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ई- रिक्शा बना महिलाओँ के आत्मनिर्भर बनने का सहारा

Mar 08, 2026, 09:29 AM
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Posted By Gaandiv

वाराणसी. आज के दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं . शिक्षा , खेल , प्रशासन से लेकर हर क्षेत्र में उनकी भागेदारी बढ़ रही है . इसके बावजूद समाज में कई महिलाये ऐसी है जो आर्थिक मजबूरियों के कारण घर की चार दीवारी तक सिमित रह जाती है . ऐसे में एक्सेस डेवलपमेंट सर्विसेस ने इन महिलाओ को नई दिशा दी है


संस्था महिलाओ को निःशुल्क ई- रिक्शा देकर उन्हें रोजगार के अवसर दे रही है इसके साथ ही महिलाओ को वाहन चलना भी सिखाया जाता है और साथ ही साथ ड्राइविंग लइसेंस दिलाने में भी मदद की जाती है . इस पहल का मकसद बस महिलाओ को रोजगार देना नहीं बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाना भी है ताकि वो अपने पैरों पर खड़े हो कर आत्मसम्मान के साथ जीवन जी सके .


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इस पहल से जुड़ कर आज कई महिलाये इससे अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रही है . पहले जो महिलाएं दूसरों पर निर्भर थी आज वही महिलाएं अपना और अपने परिवार की जिम्मेदारी उठा कर गर्व महसूस कर रही है .


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कई महिलाओ ने कहा की शुरुआत में समाज के लोगो से उनको ताने भी सुनने को मिला पर उन्होंने हार नहीं मानी और अपना काम जारी रखा तो वही कई महिलाओ का ये भी कहना था की पहले उन्होंने बिना किसी की मदत के रिक्शा चलाना सीखा परिवार में इसका कई लोगो ने विर्रोध भी किया तो वही कई लोगो ने साथ भी दिया था . आज वही महिलाएं सड़क पर रिक्शा चला कर अपनी पहचान बना रही और आत्मनिर्भर बन रही है . महिलाओ का मन्ना है की रिक्शा चलाना उनके लिए केवल रोजगार नहीं आत्मसम्मान का भी माध्यम बन गया है कई लोग उन्हें देख कर प्रोत्साहित करते है और कहते है की महिलाओ को ऐसे आगे बढ़ाते देख उन्हें काफी गर्व महसूस होता है हलाकि कई लोग इसकी आलोचना भी करते है पर महिलाओ का कहना है की आगे बढ़ने के लिए ऐसी बातो को नजरअंदाज करना बेहतर है .


आज यह पहल कई महिलाओ के जीवन में बड़ा बदलाव ला रही है . इ रिक्शा की मदत से महिलाएं न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही है , बल्कि समाज में एक नई मिशाल भी पेश कर रही है . यह पहल दिखता है की अगर सही अवसर और सहयोग मिले तो महिलाये किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रहेंगी

सुब्रतो कप में यूपी का दम दिखाएगी वाराणसी की टीम
सुब्रतो कप में यूपी का दम दिखाएगी वाराणसी की टीम
वाराणसी : मैदान वही होगा, मुकाबला अंतरराष्ट्रीय स्तर का और चुनौती देश-विदेश की टीमों से. ऐसे में वाराणसी के युवा फुटबॉलरों के पास अपनी प्रतिभा दिखाने का बड़ा मौका है. 65वें सुब्रतो कप इंटरनेशनल फुटबॉल टूर्नामेंट में विकास इंटर कॉलेज की अंडर-17 बालक टीम उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करेगी. नई दिल्ली के अंबेडकर स्टेडियम में 15 सितंबर से शुरू होने वाली प्रतियोगिता के लिए टीम 13 सितंबर को रवाना होगी.प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन के लिए विकास इंटर कॉलेज की टीम ने जमकर पसीना बहाया है.शुक्रवार को 15 दिवसीय विशेष प्रशिक्षण शिविर का समापन हुआ। शिविर में खिलाड़ियों को कोच रशीद अनवर ने प्रशिक्षण दिया। इस दौरान खिलाड़ियों की तकनीक, पासिंग, गोल करने की क्षमता, फिटनेस और मैच की रणनीति पर विशेष जोर दिया गया.चिप शॉट से थ्रू पास तक पर जोरप्रशिक्षण शिविर में खिलाड़ियों को मैच की छोटी-छोटी बारीकियों से रूबरू कराया गया. विपक्षी खिलाड़ी को चकमा देकर चिप शॉट कब और किस स्थिति में लगाना है, इसका विशेष अभ्यास कराया गया. इसके अलावा साइड पास और थ्रू पास के दौरान गेंद की गति, दिशा और समय का ध्यान रखने की तकनीक भी सिखाई गई.मैच के दौरान अगर मुकाबला बराबरी पर खत्म होता है तो पेनल्टी शूटआउट भी निर्णायक हो सकता है. इसे देखते हुए खिलाड़ियों को पेनल्टी शूट लेने की तकनीक के साथ मानसिक रूप से दबाव संभालने का भी अभ्यास कराया गया. टीम प्रबंधन ने संभावित पेनल्टी शूटआउट के लिए खिलाड़ियों की भूमिका और क्रम पर भी तैयारी की है.ALSO READ : पिता की नगरी में विराजेंगे पुत्र गजानन, सोमवार को स्थापित होगी लालबाग के राजा की प्रतिमूर्तिउत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलने से टीम के खिलाड़ियों में खासा उत्साह है. 15 दिन के शिविर के दौरान खिलाड़ियों ने कठिन अभ्यास के साथ टीम गेम पर भी विशेष ध्यान दिया। अब टीम दिल्ली में अपने प्रदर्शन को लेकर तैयार है.विकास एजुकेशनल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. एके सिंह ने कहा कि टीम ने प्रतियोगिता के लिए पूरी मेहनत की है. हमारा प्रयास है कि खिलाड़ी दिल्ली में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करें और उत्तर प्रदेश के साथ वाराणसी का नाम भी रोशन करें.
पिता की नगरी में विराजेंगे पुत्र गजानन, सोमवार को स्थापित होगी लालबाग के राजा की प्रतिमूर्ति
पिता की नगरी में विराजेंगे पुत्र गजानन, सोमवार को स्थापित होगी लालबाग के राजा की प्रतिमूर्ति
वाराणसी : काशी में एक बार फिर महाराष्ट्र की गणेश भक्ति की झलक देखने को मिलेगी। श्रीकाशी मराठा गणेश उत्सव समिति की ओर से 18वां श्रीगणेश उत्सव सोमवार से ठठेरी बाजार स्थित शेरवाली कोठी में शुरू होगा। पांच दिवसीय उत्सव के पहले दिन मुंबई के सुप्रसिद्ध लालबाग के राजा की प्रतिमूर्ति को मराठी परंपरा के अनुसार विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद स्थापित किया जाएगा। प्रतिमूर्ति रविवार को मुंबई से वाराणसी पहुंचेगी। आयोजन स्थल को भव्य तरीके से सजाया जा रहा है।सोमवार को सुबह गणेश भगवान की स्थापना और पूजा-अर्चना के साथ उत्सव की शुरुआत होगी। सुबह और रात नौ बजे महाआरती होगी। शाम छह बजे सुप्रसिद्ध भजन गायिका पूजा पांड्या भजनों की प्रस्तुति देंगी। इसके बाद शाम सात बजे जय पांडेय अपने साथियों के साथ भजन प्रस्तुत करेंगे।15 सितंबर को सुबह महाआरती के बाद शाम पांच बजे फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता और छह बजे 15 वर्ष तक के बच्चों की डांस प्रतियोगिता होगी। 16 सितंबर को शाम पांच बजे चित्रकला, छह बजे मेहंदी प्रतियोगिता और रात आठ बजे कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम होगा। 17 सितंबर को शाम पांच बजे हल्दी-कुमकुम, छह बजे विजय वाल्मीकि ग्रुप की झांकी और शाम 7:30 बजे छत्रपति शिवाजी महाराज सम्मान समारोह आयोजित होगा।ALSO READ : तिब्बती चिकित्सा ग्लोबल वेलनेस इंडस्ट्री का बनेगी हिस्सा: राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने जताई उम्मीद.18 सितंबर को सुबह नौ बजे महाआरती के बाद दोपहर 12 बजे भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी और गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। शोभायात्रा में महाराष्ट्र से आया 80 सदस्यीय दल विशेष प्रस्तुति देगा। समिति के अनुसार छह फीट ऊंची प्रतिमूर्ति मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से तैयार की गई है।समारोह के संचालन के लिए समिति में वरिष्ठ संरक्षक माणिक राव पाटिल, संरक्षक संतोष पाटिल व सुहास पाटिल, अध्यक्ष आनंद राव सूर्यवंशी, महामंत्री अन्ना मोरे, कोषाध्यक्ष हनुमान शिंदे, उपाध्यक्ष रवि सेठ, कार्यक्रम संयोजक चक्रवर्ती विजय नावड़ और मीडिया प्रभारी डॉ. कैलाश सिंह विकास समेत अन्य पदाधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। समिति ने श्रद्धालुओं से पांच दिवसीय गणेश उत्सव में शामिल होने की अपील की है।
तिब्बती चिकित्सा ग्लोबल वेलनेस इंडस्ट्री का बनेगी हिस्सा: राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने जताई उम्मीद.
तिब्बती चिकित्सा ग्लोबल वेलनेस इंडस्ट्री का बनेगी हिस्सा: राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने जताई उम्मीद.
वाराणसी। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन और केंद्रीय तिब्बती प्रशासन, धर्मशाला के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन अतिश सभागार में हुआ। समापन सत्र में विशेषज्ञों ने उम्मीद जताई कि करीब 2500 वर्ष पुरानी तिब्बती चिकित्सा पद्धति सोवा-रिग्पा आने वाले समय में वैश्विक वेलनेस इंडस्ट्री का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इसके लिए चिकित्सा पद्धति को वैज्ञानिक प्रमाण, मानकीकरण और संसाधनों के संरक्षण के साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।संस्थान की कुलसचिव डॉ. सुनीता चंद्रा ने कहा कि संस्थान के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी का आयोजन यहां हुआ। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में भारत सरकार ने सोवा-रिग्पा को आयुष की छठी स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता दी। इससे पहले इसका प्रयोग मुख्य रूप से लद्दाख, लाहौल-स्पीति, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, दार्जिलिंग और धर्मशाला जैसे हिमालयी क्षेत्रों में होता था।उन्होंने बताया कि सारनाथ स्थित केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में 45 बेड का यूथोक सोवा-रिग्पा मेडिकल कॉलेज एवं चिकित्सालय तैयार हो चुका है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि कैंसर, ऑटोइम्यून और मेटाबॉलिक जैसी बीमारियों में केवल एलोपैथी पर निर्भरता पर्याप्त नहीं है। ऐसे में तिब्बती चिकित्सा का ‘मन-शरीर-आत्मा’ आधारित समग्र दृष्टिकोण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।मानकीकरण से बढ़ेगी दवाओं की विश्वसनीयतामुख्य वक्ता सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन, धर्मशाला के अध्यक्ष डॉ. थुपतेन कुनफेल ने कहा कि सोवा-रिग्पा अब केवल तिब्बती समुदाय की चिकित्सा पद्धति नहीं रह गई है, बल्कि इसे भारत की ज्ञान परंपरा के रूप में भी देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में इसे सिद्धा पद्धति के साथ आयुष कॉलेजों में पढ़ाया जा रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित अमची चिकित्सक तैयार होंगे।उन्होंने कहा कि इस चिकित्सा पद्धति के सामने सबसे बड़ी चुनौती दवाओं का मानकीकरण रही है। अब लेह और वाराणसी स्थित संस्थानों में फार्माकोपिया, क्वालिटी कंट्रोल लैब और हर्बल गार्डन विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है। इससे दवाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बढ़ेगी तथा भविष्य में इनके निर्यात की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।डॉ. कुनफेल ने कहा कि सोवा-रिग्पा को भविष्य में एलोपैथी के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि उसके पूरक चिकित्सा पद्धति के रूप में देखा जाना चाहिए। खासकर क्रॉनिक और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।ALSO READ : सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया के बीच सिर्फ व्यापार नहीं, डीएनए का भी नाता था: प्रो. ज्ञानेश्वर चौबेजीवनशैली में सुधार को बताया भविष्य की पहली दवासमापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी ने कहा कि आधुनिक दुनिया लंबे समय तक चलने वाले तनाव, चिंता, ऑटोइम्यून समस्याओं और असंतुलित जीवनशैली से जूझ रही है। ऐसे में केवल एक अंग के इलाज के बजाय शरीर को समग्र रूप से स्वस्थ रखने का दृष्टिकोण जरूरी है।उन्होंने कहा कि तिब्बती चिकित्सा का भविष्य किसी एक दवा में नहीं, बल्कि उसके समग्र दृष्टिकोण में है। भविष्य की चिकित्सा केवल मशीनों की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि जीवनशैली भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। आहार और व्यवहार में सुधार के साथ औषधि एवं बाह्य उपचार के माध्यम से स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने पर जोर दिया जाना चाहिए।कार्यक्रम में सोवा-रिग्पा विभागाध्यक्ष डॉ. टाशी दावा ने स्वागत भाषण दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन संकाय प्रमुख डॉ. दोर्जे दमदुल ने किया। समापन सत्र में देश के विभिन्न हिस्सों से आए सैकड़ों प्रतिभागियों ने सहभागिता की।