर्जी का इतिहास-दर्शन : भारतीय स्रोतों की पुनर्प्रतिष्ठा’ विषय पर व्याख्यान दिया, जबकि दूसरे सत्र में प्रसिद्ध लोक एवं शास्त्रीय गायिका पद्मश्री प्रो. मालिनी अवस्थी ने ‘भारतीय संगीत घराने : परम्परा, संरक्षण और सांस्कृतिक निरंतरता’ विषय पर अपने विचार रखे.


संगीत केवल कला नहीं, ज्ञान और साधना की अभिव्यक्ति : मालिनी अवस्थी


प्रो. मालिनी अवस्थी ने कहा कि भारत में संगीत केवल कला नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और आध्यात्मिक चेतना की अभिव्यक्ति है. भारतीय संगीत परंपरा अपनी प्रकृति और दार्शनिक आधार के कारण विश्व की अन्य संगीत परंपराओं से विशिष्ट है. उन्होंने सामवेद, नाट्यशास्त्र और भारतीय मंत्र परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में नाद और संगीत का ज्ञान अत्यंत प्राचीन और वैज्ञानिक रहा है.


उन्होंने कहा कि नाट्यशास्त्र को पंचम वेद की संज्ञा दिया जाना इस बात का प्रमाण है, कि भारत में संगीत, नृत्य और अभिनय को ज्ञान की व्यापक परंपरा का हिस्सा माना गया. भारतीय संगीत मूलतः श्रुति और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ा, जिसमें सुनना, सीखना, स्मरण करना और अगली पीढ़ी तक ज्ञान पहुंचाना महत्वपूर्ण रहा.


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घराना केवल भौगोलिक पहचान नहीं


संगीत घरानों की चर्चा करते हुए प्रो. अवस्थी ने कहा कि घराना केवल किसी स्थान की पहचान नहीं, बल्कि किसी विशिष्ट परिवार या गुरु-परंपरा से विकसित संगीत शैली, साधना और रवायत का नाम है. उन्होंने कव्वाल बच्चा, ग्वालियर, लखनऊ, दिल्ली, किराना, भिंडी बाजार, जयपुर-अतरौली, पटियाला, रामपुर-सहसवान, मेवाती और शाम चौरासी सहित विभिन्न घरानों की विशेषताओं पर प्रकाश डाला.


उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की मूल परंपरा ध्रुपद से जुड़ी है, बाद में संगीत की अभिव्यक्ति में स्वतंत्रता की आवश्यकता के साथ खयाल जैसी शैलियों का विकास हुआ और विभिन्न गायन शैलियों तथा घरानों ने भारतीय संगीत को बहुआयामी स्वरूप प्रदान किया.


प्रो. अवस्थी ने विष्णु दिगंबर पलुस्कर, ओंकारनाथ ठाकुर, कुमार गंधर्व, बेगम अख्तर, पं. भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, अमीर खां, केसरबाई केरकर, किशोरी अमोनकर, पं. मल्लिकार्जुन मंसूर, बड़े गुलाम अली खां, पं. जसराज और उस्ताद राशिद खां समेत अनेक महान कलाकारों का स्मरण किया. उन्होंने कहा कि कुछ कलाकार अपने जीवनकाल में ही स्वयं एक ‘स्कूल’ और ‘संस्थान’ बन जाते हैं और उनकी शिष्य परंपरा आगे चलकर स्वतंत्र संगीत धारा का रूप लेती है.


काशी की संगीत परंपरा को बताया बहुआयामी


प्रो. मालिनी अवस्थी ने कहा कि काशी में बैठकर भारतीय संगीत घरानों की चर्चा करना विशेष महत्व रखता है, बनारस घराना भारतीय संगीत की अत्यंत व्यापक और बहुआयामी परंपरा है. काशी में गायन, वादन, नृत्य और तबले की समृद्ध परंपराएं विकसित हुईं.


उन्होंने पं. गदाधर मिश्र, पं. राम सहाय तथा बनारस तबला घराने की गुरु-शिष्य परंपरा का उल्लेख करते हुए पं. अनोखे लाल मिश्र, पं. कंठे महाराज, पं. किशन महाराज, पं. पुरन महाराज, पं. भुलई महाराज, पं. शांता महाराज और पं. कुमार बोस के योगदान को रेखांकित किया.


उन्होंने कहा कि काशी की ठुमरी में शब्द केवल शब्द नहीं रह जाते, बल्कि संवाद और भाव में बदल जाते हैं. काशी की संगीत परंपरा ने लखनऊ, फैजाबाद, फर्रुखाबाद सहित विभिन्न क्षेत्रों की संगीत धाराओं से संवाद करते हुए उन्हें आत्मसात किया.


प्रो. अवस्थी ने गया की ठुमरी शैली और विष्णुपुर घराने का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि विष्णुपुर की संगीत परंपरा पर अभी और शोध किए जाने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि घराना परंपरा केवल कलाकारों की वंशावली नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक ज्ञान-स्मृति, साधना, गुरु-शिष्य परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत दस्तावेज है.


भारतीय स्रोतों को इतिहास लेखन के केंद्र में लाने का प्रयास : प्रो. विनीता चन्द्रा


दूसरे सत्र में प्रो. विनीता चन्द्रा ने भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा और उसके विभिन्न चरणों पर चर्चा की, उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास को समझने के लिए स्वदेशी स्रोतों और भारतीय ज्ञान परंपराओं को आधार बनाना आवश्यक है.


उन्होंने Historicism, Orientalism और Imperial Colonialism जैसी प्रवृत्तियों के संदर्भ में भारतीय इतिहास-दृष्टि के विकास को समझाया. उनके अनुसार औपनिवेशिक प्रभाव के कारण इतिहास लेखन के शुरुआती दौर में भारतीय स्रोतों और परंपराओं के कई महत्वपूर्ण पक्षों की उपेक्षा हुई.


प्रो. चन्द्रा ने कहा कि इतिहासकार राधा कुमुद मुखर्जी ने उपेक्षित भारतीय स्रोतों को फिर से इतिहास लेखन के केंद्र में लाने का प्रयास किया. उन्होंने भारतीय साहित्य, परंपराओं और मूल स्रोतों के आधार पर भारतीय इतिहास को समझने की जरूरत पर जोर दिया.


उन्होंने राधा कुमुद मुखर्जी की पुस्तक Indian Shipping का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारत की समुद्री गतिविधियों और व्यापार की परंपरा के प्रमाण Periplus of the Erythraean Sea जैसे स्रोतों में भी मिलते हैं. इसी तरह उनके Local Government in India संबंधी अध्ययन के माध्यम से भारतीय स्थानीय शासन की प्राचीन जड़ों को समझने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला.


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प्रो. चन्द्रा ने कहा कि राधा कुमुद मुखर्जी का योगदान इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि उन्होंने भारतीय इतिहास को केवल औपनिवेशिक लेखकों की व्याख्याओं के आधार पर देखने के बजाय भारतीय स्रोतों और ज्ञान परंपरा के माध्यम से समझने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि आर.सी. मजूमदार समेत अन्य इतिहासकारों के कार्यों के साथ राधा कुमुद मुखर्जी की इतिहास-दृष्टि को समग्रता में समझने की आवश्यकता है.

अन्विति में ‘रंगों की उड़ान’ ने भरी कल्पनाओं में उड़ान, हिंदी दिवस कार्यक्रम के अतिथि होंगे संजय मिश्रा...
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वाराणसी : काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित ‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ के पांचवें दिन शनिवार को ‘रंगों की उड़ान’ चित्रकला प्रतियोगिता के साथ कार्यक्रमों की श्रृंखला आगे बढ़ी. जंतु विज्ञान विभाग के एसपीआरसी हाल में आयोजित प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने शब्दों के बजाय रंगों और रेखाओं के माध्यम से विज्ञान, तकनीक, पर्यावरण और भविष्य की अपनी कल्पनाओं को कैनवास पर उकेरा.हिंदी प्रकाशन समिति की ओर से आयोजित ‘अन्विति’ के तहत यह पांचवां और अंतिम कार्यक्रम रहा. प्रतियोगिता के दौरान विद्यार्थियों की कलाकृतियों में वर्ष 2200 का मंगल, ऑक्सीजन सिलेंडरों वाले शहर, हरित गुंबदनुमा आवास, भारतीय ध्वज फहराते अंतरिक्ष यात्री, रोबोट, उड़न तश्तरी, डीएनए की सर्पिल संरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पौधों से भरे बल्ब जैसे विषय देखने को मिले.विद्यार्थियों ने वैज्ञानिक अवधारणाओं को कला के माध्यम से सहज और रचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया. स्वीकृति कुमारी, श्रुति पाठक, अंकिता बिंद, प्राची तिवारी, सत्य राव और वैष्णवी बजाज सहित अनेक विद्यार्थियों की कृतियों में विज्ञान और कल्पना का अनूठा मेल दिखाई दिया.कुछ चित्रों में मंगल ग्रह पर कृषि और मानव बस्तियों की कल्पना की गई तो कुछ में पृथ्वी से दूर भविष्य की काल्पनिक नगरी दिखाई दी. कई चित्रों में तकनीक और प्रकृति के बीच संतुलन का संदेश दिया गया, जबकि कुछ विद्यार्थियों ने भविष्य की प्रयोगशालाओं और अंतरिक्ष अभियानों को अपनी कला का विषय बनाया.प्रतियोगिता में एक ओर धुएं से घिरे शहर और ऑक्सीजन सिलेंडर नजर आए तो दूसरी ओर हरित आवास और अंतरिक्ष में तैरते यान दिखाई दिए. प्रदूषण और पर्यावरण संकट के बीच हरित भविष्य की कल्पना का यह विरोधाभास प्रतियोगिता की प्रमुख विशेषता रहा.7 सितंबर से शुरू हुआ था ‘अन्विति’ का सफर‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ की शुरुआत 7 सितंबर को ‘काव्य सरिता’ से हुई थी। इसके बाद 8 सितंबर को ‘कथा सृजन’, 9 सितंबर को वाद-विवाद प्रतियोगिता और 10 सितंबर को ‘ज्ञान प्रभा’ प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को हिंदी में कविता, कहानी, तर्क-वितर्क और वैज्ञानिक विषयों को अभिव्यक्त करने का मंच मिला।ALSO READ : बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...15 सितंबर को संजय मिश्रा के साथ हिंदी दिवस समारोह‘अन्विति’ हिंदी सप्ताह का समापन अब 15 सितंबर को हिंदी दिवस समारोह के साथ होगा। समारोह का आयोजन महामना हॉल, सेमिनार कॉम्प्लेक्स, विज्ञान संकाय में दोपहर 2:45 बजे किया जाएगा। कार्यक्रम में प्रख्यात अभिनेता संजय मिश्रा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे।इस अवसर पर ‘अचिंत्य’ पत्रिका की नई कड़ी ‘क्षितिज से परे’ का विमोचन भी प्रस्तावित है। समारोह के साथ ही ‘अन्विति’ के तहत आयोजित विभिन्न साहित्यिक, बौद्धिक और रचनात्मक गतिविधियों का समापन होगा।
बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...
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वाराणसी : देश के कई शहरों के साथ वाराणसी की हवा की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है। ताजा रैंकिंग में वाराणसी की स्थिति पिछले साल की तुलना में नीचे खिसकी है. शहर के 11वें पायदान से 34वें स्थान पर पहुंचने को पर्यावरण विशेषज्ञ गंभीर संकेत मान रहे हैं. बढ़ती आबादी, वाहनों की संख्या, ट्रैफिक जाम, निर्माण गतिविधियां और कचरे का उचित प्रबंधन नहीं होना वायु प्रदूषण बढ़ने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं.इस संबंध में आईआईटी बीएचयू के केमिकल वैज्ञानिक प्रो. आर.एस. सिंह ने बताया कि किसी भी एयर क्वालिटी रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उसका आकलन किस अवधि और किन मानकों के आधार पर किया गया है. रैंकिंग में सार्वजनिक धारणा के साथ-साथ केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सेंसर से मिलने वाले आंकड़ों की भी भूमिका होती है. यह भी महत्वपूर्ण है कि आंकड़े वर्ष के किस मौसम के लिए लिए गए हैं.उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर सर्दियों में गंगा के किनारे बसे शहरों में प्रदूषण की स्थिति ज्यादा खराब हो जाती है. वहीं बारिश के दौरान वातावरण में मौजूद धूल और कई तरह के कण बारिश के साथ नीचे बैठ जाते हैं, जिससे हवा अपेक्षाकृत साफ रहती है. ऐसे में वाराणसी की मौजूदा रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि इसमें किन महीनों के आंकड़ों को आधार बनाया गया है.बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या बनी चुनौतीप्रो. सिंह के मुताबिक वाराणसी में पर्यटन गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं. काशी विश्वनाथ धाम और अयोध्या समेत धार्मिक पर्यटन के चलते शहर में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है. पहले से अधिक जनसंख्या घनत्व वाले शहर में लोगों और वाहनों का दबाव बढ़ने से प्रदूषण पर भी असर पड़ता है.उन्होंने कहा कि वाहनों से होने वाला उत्सर्जन वायु प्रदूषण का बड़ा कारण है. वाराणसी में लगातार बढ़ता ट्रैफिक और जाम स्थिति को और गंभीर बनाता है. जाम में वाहन लंबे समय तक धीमी गति से चलते या खड़े रहते हैं, जिससे ईंधन की खपत और प्रदूषक उत्सर्जन दोनों बढ़ते हैं. वाहनों से निकलने वाले विभिन्न प्रदूषक हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं.निर्माण कार्यों से बढ़ता पार्टिकुलेट प्रदूषणशहर में लगातार चल रहे निर्माण कार्य भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं. विशेषज्ञ के अनुसार निर्माण स्थलों पर सीमेंट, बालू और अन्य सामग्री का इस्तेमाल होता है. यदि इनका उचित तरीके से भंडारण और प्रबंधन नहीं किया जाता तो धूल के महीन कण हवा में फैल जाते है. यही पार्टिकुलेट मैटर वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण घटकों में शामिल है.प्लास्टिक प्रदूषण भी बन रहा गंभीर खतराप्रो. आर.एस. सिंह ने प्लास्टिक प्रदूषण को भी गंभीर समस्या बताया. उन्होंने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल पानी या मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव हवा पर भी पड़ रहा है. वाहनों के टायर सड़क पर घिसते हैं, जिससे प्लास्टिक आधारित सूक्ष्म कण पर्यावरण में पहुंच सकते हैं.उन्होंने शहर के कचरा डंपिंग यार्ड का उदाहरण देते हुए बताया कि लंबे समय तक खुले में पड़े प्लास्टिक के टुकड़े धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं और माइक्रोप्लास्टिक में बदल सकते हैं. ये सूक्ष्म कण पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं और इनके प्रभाव को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है.घरों में इस्तेमाल होने वाली चीजें भी प्रदूषण का कारणप्रो. सिंह के अनुसार घरों में इस्तेमाल होने वाले कई उत्पाद भी ऐसे रसायन छोड़ सकते हैं जो प्रदूषण में योगदान करते हैं. पेंट और उसमें इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट से निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) इसका उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि आम लोगों को प्रदूषण के कई ऐसे स्रोतों की जानकारी नहीं होती, जिनका सामना वे रोजाना करते हैं.उन्होंने जल प्रदूषण के संदर्भ में दवाओं के अवशेषों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक कई दवाएं शरीर में पूरी तरह मेटाबोलाइज नहीं होतीं और सीवेज के माध्यम से जल स्रोतों तक पहुंच सकती हैं। यानी प्रदूषण केवल हवा की समस्या नहीं है, बल्कि हवा, पानी और मिट्टी—तीनों स्तरों पर इसके प्रभाव को समझने की जरूरत है.15-25 साल बाद स्थिति और भयावह होने की आशंकाप्रो. सिंह ने चेतावनी दी कि यदि प्रदूषण को लेकर समाज में जागरूकता नहीं बढ़ाई गई और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले 15 से 25 वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है. उन्होंने कहा कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है.ALSO READ : बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगानपहली कक्षा से बच्चों को दी जाए प्रदूषण की जानकारीप्रदूषण की रोकथाम के उपायों पर उन्होंने सबसे पहले जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया. उनका कहना है कि बच्चों को कम उम्र से ही प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में बताया जाना चाहिए. कक्षा एक से ही पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े विषयों को व्यवहारिक तरीके से समझाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी प्रदूषण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर अपनी भी जिम्मेदारी समझे.विशेषज्ञ का संदेश साफ है—शहर की हवा केवल मौसम से नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली, ट्रैफिक, निर्माण, कचरा प्रबंधन और जागरूकता से भी तय होती है. ऐसे में वाराणसी की गिरती रैंकिंग को महज आंकड़ा मानने के बजाय प्रदूषण के स्रोतों पर तत्काल काम करने की जरूरत है.
बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगान
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वाराणसी : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में चल रहे हिंदी माह-2026 के तहत शनिवार को विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षण कार्मिकों के लिए स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। समिति कक्ष में आयोजित प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने अपनी मौलिक कविताओं के माध्यम से हिंदी, भारतवर्ष, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, काशी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विशेषताओं का भावपूर्ण वर्णन किया।प्रतियोगिता में कुल 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ करते हुए हिंदी भाषा के प्रति समर्पण और गौरव की भावना व्यक्त की। कविताओं में भारत की विविधता, काशी की सांस्कृतिक विरासत और महामना के योगदान को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। प्रतिभागियों ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को महामना के अभूतपूर्व प्रयासों का परिणाम बताते हुए इसे ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखने वाला संस्थान बताया।प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में प्रो. वशिष्ठ अनूप, डॉ. संजीव सराफ और प्रो. उर्वशी गहलौत शामिल रहे। निर्णायक मंडल ने प्रतिभागियों की कविताओं, प्रस्तुति और विषयवस्तु के आधार पर मूल्यांकन किया।कार्यक्रम के दौरान हिंदी अधिकारी डॉ. शिव कुमार त्रिपाठी ने निर्णायक मंडल के सदस्यों को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश सिंह ने किया, जबकि अंशुमान पटेल ने धन्यवाद ज्ञापित किया।ALSO READ : सुब्रतो कप में यूपी का दम दिखाएगी वाराणसी की टीमकार्यक्रम को सफल बनाने में सहायक कुलसचिव विकास कुमार, रामजी त्रिपाठी, कीर्ति शंकर दुबे, रागिब हुसैन और रोहित आनंद का सहयोग रहा।