होलिका दहन में 'रेढ़' का महत्व और औषधीय गुण: जानिए क्यों खास है गांवों का पारंपरिक विधि-विधान

वाराणसी: आधुनिकता के इस दौर में जहाँ त्योहार अब केवल सोशल मीडिया पोस्ट और औपचारिकता तक सिमटते जा रहे हैं, वहीं देश के ग्रामीण इलाकों में आज भी होली अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है.गांवों में होलिका दहन से लेकर रंग खेलने तक की परंपराएं आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती हैं.
'रेढ़' से होती है शुद्ध शुरुआत

वाराणसी के स्थानीय निवासी अभिषेक गुप्ता ने ग्रामीण होली की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि होलिका दहन की प्रक्रिया में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है. उन्होंने बताया, "होलिका दहन की शुरुआत सबसे पहले 'रेढ़' (एक प्राकृतिक वनस्पति) लगाने से होती है, जिसे सबसे शुद्ध माना जाता है. इसके साथ गोइठा (उपले), कपूर और देसी घी का मिश्रण अग्नि को समर्पित किया जाता है."
क्या है 'रेढ़'?
अभिषेक के अनुसार, रेढ़ एक औषधीय वनस्पति है जिसकी कई स्थानों पर खेती भी की जाती है. इसका उपयोग जड़ी-बूटी के रूप में होता है और होलिका दहन में इसका प्रयोग वातावरण को शुद्ध करने के लिए किया जाता है.
ठंडाई और भांग: मिटते हैं आपसी मतभेद
गांवों में होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि आपसी गिले-शिकवे दूर करने का जरिया है. उत्सव के दौरान पटाखे जलाए जाते हैं और घर-घर में भांग पीसकर ठंडाई तैयार की जाती है. अभिषेक कहते हैं कि मिल-बांटकर ठंडाई पीने से आपसी मतभेद कम होते हैं और भाईचारा बढ़ता है. शाम को 'होली मिलन' के दौरान ग्रामीण एक-दूसरे की समस्याओं को साझा करते हैं और यथासंभव मदद का हाथ बढ़ाते हैं.
पकवानों की खुशबू और बदलता दौर
होली के खान-पान पर चर्चा करते हुए अमित सिंह ने बताया कि गांवों में आज भी पारंपरिक गुजिया, आलू के पापड़ और मूंग की पापड़ मुख्य आकर्षण होते हैं. बड़े-बुजुर्गों और युवाओं की टोली साथ मिलकर भांग की ठंडाई तैयार करती है, जो उत्सव के आनंद को दोगुना कर देती है.
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बढ़ती जिम्मेदारियां और लुप्त होते बैंड-बाजे
हालांकि, बदलते समय के साथ कुछ परंपराएं फीकी भी पड़ रही हैं. अविनाश पटेल ने चिंता जताते हुए कहा, "पहले लोग बैंड-बाजे के साथ पूरे गांव का भ्रमण करते थे, लेकिन आज का युवा इन परंपराओं से दूर होता जा रहा है."
उन्होंने इसके पीछे का कारण 'जिम्मेदारी' को बताया. शिक्षा और रोजगार के लिए बाहर गए युवा त्योहारों पर घर नहीं लौट पाते. परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य पर काम का बोझ इतना अधिक है कि वे चाहकर भी होली के उल्लास का पूरा आनंद नहीं ले पा रहे हैं.



