विश्व आदिवासी दिवस पर BHU में हुआ बौद्धिक कार्यक्रम, वक्ताओं ने कहा- प्रकृति और संस्कृति की रक्षा के बिना विकास अधूरा

वाराणसी : विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में आदिवासी समाज, उसकी संस्कृति, भाषा, प्रकृति से जुड़ाव और वर्तमान चुनौतियों को लेकर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम में आदिवासी समाज के इतिहास, संस्कृति और अधिकारों पर विस्तार से चर्चा हुई, वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज को लंबे समय से जिस नजरिए से देखा और प्रस्तुत किया गया है, उसके बजाय उसकी संस्कृति, सामूहिक जीवन-पद्धति और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण को समझने की आवश्यकता है.
कार्यक्रम के आयोजक डॉ. राजकुमार मीना ने बताया कि BHU में लगातार तीसरे वर्ष विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन किया जा रहा है, उन्होंने कहा कि यह आयोजन मुख्य रूप से विद्यार्थियों की पहल का परिणाम है, बच्चों ने उनसे कहा कि इस वर्ष भी कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए, जिसके बाद आयोजन की रूपरेखा तैयार की गई. उन्होंने बताया कि पिछले दो वर्षों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर अधिक जोर रहा, लेकिन इस बार अतिथियों से आग्रह किया गया .कि कार्यक्रम को बौद्धिक विमर्श का स्वरूप दिया जाए, ताकि आदिवासी समाज से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो सके.

डॉ. मीना ने कहा कि आदिवासी समुदाय मूल रूप से शांति और सामूहिकता में विश्वास रखने वाला समाज है. वह सत्ता पर एकाधिकार के बजाय सामूहिक सत्ता और सहभागिता का समर्थक रहा है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को कई बार आक्रामक समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि उसके इतिहास और संस्कृति को समझने पर तस्वीर इससे अलग दिखाई देती है.
कार्यक्रम में प्रो. श्रद्धा सिंह ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मान्यता दी है, उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा की बात करता आया है और इसके लिए संघर्ष भी करता रहा है, उन्होंने कहा कि भारत का वास्तविक और समावेशी विकास तभी संभव है, जब आदिवासी समाज के संकल्प और उसकी प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि को समझते हुए आगे बढ़ा जाए.
उन्होंने आदिवासी साहित्य को लेकर भी अपनी बात रखी. प्रो. श्रद्धा सिंह ने कहा कि आदिवासी साहित्य को अक्सर केवल ‘प्रतिरोध का साहित्य’ कहकर सीमित कर दिया जाता है, जबकि इसमें संस्कृति, परंपरा, प्रकृति और जीवन मूल्यों को बचाने की गहरी चिंता दिखाई देती है. आदिवासी साहित्य की संवेदनशीलता और सौंदर्य को व्यापक समाज तक पहुंचाने की जरूरत है.मुख्य अतिथि अश्वनी कुमार पंकज ने आदिवासी समाज के इतिहास और स्थानीय संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि कार्यक्रम के लिए जिस धरती पर लोग एकत्र हुए हैं, उसका भी आदिवासी इतिहास रहा है. उन्होंने मांडूआडीह का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्षेत्र का आदिवासी समाज के लिए विशेष महत्व रहा है .और यहां आदिवासी समुदाय के लोगों ने अपने स्तर पर गांव बसाया था.

उन्होंने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस आदिवासी समाज का अपना दिवस है और इसे अपनी संस्कृति तथा अपनी सोच के अनुसार मनाया जाना चाहिए. उन्होंने लोगों से अपील की कि वे केवल औपचारिकता के लिए तालियां न बजाएं, बल्कि अपने मन की बात खुलकर रखें. उनके अनुसार अपनी संस्कृति और पहचान के साथ खड़े होना ही औपनिवेशिक मानसिकता के खिलाफ वास्तविक संघर्ष है.
अश्वनी कुमार पंकज ने अंडमान और निकोबार के आदिवासी समुदायों का उदाहरण देते हुए विकास की अवधारणा पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि अंडमान-निकोबार में आदिवासी समुदायों के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास और टाउनशिप निर्माण की योजनाओं पर चर्चा हो रही है. सवाल यह है कि प्रकृति और आदिवासी जीवन को प्रभावित करने वाले ऐसे फैसले लेने का अधिकार किसे है, उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर प्रकृति को उजाड़ने की प्रवृत्ति पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.
उन्होंने कहा कि जिस तरह सांप को दुनिया से समाप्त नहीं किया जा सकता, उसी तरह भारत की लगभग छह प्रतिशत आबादी वाले आदिवासी समाज को भी समाप्त नहीं किया जा सकता. आदिवासी समाज की अपनी पहचान, संस्कृति और जीवन पद्धति है, जिसे विकास के नाम पर मिटाया नहीं जा सकता.उन्होंने आदिवासी समाज की सामाजिक व्यवस्था की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां वृद्धावस्था को लेकर आज के समाज जैसी अलगावपूर्ण व्यवस्था नहीं रही है. आदिवासी जीवन पद्धति में बुजुर्गों और समुदाय के बीच मजबूत सामाजिक संबंध देखने को मिलते हैं.
विशिष्ट अतिथि वंदना टेटे ने आदिवासी भाषाओं और संस्कृति की विविधता पर प्रकाश डाला, उन्होंने कहा कि अक्सर लोग कहते हैं. कि आदिवासी की भाषा समझ में नहीं आती, लेकिन यह समझने की जरूरत है. कि आदिवासी भाषाओं में केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि ध्वनियों का भी अपना अर्थ होता है. उन्होंने कहा कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक अनेक आदिवासी भाषाएं बोली जाती हैं, जो देश की सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
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वंदना टेटे ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में आदिवासी समाज के बारे में अपेक्षित जानकारी उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के पुरखों ने आने वाली पीढ़ियों को उनकी संस्कृति, विरासत और जीवन मूल्यों को समझने की सीख दी है, आज आवश्यकता है कि लोग स्वयं तय करें कि उनके लिए क्या उचित है और अपनी संस्कृति तथा पहचान को किस तरह संरक्षित रखना है.उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति का उपासक है. उसके लिए प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है, इसलिए प्रकृति का सम्मान करना और उसकी रक्षा करना सभी की जिम्मेदारी है.
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने आदिवासी समाज के इतिहास, संस्कृति, भाषा, साहित्य, प्रकृति से उसके संबंध और आधुनिक विकास मॉडल से उत्पन्न चुनौतियों पर विचार साझा किए. वक्ताओं ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस को केवल एक औपचारिक आयोजन तक सीमित न रखकर आदिवासी समाज की आवाज, उसकी संस्कृति और उसके अधिकारों को समझने तथा सम्मान देने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए.कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही. आयोजन का उद्देश्य आदिवासी समाज को लेकर प्रचलित धारणाओं पर संवाद स्थापित करना और विद्यार्थियों को आदिवासी इतिहास, साहित्य, संस्कृति तथा प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि से परिचित कराना रहा.



