शिक्षकों के लिए बड़ी राहत, बीएचयू ने बदले पदोन्नति के नियम...

वाराणसी : काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने शिक्षकों की नियुक्ति और कॅरियर एडवांसमेंट स्कीम (सीएएस) के तहत पदोन्नति प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए पोस्ट-डॉक्टोरल शोध कार्य और पूर्व शैक्षणिक सेवाओं को मान्यता देने का निर्णय लिया है. विश्वविद्यालय ने यह व्यवस्था यूजीसी की वर्ष 2018 की गाइडलाइन के अनुरूप लागू की है, जिसे 18 जुलाई 2018 से प्रभावी माना जाएगा. इस फैसले से विश्वविद्यालय के 300 से अधिक शिक्षकों को लाभ मिलने की संभावना है.
नई व्यवस्था के तहत अब पीएचडी के बाद किए गए पोस्ट-डॉक्टोरल शोध, रिसर्च एसोसिएटशिप तथा सीएसआईआर, डीबीटी, डीएसटी, आईसीएमआर, आईसीएसएसआर और यूजीसी जैसी संस्थाओं की फेलोशिप अवधि को भी नियुक्ति और सीएएस पदोन्नति के लिए पात्रता अनुभव में शामिल किया जाएगा. लंबे समय से शिक्षक और शोधार्थी इस अनुभव को अकादमिक सेवा का हिस्सा मानने की मांग कर रहे थे.
विश्वविद्यालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल उन्हीं भारतीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों में अर्जित अनुभव को मान्यता मिलेगी, जो किसी भी समय राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) की शीर्ष-100 सूची में शामिल रहे हों। इसके अलावा राष्ट्रीय महत्व के संस्थान, उत्कृष्टता संस्थान और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में अर्जित अनुभव भी मान्य होगा.
बीएचयू ने विदेशी संस्थानों में किए गए पोस्ट-डॉक्टोरल शोध को भी मान्यता देने का फैसला किया है. इसके लिए संबंधित विश्वविद्यालय का टाइम्स हायर एजुकेशन, क्यूएस, एआरडब्ल्यूयू या लेडेन जैसी अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में शीर्ष-500 संस्थानों में शामिल होना आवश्यक होगा. साथ ही पोस्ट-डॉक्टोरल अनुभव कम से कम एक वर्ष का लगातार होना चाहिए.
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विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, जिस अनुभव का लाभ पहले किसी सीधी भर्ती या पदोन्नति में लिया जा चुका है, उसे दोबारा नहीं जोड़ा जाएगा. अनुभव की गणना के बाद पदोन्नति की पात्रता विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार तय की जाएगी. इस निर्णय से विशेष रूप से विज्ञान संस्थान सहित विभिन्न संकायों के उन शिक्षकों को राहत मिलेगी, जिन्होंने नियुक्ति से पहले शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों में महत्वपूर्ण शोध कार्य किया है. माना जा रहा है कि यह बदलाव शिक्षकों के शोध अनुभव को उचित महत्व देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा.



