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विश्व आदिवासी दिवस पर BHU में हुआ बौद्धिक कार्यक्रम, वक्ताओं ने कहा- प्रकृति और संस्कृति की रक्षा के बिना विकास अधूरा

विश्व आदिवासी दिवस पर BHU में हुआ बौद्धिक कार्यक्रम, वक्ताओं ने कहा- प्रकृति और संस्कृति की रक्षा के बिना विकास अधूरा
Aug 13, 2026, 09:50 AM
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Posted By Niharika dwivedi

वाराणसी : विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में आदिवासी समाज, उसकी संस्कृति, भाषा, प्रकृति से जुड़ाव और वर्तमान चुनौतियों को लेकर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम में आदिवासी समाज के इतिहास, संस्कृति और अधिकारों पर विस्तार से चर्चा हुई, वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज को लंबे समय से जिस नजरिए से देखा और प्रस्तुत किया गया है, उसके बजाय उसकी संस्कृति, सामूहिक जीवन-पद्धति और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण को समझने की आवश्यकता है.


कार्यक्रम के आयोजक डॉ. राजकुमार मीना ने बताया कि BHU में लगातार तीसरे वर्ष विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन किया जा रहा है, उन्होंने कहा कि यह आयोजन मुख्य रूप से विद्यार्थियों की पहल का परिणाम है, बच्चों ने उनसे कहा कि इस वर्ष भी कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए, जिसके बाद आयोजन की रूपरेखा तैयार की गई. उन्होंने बताया कि पिछले दो वर्षों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर अधिक जोर रहा, लेकिन इस बार अतिथियों से आग्रह किया गया .कि कार्यक्रम को बौद्धिक विमर्श का स्वरूप दिया जाए, ताकि आदिवासी समाज से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो सके.


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डॉ. मीना ने कहा कि आदिवासी समुदाय मूल रूप से शांति और सामूहिकता में विश्वास रखने वाला समाज है. वह सत्ता पर एकाधिकार के बजाय सामूहिक सत्ता और सहभागिता का समर्थक रहा है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को कई बार आक्रामक समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि उसके इतिहास और संस्कृति को समझने पर तस्वीर इससे अलग दिखाई देती है.


कार्यक्रम में प्रो. श्रद्धा सिंह ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मान्यता दी है, उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा की बात करता आया है और इसके लिए संघर्ष भी करता रहा है, उन्होंने कहा कि भारत का वास्तविक और समावेशी विकास तभी संभव है, जब आदिवासी समाज के संकल्प और उसकी प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि को समझते हुए आगे बढ़ा जाए.


उन्होंने आदिवासी साहित्य को लेकर भी अपनी बात रखी. प्रो. श्रद्धा सिंह ने कहा कि आदिवासी साहित्य को अक्सर केवल ‘प्रतिरोध का साहित्य’ कहकर सीमित कर दिया जाता है, जबकि इसमें संस्कृति, परंपरा, प्रकृति और जीवन मूल्यों को बचाने की गहरी चिंता दिखाई देती है. आदिवासी साहित्य की संवेदनशीलता और सौंदर्य को व्यापक समाज तक पहुंचाने की जरूरत है.मुख्य अतिथि अश्वनी कुमार पंकज ने आदिवासी समाज के इतिहास और स्थानीय संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि कार्यक्रम के लिए जिस धरती पर लोग एकत्र हुए हैं, उसका भी आदिवासी इतिहास रहा है. उन्होंने मांडूआडीह का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्षेत्र का आदिवासी समाज के लिए विशेष महत्व रहा है .और यहां आदिवासी समुदाय के लोगों ने अपने स्तर पर गांव बसाया था.


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उन्होंने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस आदिवासी समाज का अपना दिवस है और इसे अपनी संस्कृति तथा अपनी सोच के अनुसार मनाया जाना चाहिए. उन्होंने लोगों से अपील की कि वे केवल औपचारिकता के लिए तालियां न बजाएं, बल्कि अपने मन की बात खुलकर रखें. उनके अनुसार अपनी संस्कृति और पहचान के साथ खड़े होना ही औपनिवेशिक मानसिकता के खिलाफ वास्तविक संघर्ष है.


अश्वनी कुमार पंकज ने अंडमान और निकोबार के आदिवासी समुदायों का उदाहरण देते हुए विकास की अवधारणा पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि अंडमान-निकोबार में आदिवासी समुदायों के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास और टाउनशिप निर्माण की योजनाओं पर चर्चा हो रही है. सवाल यह है कि प्रकृति और आदिवासी जीवन को प्रभावित करने वाले ऐसे फैसले लेने का अधिकार किसे है, उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर प्रकृति को उजाड़ने की प्रवृत्ति पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.


उन्होंने कहा कि जिस तरह सांप को दुनिया से समाप्त नहीं किया जा सकता, उसी तरह भारत की लगभग छह प्रतिशत आबादी वाले आदिवासी समाज को भी समाप्त नहीं किया जा सकता. आदिवासी समाज की अपनी पहचान, संस्कृति और जीवन पद्धति है, जिसे विकास के नाम पर मिटाया नहीं जा सकता.उन्होंने आदिवासी समाज की सामाजिक व्यवस्था की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां वृद्धावस्था को लेकर आज के समाज जैसी अलगावपूर्ण व्यवस्था नहीं रही है. आदिवासी जीवन पद्धति में बुजुर्गों और समुदाय के बीच मजबूत सामाजिक संबंध देखने को मिलते हैं.


विशिष्ट अतिथि वंदना टेटे ने आदिवासी भाषाओं और संस्कृति की विविधता पर प्रकाश डाला, उन्होंने कहा कि अक्सर लोग कहते हैं. कि आदिवासी की भाषा समझ में नहीं आती, लेकिन यह समझने की जरूरत है. कि आदिवासी भाषाओं में केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि ध्वनियों का भी अपना अर्थ होता है. उन्होंने कहा कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक अनेक आदिवासी भाषाएं बोली जाती हैं, जो देश की सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.


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वंदना टेटे ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में आदिवासी समाज के बारे में अपेक्षित जानकारी उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के पुरखों ने आने वाली पीढ़ियों को उनकी संस्कृति, विरासत और जीवन मूल्यों को समझने की सीख दी है, आज आवश्यकता है कि लोग स्वयं तय करें कि उनके लिए क्या उचित है और अपनी संस्कृति तथा पहचान को किस तरह संरक्षित रखना है.उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति का उपासक है. उसके लिए प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है, इसलिए प्रकृति का सम्मान करना और उसकी रक्षा करना सभी की जिम्मेदारी है.


कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने आदिवासी समाज के इतिहास, संस्कृति, भाषा, साहित्य, प्रकृति से उसके संबंध और आधुनिक विकास मॉडल से उत्पन्न चुनौतियों पर विचार साझा किए. वक्ताओं ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस को केवल एक औपचारिक आयोजन तक सीमित न रखकर आदिवासी समाज की आवाज, उसकी संस्कृति और उसके अधिकारों को समझने तथा सम्मान देने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए.कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही. आयोजन का उद्देश्य आदिवासी समाज को लेकर प्रचलित धारणाओं पर संवाद स्थापित करना और विद्यार्थियों को आदिवासी इतिहास, साहित्य, संस्कृति तथा प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि से परिचित कराना रहा.

अन्विति में ‘रंगों की उड़ान’ ने भरी कल्पनाओं में उड़ान, हिंदी दिवस कार्यक्रम के अतिथि होंगे संजय मिश्रा...
अन्विति में ‘रंगों की उड़ान’ ने भरी कल्पनाओं में उड़ान, हिंदी दिवस कार्यक्रम के अतिथि होंगे संजय मिश्रा...
वाराणसी : काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित ‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ के पांचवें दिन शनिवार को ‘रंगों की उड़ान’ चित्रकला प्रतियोगिता के साथ कार्यक्रमों की श्रृंखला आगे बढ़ी. जंतु विज्ञान विभाग के एसपीआरसी हाल में आयोजित प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने शब्दों के बजाय रंगों और रेखाओं के माध्यम से विज्ञान, तकनीक, पर्यावरण और भविष्य की अपनी कल्पनाओं को कैनवास पर उकेरा.हिंदी प्रकाशन समिति की ओर से आयोजित ‘अन्विति’ के तहत यह पांचवां और अंतिम कार्यक्रम रहा. प्रतियोगिता के दौरान विद्यार्थियों की कलाकृतियों में वर्ष 2200 का मंगल, ऑक्सीजन सिलेंडरों वाले शहर, हरित गुंबदनुमा आवास, भारतीय ध्वज फहराते अंतरिक्ष यात्री, रोबोट, उड़न तश्तरी, डीएनए की सर्पिल संरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पौधों से भरे बल्ब जैसे विषय देखने को मिले.विद्यार्थियों ने वैज्ञानिक अवधारणाओं को कला के माध्यम से सहज और रचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया. स्वीकृति कुमारी, श्रुति पाठक, अंकिता बिंद, प्राची तिवारी, सत्य राव और वैष्णवी बजाज सहित अनेक विद्यार्थियों की कृतियों में विज्ञान और कल्पना का अनूठा मेल दिखाई दिया.कुछ चित्रों में मंगल ग्रह पर कृषि और मानव बस्तियों की कल्पना की गई तो कुछ में पृथ्वी से दूर भविष्य की काल्पनिक नगरी दिखाई दी. कई चित्रों में तकनीक और प्रकृति के बीच संतुलन का संदेश दिया गया, जबकि कुछ विद्यार्थियों ने भविष्य की प्रयोगशालाओं और अंतरिक्ष अभियानों को अपनी कला का विषय बनाया.प्रतियोगिता में एक ओर धुएं से घिरे शहर और ऑक्सीजन सिलेंडर नजर आए तो दूसरी ओर हरित आवास और अंतरिक्ष में तैरते यान दिखाई दिए. प्रदूषण और पर्यावरण संकट के बीच हरित भविष्य की कल्पना का यह विरोधाभास प्रतियोगिता की प्रमुख विशेषता रहा.7 सितंबर से शुरू हुआ था ‘अन्विति’ का सफर‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ की शुरुआत 7 सितंबर को ‘काव्य सरिता’ से हुई थी। इसके बाद 8 सितंबर को ‘कथा सृजन’, 9 सितंबर को वाद-विवाद प्रतियोगिता और 10 सितंबर को ‘ज्ञान प्रभा’ प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को हिंदी में कविता, कहानी, तर्क-वितर्क और वैज्ञानिक विषयों को अभिव्यक्त करने का मंच मिला।ALSO READ : बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...15 सितंबर को संजय मिश्रा के साथ हिंदी दिवस समारोह‘अन्विति’ हिंदी सप्ताह का समापन अब 15 सितंबर को हिंदी दिवस समारोह के साथ होगा। समारोह का आयोजन महामना हॉल, सेमिनार कॉम्प्लेक्स, विज्ञान संकाय में दोपहर 2:45 बजे किया जाएगा। कार्यक्रम में प्रख्यात अभिनेता संजय मिश्रा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे।इस अवसर पर ‘अचिंत्य’ पत्रिका की नई कड़ी ‘क्षितिज से परे’ का विमोचन भी प्रस्तावित है। समारोह के साथ ही ‘अन्विति’ के तहत आयोजित विभिन्न साहित्यिक, बौद्धिक और रचनात्मक गतिविधियों का समापन होगा।
बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...
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वाराणसी : देश के कई शहरों के साथ वाराणसी की हवा की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है। ताजा रैंकिंग में वाराणसी की स्थिति पिछले साल की तुलना में नीचे खिसकी है. शहर के 11वें पायदान से 34वें स्थान पर पहुंचने को पर्यावरण विशेषज्ञ गंभीर संकेत मान रहे हैं. बढ़ती आबादी, वाहनों की संख्या, ट्रैफिक जाम, निर्माण गतिविधियां और कचरे का उचित प्रबंधन नहीं होना वायु प्रदूषण बढ़ने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं.इस संबंध में आईआईटी बीएचयू के केमिकल वैज्ञानिक प्रो. आर.एस. सिंह ने बताया कि किसी भी एयर क्वालिटी रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उसका आकलन किस अवधि और किन मानकों के आधार पर किया गया है. रैंकिंग में सार्वजनिक धारणा के साथ-साथ केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सेंसर से मिलने वाले आंकड़ों की भी भूमिका होती है. यह भी महत्वपूर्ण है कि आंकड़े वर्ष के किस मौसम के लिए लिए गए हैं.उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर सर्दियों में गंगा के किनारे बसे शहरों में प्रदूषण की स्थिति ज्यादा खराब हो जाती है. वहीं बारिश के दौरान वातावरण में मौजूद धूल और कई तरह के कण बारिश के साथ नीचे बैठ जाते हैं, जिससे हवा अपेक्षाकृत साफ रहती है. ऐसे में वाराणसी की मौजूदा रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि इसमें किन महीनों के आंकड़ों को आधार बनाया गया है.बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या बनी चुनौतीप्रो. सिंह के मुताबिक वाराणसी में पर्यटन गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं. काशी विश्वनाथ धाम और अयोध्या समेत धार्मिक पर्यटन के चलते शहर में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है. पहले से अधिक जनसंख्या घनत्व वाले शहर में लोगों और वाहनों का दबाव बढ़ने से प्रदूषण पर भी असर पड़ता है.उन्होंने कहा कि वाहनों से होने वाला उत्सर्जन वायु प्रदूषण का बड़ा कारण है. वाराणसी में लगातार बढ़ता ट्रैफिक और जाम स्थिति को और गंभीर बनाता है. जाम में वाहन लंबे समय तक धीमी गति से चलते या खड़े रहते हैं, जिससे ईंधन की खपत और प्रदूषक उत्सर्जन दोनों बढ़ते हैं. वाहनों से निकलने वाले विभिन्न प्रदूषक हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं.निर्माण कार्यों से बढ़ता पार्टिकुलेट प्रदूषणशहर में लगातार चल रहे निर्माण कार्य भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं. विशेषज्ञ के अनुसार निर्माण स्थलों पर सीमेंट, बालू और अन्य सामग्री का इस्तेमाल होता है. यदि इनका उचित तरीके से भंडारण और प्रबंधन नहीं किया जाता तो धूल के महीन कण हवा में फैल जाते है. यही पार्टिकुलेट मैटर वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण घटकों में शामिल है.प्लास्टिक प्रदूषण भी बन रहा गंभीर खतराप्रो. आर.एस. सिंह ने प्लास्टिक प्रदूषण को भी गंभीर समस्या बताया. उन्होंने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल पानी या मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव हवा पर भी पड़ रहा है. वाहनों के टायर सड़क पर घिसते हैं, जिससे प्लास्टिक आधारित सूक्ष्म कण पर्यावरण में पहुंच सकते हैं.उन्होंने शहर के कचरा डंपिंग यार्ड का उदाहरण देते हुए बताया कि लंबे समय तक खुले में पड़े प्लास्टिक के टुकड़े धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं और माइक्रोप्लास्टिक में बदल सकते हैं. ये सूक्ष्म कण पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं और इनके प्रभाव को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है.घरों में इस्तेमाल होने वाली चीजें भी प्रदूषण का कारणप्रो. सिंह के अनुसार घरों में इस्तेमाल होने वाले कई उत्पाद भी ऐसे रसायन छोड़ सकते हैं जो प्रदूषण में योगदान करते हैं. पेंट और उसमें इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट से निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) इसका उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि आम लोगों को प्रदूषण के कई ऐसे स्रोतों की जानकारी नहीं होती, जिनका सामना वे रोजाना करते हैं.उन्होंने जल प्रदूषण के संदर्भ में दवाओं के अवशेषों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक कई दवाएं शरीर में पूरी तरह मेटाबोलाइज नहीं होतीं और सीवेज के माध्यम से जल स्रोतों तक पहुंच सकती हैं। यानी प्रदूषण केवल हवा की समस्या नहीं है, बल्कि हवा, पानी और मिट्टी—तीनों स्तरों पर इसके प्रभाव को समझने की जरूरत है.15-25 साल बाद स्थिति और भयावह होने की आशंकाप्रो. सिंह ने चेतावनी दी कि यदि प्रदूषण को लेकर समाज में जागरूकता नहीं बढ़ाई गई और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले 15 से 25 वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है. उन्होंने कहा कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है.ALSO READ : बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगानपहली कक्षा से बच्चों को दी जाए प्रदूषण की जानकारीप्रदूषण की रोकथाम के उपायों पर उन्होंने सबसे पहले जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया. उनका कहना है कि बच्चों को कम उम्र से ही प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में बताया जाना चाहिए. कक्षा एक से ही पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े विषयों को व्यवहारिक तरीके से समझाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी प्रदूषण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर अपनी भी जिम्मेदारी समझे.विशेषज्ञ का संदेश साफ है—शहर की हवा केवल मौसम से नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली, ट्रैफिक, निर्माण, कचरा प्रबंधन और जागरूकता से भी तय होती है. ऐसे में वाराणसी की गिरती रैंकिंग को महज आंकड़ा मानने के बजाय प्रदूषण के स्रोतों पर तत्काल काम करने की जरूरत है.
बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगान
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वाराणसी : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में चल रहे हिंदी माह-2026 के तहत शनिवार को विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षण कार्मिकों के लिए स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। समिति कक्ष में आयोजित प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने अपनी मौलिक कविताओं के माध्यम से हिंदी, भारतवर्ष, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, काशी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विशेषताओं का भावपूर्ण वर्णन किया।प्रतियोगिता में कुल 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ करते हुए हिंदी भाषा के प्रति समर्पण और गौरव की भावना व्यक्त की। कविताओं में भारत की विविधता, काशी की सांस्कृतिक विरासत और महामना के योगदान को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। प्रतिभागियों ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को महामना के अभूतपूर्व प्रयासों का परिणाम बताते हुए इसे ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखने वाला संस्थान बताया।प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में प्रो. वशिष्ठ अनूप, डॉ. संजीव सराफ और प्रो. उर्वशी गहलौत शामिल रहे। निर्णायक मंडल ने प्रतिभागियों की कविताओं, प्रस्तुति और विषयवस्तु के आधार पर मूल्यांकन किया।कार्यक्रम के दौरान हिंदी अधिकारी डॉ. शिव कुमार त्रिपाठी ने निर्णायक मंडल के सदस्यों को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश सिंह ने किया, जबकि अंशुमान पटेल ने धन्यवाद ज्ञापित किया।ALSO READ : सुब्रतो कप में यूपी का दम दिखाएगी वाराणसी की टीमकार्यक्रम को सफल बनाने में सहायक कुलसचिव विकास कुमार, रामजी त्रिपाठी, कीर्ति शंकर दुबे, रागिब हुसैन और रोहित आनंद का सहयोग रहा।