नगर निगम कार्यकारिणी चुनाव : छोटा चुनाव बड़ा संदेश, कांग्रेस -सपा खींचतान में उलझी...

वाराणसी : नगर निगम की कार्यकारिणी का चुनाव भले छोटा था, लेकिन संदेश बड़ा है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के गृह जिले में विपक्ष के एकमत होने का सिलसिला इस चुनाव में बिखर गया. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के एक साथ आने और चुनाव जीतने के दावों के बावजूद दोनों दलों के बीच सहमति नहीं बन पाई. इसका परिणाम नगर निगम कार्यकारिणी के चुनाव में उजागर होता देखने को मिला. जहां कांग्रेस को जीत नसीब नहीं हुई और सपा को अपनी एक सीट खोनी पड़ी.
देखा जाए तो इस खींचतान का लाभ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिला, जिसने चार के बजाय पांच सदस्य चुनाव जीतकर कार्यकारिणी में अपनी स्थिति मजबूत की. इस प्रकार, नगर निगम की कार्यकारिणी समिति में 12 में से 11 सदस्य भाजपा के और एक सदस्य सपा का रह गया. पहले समिति में सपा के दो सदस्य कार्यकारिणी में शामिल होते थे. अब सपा और कांग्रेस इस हार का ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ रहे हैं, जिससे दोनों दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तनाव बढ़ गया है. यह खटास आगामी चुनावों में भी नुकसान पहुंचा सकती है.
कांग्रेस और सपा के बीच की यह खींचतान न केवल स्थानीय राजनीति में बल्कि आगामी चुनावों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. दोनों दलों के बीच आपसी मतभेद और आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति ने उनकी एकजुटता को कमजोर किया है. इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि दोनों दल एकजुट होकर चुनावी मैदान में नहीं उतरते हैं, तो भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है.
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इस स्थिति ने वाराणसी में राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है. भाजपा ने अपनी स्थिति को मजबूत करते हुए नगर निगम कार्यकारिणी में एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है. वहीं, कांग्रेस और सपा के बीच की खींचतान ने उनके कार्यकर्ताओं में भी असंतोष पैदा किया है, जो भविष्य में उनके चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है.
इस प्रकार, वाराणसी में कांग्रेस और सपा के बीच की यह खींचतान न केवल स्थानीय राजनीति में बल्कि राज्य की राजनीति में भी महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है. दोनों दलों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, ताकि वे आगामी चुनावों में भाजपा के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बना सकें. एक दिन पूर्व ही कांग्रेस महानगर अध्यक्ष ने विगत चुनाव का साझा समझौता पत्र जारी कर सपा से सहयोग की अपेक्षा की थी. मगर आपसी तालमेल और खींचतान में भाजपा को इसका पूरा फायदा मिला है.



