दोस्ती के बावजूद अमेरिका से फाइटर जेट क्यों नहीं खरीदता भारत?...

Fighter Jet: मिडिल ईस्ट में चल रही जंग में जहाँ ईरान के आसमान में अमेरिकी फाइटर जेट उड़ रहे है. अमेरिकी F/A-18 सुपर हॉर्नेट न्यूक्लियर पावर वाले एयरक्राफ्ट उड़ रहे हैं; F-15E स्ट्राइक ईगल गल्फ बेस से उड़ रहे हैं; F-16 लगातार कॉम्बैट एयर डिफेंस मिशन पर हैं. वहीँ, ईरान अमेरिका के कई फाइटर जेट को मार गिरा दे रहा है. इन सब के बीच अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि, भारत दूसरे देशों से फाइटर जेट खरीदता है लेकिन अमेरिका से क्यों नहीं?...
भारत अमेरिका से क्यों नहीं खरीदता लड़ाकू विमान

बता दें कि, भारत के अमेरिका से फाइटर जेट न खरीदने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि, शीत युद्ध का दौरान अमेरिका ने भारत को छोड़ पाकिस्तान को हथियार दिए थे. सिर्फ राइफल और टैंक नहीं, बल्कि फ्रंटलाइन फाइटर एयरक्राफ्ट भी. इनमें F-86 सेबर, F-104 स्टारफाइटर, F-86D और A-37 जैसे फाइटर जेट्स हैं.
इतना ही नहीं इसके बाद , सबसे जरूरी, F-16 फाइटिंग फाल्कन, जो अब तक बने सबसे काबिल, कॉम्बैट-प्रूवन मल्टीरोल फाइटर्स में से एक था, उसे भी अमेरिका ने पाकिस्तान को दिया जो उसने उड़ाए. पाकिस्तान ने इन जेट्स से जंग लड़ी, वो भी भारत के खिलाफ.

न्यूक्लियर टेस्ट और अमेरिका का बैन
इतना ही नहीं इसके पीछे एक बड़ी वजह 1998 में भारत का न्यूक्लियर टेस्ट था.न्यूक्लियर टेस्ट के बाद क्लिंटन एडमिनिस्ट्रेशन ने बैन लगाया और भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर रोक लगा दी. इस घटना ने भारत के स्ट्रेटेजिक सिस्टम में ज़रूरी डिफेंस कैपेबिलिटी के लिए विदेशी सप्लायर पर डिपेंडेंस को लेकर चिंता को और बढ़ा दिया.
सोवियत के करीब पहुंचा भारत...
वहीँ, अमेरिका के इस फैसले के बाद भारत ने विमान खरीदने से मना कर दिया और सोवियत संघ यानी रूस से लड़ाकू विमान खरीदने शुरू किए. भारत ने रूस से मिग-21, मिग-23, मिग-29, सुखोई-30MKI खरीदे जो अभी भी भारतीय वायुसेना की रीढ़ है.इसके बाद भारत ने गुपचुप तरीके से ब्रिटिश-फ्रेंच जगुआर फ्रेंच मिराज 2000, ब्रिटिश हॉकर हंटर्स लिए लेकिन अमेरिका से दूरी बनाए रखी.
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अमेरिका से दूरी बनाता रहा भारत...
इस पीढ़ी में अमेरिका लड़ाकू विमानों का सबसे बड़ा जमावड़ा है. यह एक लाइव वॉरटाइम फुल-ड्रेस रिहर्सल है. दिलचस्प बात यह है कि पिछले 20 सालों में आसमान में आप जो भी अमेरिकी लड़ाकू विमान देख रहे हैं, उनमें से लगभग हर एक कभी न कभी भारत को ऑफर किया गया. लेकिन हर बार भारत ने उन्हें खरीदने से मना कर दिया.




