BHU महिला महाविद्यालय में ‘सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से काशी’ विषयक सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ

वाराणसी: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय में मंगलवार को ‘सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से काशी’ विषयक सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ, 24 अगस्त तक चलने वाली इस राष्ट्रीय कार्यशाला में काशी की बहुआयामी सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पक्षों पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान एवं विचार-विमर्श किया जाएगा. कार्यशाला में काशी के प्राचीन मंदिरों, स्थापत्य कला, चित्रकला, जैन एवं बौद्ध विरासत, जल-तीर्थों, संग्रहालयों और सांगीतिक विरासत समेत विभिन्न विषयों पर चर्चा होगी.
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि सांस्कृतिक विरासत कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि निरंतरता और परिवर्तन की जीवंत प्रक्रिया है. समय के साथ इसमें नई धाराएं जुड़ती रहती हैं. और सांस्कृतिक प्रवाह की दिशा भी बदलती रहती है. उन्होंने कहा कि ऐसे अकादमिक आयोजनों की पहुंच अधिक से अधिक विद्यार्थियों, शोधार्थियों और काशी की सांस्कृतिक विरासत में रुचि रखने वाले लोगों तक होनी चाहिए. इसके लिए सोशल मीडिया और ई-मेल जैसे आधुनिक संचार माध्यमों का प्रभावी उपयोग किया जाना जरूरी है.
कुलपति ने कहा कि किसी अच्छे अकादमिक कार्यक्रम की सफलता इस बात से तय होती है, कि प्रतिभागी वहां से कोई नई समझ, नया विचार या नया प्रश्न लेकर लौटता है, उन्होंने शोध के महत्व पर कहा कि किसी शोध का मूल्य केवल उसके तत्काल लाभ से नहीं आंका जाना चाहिए, ईमानदारी, अकादमिक प्रतिबद्धता और नैतिक दृष्टिकोण के साथ किया गया शोध भविष्य में ज्ञान की नई संभावनाओं को जन्म देता है.
कार्यक्रम में कला इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. मारुति नंदन प्रसाद तिवारी ने बीजवक्तव्य दिया, उन्होंने काशी की सांस्कृतिक विरासत को ज्ञान, भक्ति और आत्मबोध से जोड़ते हुए कहा कि काशी ऐसा स्थान है, जहां व्यक्ति को अपने भीतर के प्रकाश को पहचानने के अनेक अवसर मिलते हैं. काशी की विरासत को केवल ऐतिहासिक स्थलों और स्मारकों के माध्यम से नहीं, बल्कि उनके पीछे निहित ज्ञान, चिंतन और जीवन-दृष्टि के माध्यम से समझना आवश्यक है.
उन्होंने कहा कि काशी की सांस्कृतिक चेतना व्यक्ति को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाती है. ‘हम’ की भावना से समष्टि और सर्वकल्याण का भाव विकसित होता है, काशी के घाटों को एक माला के समान बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक घाट की अपनी विशिष्ट पहचान है, लेकिन सभी घाट मिलकर काशी की समग्र सांस्कृतिक पहचान का निर्माण करते हैं.
प्रो. तिवारी ने काशी के शिव मंदिरों में पंचदेव परंपरा, यहां की उत्सवधर्मिता, संत कबीर और तुलसीदास की परंपरा तथा काशी-नेपाल के सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख किया, उन्होंने कहा कि भक्ति की वास्तविक अनुभूति तभी होती है, जब व्यक्ति अपने आराध्य के गुणों और आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करे, काशी की विरासत व्यक्ति को ज्ञान, भक्ति, सेवा, समरसता और सर्वकल्याण की प्रेरणा देती है.
महिला महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. रीता सिंह ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि काशी केवल देखी नहीं जाती, बल्कि इसे महसूस और जिया जाता है. उन्होंने कहा कि काशी विविधता में एकता का जीवंत स्वरूप है, जहां धर्म, दर्शन, साहित्य, संगीत, कला और लोकजीवन की अनेक परंपराएं एक साथ मौजूद हैं,
कार्यशाला की संयोजिका एवं महिला महाविद्यालय के कला इतिहास विभाग की डॉ. आभा मिश्रा पाठक ने कहा कि काशी की धार्मिक, साहित्यिक, कलात्मक, स्थापत्य, सांगीतिक और लोक परंपराएं इसकी जीवंत सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, उन्होंने कहा कि काशी की विरासत केवल स्मारकों और ऐतिहासिक स्थलों में नहीं, बल्कि यहां के लोगों के दैनिक जीवन, भाषा, खान-पान, कला, संगीत और धार्मिक परंपराओं में भी जीवित है.
कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर ‘सांस्कृतिक पर्यटन की दृष्टि से काशी’ पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया, पुस्तक के लेखक डॉ. आभा मिश्रा पाठक और डॉ. रामबाबू श्रीवास्तव हैं, पुस्तक में काशी की सांस्कृतिक विरासत तथा सांस्कृतिक पर्यटन से जुड़े विभिन्न आयामों को प्रस्तुत किया गया है.
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आयोजकों के अनुसार, सात दिवसीय कार्यशाला के दौरान काशी के प्राचीन मंदिरों, स्थापत्य कला, चित्रकला, जैन एवं बौद्ध विरासत, जल-तीर्थों, संग्रहालयों तथा काशी की सांगीतिक परंपरा सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञ अपने विचार रखेंगे, कार्यशाला का उद्देश्य काशी की विरासत को व्यापक अकादमिक दृष्टि से समझने के साथ नई पीढ़ी को इससे जोड़ना भी है.
कार्यक्रम का संचालन डॉ. धीरज कुमार मिश्रा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. धीरेंद्र नाथ चौबे ने प्रस्तुत किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार राजन श्रीवास्तव समेत शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे.



