भारत अध्ययन की परंपरा पर राष्ट्रीय कार्यशाला में गोपीनाथ कविराज और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के चिंतन पर हुआ विमर्श.

वाराणसी : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पंद्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला ‘भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ’ के अंतर्गत प्रथम दिन दो महत्वपूर्ण बौद्धिक सत्र आयोजित किए गए। पहले सत्र में ‘पंडित गोपीनाथ कविराज की सारस्वत साधना’ विषय पर वाराणसी के प्रख्यात विद्वान एवं दर्शन विभाग, सागर विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अंबिका दत्त शर्मा ने व्याख्यान दिया।
दूसरे सत्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के डॉ. विवेक सिंह ने ‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर और भारत का सभ्यतामूलक विमर्श’ विषय पर विचार रखे।

प्रो. अंबिका दत्त शर्मा ने कहा कि पंडित गोपीनाथ कविराज भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे विलक्षण मनीषी थे, जिनके व्यक्तित्व में व्यापक शास्त्रीय विद्वत्ता और गहन साधना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने भारतीय दर्शन को केवल बौद्धिक चिंतन का विषय नहीं माना, बल्कि उसे जीवन के रूपांतरण और साधना का माध्यम बनाया।
प्रो. शर्मा ने कहा कि गोपीनाथ कविराज ऐसे समय में सक्रिय हुए, जब बंग-भंग आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना अपने उत्कर्ष पर थी। इसके बावजूद उन्होंने प्रत्यक्ष राजनीतिक आंदोलन के बजाय भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन और साधना को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। उनके लिए राजनीतिक स्वराज्य से अधिक महत्वपूर्ण ‘ज्ञानात्मक स्वराज्य’ था। उनका मानना था कि भारत को समझने के लिए उसकी अपनी ज्ञान परंपराओं, शास्त्रों और साधना पद्धतियों के भीतर प्रवेश करना आवश्यक है।
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प्रो. शर्मा ने सरस्वती भवन पुस्तकालय के साथ कविराज के जुड़ाव को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक सरस्वती भवन के पुस्तकालयाध्यक्ष रहते हुए कविराज ने दुर्लभ ग्रंथों और पांडुलिपियों के अध्ययन के माध्यम से भारतीय दर्शन, योग और तंत्र के विभिन्न पक्षों को गहराई से समझा।
उन्होंने कहा कि कविराज के लिए पुस्तकालय महज पुस्तकों का संग्रह नहीं था, बल्कि भारतीय ज्ञान-संपदा में प्रवेश का द्वार था। इसी अध्ययन और साधना के क्रम में उन्होंने भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराओं में अंतर्निहित समन्वयकारी तत्वों को समझने का प्रयास किया।
प्रो. शर्मा ने कहा कि भारतीय दर्शन को केवल पश्चिमी अर्थों में बौद्धिक जिज्ञासा का परिणाम मानना उचित नहीं है। भारतीय दर्शन में ऋषियों की अनुभूति, श्रुति, आगम और साधना से प्राप्त ज्ञान का भी महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय दर्शन सिद्धांत भी है और साधना भी, थ्योरी भी है और थेरेपी भी। इसका उद्देश्य केवल संसार की व्याख्या करना नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन का रूपांतरण करना है।
कार्यशाला के दोनों सत्रों में विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा भारत अध्ययन में रुचि रखने वाले प्रतिभागी हाइब्रिड माध्यम से शामिल हुए। सत्रों में भारतीय ज्ञान परंपरा, दर्शन, साहित्य, सभ्यता, शिक्षा, मानवता और सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न आयामों पर सार्थक चर्चा हुई।



